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सहजन (मोरिंगा) खाने के क्या  फायदे हैं? | सीके बिड़ला अस्पताल
Aug 26, 2025|Ms. Deepali Sharma

सहजन (मोरिंगा) खाने के क्या फायदे हैं? | सीके बिड़ला अस्पताल

सहजन, जिसे अंग्रेजी में मोरिंगा (Moringa) और ड्रमस्टिक (Drumstick) के नाम से जाना जाता है, एक ऐसा पेड़ है जिसका हर हिस्सा – पत्तियां, फूल, फलियां और जड़ – हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद होता है। भारत में यह सदियों से पारंपरिक चिकित्सा और रसोई का हिस्सा रहा है। इसकी फलियां (ड्रमस्टिक) और पत्तियां सबसे ज़्यादा इस्तेमाल की जाती हैं। इसके अद्भुत मोरिंगा बेनिफिट्स (Moringa benefits) और ड्रमस्टिक बेनिफिट्स (Drumstick benefits) इसे दुनिया भर में लोकप्रिय बनाते हैं।

सहजन में क्या पोषण तत्व हैं? (Nutritional elements in Moringa)

सहजन में पोषक तत्वों का भंडार होता है। इसकी पत्तियां विशेष रूप से विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होती हैं। यह कई बीमारियों से लड़ने में मदद करता है। आइए देखते हैं कि 100 ग्राम सहजन की पत्तियों में क्या-क्या होता है:

  • विटामिन C: संतरे से 7 गुना ज़्यादा।
  • कैल्शियम: दूध से 17 गुना ज़्यादा।
  • पोटैशियम: केले से 15 गुना ज़्यादा।
  • प्रोटीन: दही से 9 गुना ज़्यादा।
  • विटामिन A: गाजर से 10 गुना ज़्यादा।
  • आयरन: पालक से 25 गुना ज़्यादा।

इसके अलावा, इसमें विटामिन E, विटामिन K, मैंगनीज (manganese), और मैग्नीशियम (magnesium) जैसे कई अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी होते हैं। यह एक कम कैलोरी वाला और फाइबर से भरपूर भोजन है।

और अधिक पढ़े: तुलसी के फायदे और नुकसान

सहजन खाने के क्या फायदे हैं? (advantages of drumstick)

सहजन खाने के फायदे (benefits of eating moringa) अनगिनत होते हैं। यह न सिर्फ बीमारियों से बचाता है, बल्कि शरीर को अंदर से मजबूत भी बनाता है। तो चलिए निचे इसके फायदे जानते हैं:-

1. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाए (increases immunity)

सहजन में मौजूद विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट (Antioxidant) शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं। यह सर्दी, खांसी और अन्य संक्रमणों से लड़ने में मदद करता है।

2. ब्लड शुगर को नियंत्रित करे (control blood sugar)

मधुमेह (डायबिटीज) के मरीजों के लिए सहजन बहुत फायदेमंद है। इसके सेवन से ब्लड शुगर लेवल को नियंत्रित करने में मदद मिलती है, जिससे इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर होती है।

3. दिल को रखे स्वस्थ (keep heart healthy)

सहजन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट(Antioxidants) और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण (Anti-inflammatory properties) दिल की बीमारियों के जोखिम को कम करते हैं। यह कोलेस्ट्रॉल को कम करने और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में भी सहायक है।

4. पाचन में सुधार करे (improve digestion)

सहजन में फाइबर की अच्छी मात्रा होती है, जो पाचन तंत्र को स्वस्थ रखती है। यह कब्ज (Constipation) और गैस जैसी समस्याओं से राहत दिलाने में मदद करता है।

5. हड्डियों को मजबूत बनाए (strengthen bones)

कैल्शियम और फास्फोरस से भरपूर होने के कारण, सहजन (Sahjan) हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है। यह ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों को रोकने में भी सहायक है।

6. बालों और त्वचा के लिए फायदेमंद (beneficial for hair and skin)

सहजन में मौजूद विटामिन A, विटामिन E और एंटीऑक्सीडेंट त्वचा को चमकदार और स्वस्थ बनाते हैं। यह बालों को मजबूत और घना बनाने में भी मदद करता है।

7. शरीर को विषमुक्त करे (detoxifies the body)

सहजन में मौजूद क्लोरोफिल शरीर से हानिकारक टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में मदद करता है, जिससे लिवर और किडनी स्वस्थ रहते हैं।

और अधिक पढ़े: फैटी लिवर का कारण, लक्षण और इलाज

पुरुषों को मोरिंगा से क्या लाभ मिलते हैं? (benefits of Moringa for men)

यह एक आम धारणा है कि सहजन सिर्फ महिलाओं और बच्चों के लिए फायदेमंद है, लेकिन ऐसा नहीं है। पुरुषों के लिए सहजन लाभ (Moringa benefits for men) भी बहुत महत्वपूर्ण हैं जो निम्न वर्णित हैं:-

1. सहनशक्ति और ऊर्जा बढ़ाए (increase stamina and energy)

सहजन में मौजूद आयरन और प्रोटीन पुरुषों में थकान को दूर कर ऊर्जा के स्तर को बढ़ाते हैं। यह शारीरिक प्रदर्शन और सहनशक्ति को बेहतर बनाने में मदद करता है।

2. प्रोस्टेट स्वास्थ्य का ख्याल रखे (take care of prostate health)

रिसर्च के अनुसार, सहजन प्रोस्टेट ग्रंथि (prostate gland) के स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद कर सकता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट प्रोस्टेट कैंसर (prostate cancer) के जोखिम को कम करने में भी सहायक हो सकते हैं।

3. प्रजनन क्षमता बढ़ाए (increase fertility)

सहजन में जिंक और अन्य पोषक तत्व होते हैं जो शुक्राणुओं (sperms) की गुणवत्ता और संख्या में सुधार करने में मदद कर सकते हैं, जिससे प्रजनन क्षमता बेहतर होती है।

4. मांसपेशियों का निर्माण करे (build muscles)

प्रोटीन से भरपूर होने के कारण, सहजन मांसपेशियों के निर्माण और रिकवरी में मदद करता है, जो जिम जाने वाले पुरुषों के लिए बहुत फायदेमंद है।

5. टेस्टोस्टेरोन लेवल को नियंत्रित करे (control testosterone levels)

कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि सहजन तनाव को कम करके और एंटीऑक्सीडेंट प्रदान करके टेस्टोस्टेरोन के स्तर को संतुलित रखने में मदद कर सकता है।

और अधिक पढ़े: बच्चो के लिए हेल्दी डाइट चार्ट

ड्रमस्टिक का सेवन कैसे करें? How to consume drumstick?

सहजन को अपनी डाइट में शामिल करना बहुत आसान है। इसके कई तरीके हैं:

  • फलियां (ड्रमस्टिक): इसकी फलियों को दाल, सांभर या किसी भी करी में सब्जी की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • पत्तियां: सहजन की पत्तियों को साग की तरह पकाकर खाया जा सकता है। इसका इस्तेमाल सलाद, सूप या स्मूदी में भी कर सकते हैं।
  • पाउडर: आजकल सहजन (मोरिंगा) की पत्तियों का पाउडर भी आसानी से मिल जाता है। इसे पानी, जूस, स्मूदी या दही में मिलाकर सेवन किया जा सकता है।
  • चाय: सहजन की पत्तियों को सुखाकर हर्बल चाय बनाई जा सकती है, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक होती है।

सहजन के संभावित नुकसान और सावधानियां क्या हैं?  (Drumstick side effects and precautions)

हालांकि सहजन बहुत फायदेमंद है, लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखना ज़रूरी है:

  • गर्भवती महिलाएं (pregnant women): गर्भवती महिलाओं को सहजन की जड़ और इसके अर्क का सेवन करने से बचना चाहिए, क्योंकि यह गर्भाशय में संकुचन पैदा कर सकता है। पत्तियों का सेवन डॉक्टर की सलाह पर ही करें।
  •  दवाओं के साथ प्रतिक्रिया (reactions with medications): अगर आप ब्लड प्रेशर या शुगर की दवाएं ले रहे हैं, तो सहजन का सेवन करने से पहले डॉक्टर से सलाह ज़रूर लें, क्योंकि यह इन दवाओं के प्रभाव को बढ़ा सकता है।
  • पाचन संबंधी समस्या (digestive problems): ज़्यादा मात्रा में सहजन का सेवन करने से पेट खराब हो सकता है, इसलिए इसे संतुलित मात्रा में ही खाएं।

सहजन के फायदे (benefits of moringa) बहुत हैं, लेकिन इसका सेवन करते समय सावधानी बरतना भी ज़रूरी है।

निष्कर्ष

सहजन (मोरिंगा) एक ऐसा सुपरफूड है जो अपने अद्भुत गुणों के कारण हमारे स्वास्थ्य के लिए एक वरदान है। चाहे वह रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाना हो, दिल को स्वस्थ रखना हो, या पुरुषों के लिए विशेष लाभ प्रदान करना हो, सहजन (Sahjan) हर तरह से फायदेमंद है। इसे अपनी डाइट में शामिल करके आप एक स्वस्थ और लंबा जीवन जी सकते हैं। तो अब जब आपको मोरिंगा के फायदे (drumstick benefits) पता चल गए हैं, तो इसे अपनी रसोई का हिस्सा बनाएं और इसके चमत्कारी लाभों का अनुभव करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल FAQ’s

क्या सहजन का सेवन वजन घटाने में मदद करता है?

हां, सहजन का सेवन वजन घटाने में मदद कर सकता है। इसमें मौजूद कुछ यौगिक, जैसे क्लोरोजेनिक एसिड, फैट को कम करने में सहायक होते हैं। सहजन में फाइबर की मात्रा अधिक होती है, जो पेट को भरा हुआ महसूस कराता है और अधिक खाने से रोकता है। यह शरीर के मेटाबॉलिज्म को भी बढ़ा सकता है, जिससे कैलोरी ज्यादा बर्न होती है।

क्या सहजन के बीज खाने से कोई नुकसान हो सकता है?

सहजन के बीजों का सेवन आमतौर पर सुरक्षित होता है, लेकिन कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए। यदि अधिक मात्रा में इसका सेवन किया जाए, तो यह पेट में ऐंठन, गैस और दस्त जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। सहजन के बीजों में रेचक (laxative) गुण होते हैं, इसलिए इनका संयमित सेवन ही उचित है।

क्या सहजन का सेवन गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित है?

सहजन का सेवन गर्भवती महिलाओं के लिए आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है, लेकिन इसके कुछ हिस्सों के सेवन से बचना चाहिए। सहजन की फलियों और पत्तियों का सेवन सुरक्षित है और यह आयरन, कैल्शियम और विटामिन जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व प्रदान करता है, जो गर्भावस्था में जरूरी होते हैं। हालांकि, सहजन की जड़ और छाल का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इनमें गर्भाशय को संकुचित करने वाले यौगिक होते हैं, जो गर्भपात का कारण बन सकते हैं। इसलिए, गर्भावस्था के दौरान सहजन के सेवन से पहले डॉक्टर से परामर्श जरूर करें।

क्या सहजन के पत्ते खाने से एनीमिया की समस्या दूर हो सकती है?

हां, सहजन के पत्ते खाने से एनीमिया की समस्या दूर करने में मदद मिल सकती है। सहजन के पत्तों में आयरन की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन के लिए आवश्यक है। यह विटामिन सी का भी एक अच्छा स्रोत है, जो शरीर में आयरन के अवशोषण को बेहतर बनाता है। इसलिए, सहजन के पत्ते एनीमिया से पीड़ित लोगों के लिए एक प्रभावी प्राकृतिक उपाय हो सकते हैं।

सहजन के सेवन से त्वचा पर क्या प्रभाव पड़ता है?

सहजन का सेवन त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इसमें विटामिन ए, सी और ई जैसे एंटीऑक्सीडेंट होते हैं, जो फ्री रेडिकल्स से लड़ते हैं और त्वचा को क्षति से बचाते हैं। यह कोलेजन के उत्पादन को बढ़ावा देता है, जिससे त्वचा में कसाव आता है और झुर्रियां कम होती हैं। सहजन का तेल त्वचा को नमी प्रदान करता है और मुँहासे, दाग-धब्बे और त्वचा की अन्य समस्याओं को दूर करने में भी मदद कर सकता है।

Protein Sources for Vegetarians
Aug 16, 2025|Ms. Deepali Sharma

Protein Sources for Vegetarians

Unsure if you can get enough protein from a vegetarian diet, or if you still think that only non-vegetarian meals are a good source of protein?

It’s time to change this misconception that you can’t get enough protein from vegetarian sources. There are a lot of plant-based foods that can fill your plate with protein, flavour and plenty of nutrients. Ready to explore the world of protein-rich vegetarian foods?

15 Vegetarian Protein Foods to Power Your Day

Here are 15 rich sources of protein that you can incorporate into your daily diet.

1. Lentils (Dal)

A cup of cooked lentils is power-packed with around 18 grams of protein along with fibre, iron, and folate. They are perfect for soups, salads, and dals, keeping you full for hours.

2. Chickpeas (Chana)

Also called garbanzo beans, chickpeas offer about 15 grams of protein per cup. They are versatile, great in curries or roasted as a crunchy snack.

3. Quinoa

Unlike many plant foods, quinoa is a complete protein with all nine essential amino acids. One cup of cooked quinoa provides around 8 grams of protein and plenty of magnesium.

4. Tofu (Soy Paneer)

Tofu is made from soya and gives about 8-17 grams of protein per 100 grams. It is also known to have all 9 essential amino acids, which makes it a complete protein.

5. Greek Yoghurt (Thick Dahi)

It is thicker and creamier than regular yoghurt and has nearly double the protein, which is around 10 grams per 100 grams. It also contains a good amount of probiotics, which are good for your gut health.

6. Edamame (Tender Soybeans)

These young soybeans deliver 17 grams of protein per cup along with fibre and antioxidants. They are delicious steamed with a pinch of salt.

7. Paneer

An Indian staple, paneer offers around 14-18 grams of protein per 100 grams. It serves great in curries, grilled, or even crumbled into salads.

8. Black Beans (Kale Rajma)

A cup of black beans provides 15 grams of protein and is rich in fibre, helping regulate blood sugar and improve digestion.

9. Almonds (Badam)

With 6 grams of protein per 28 grams, almonds also bring vitamin E and healthy fats to the table. Perfect as a snack or in smoothies.

10. Chia Seeds

Two tablespoons contain 5 grams of protein, omega-3s, and fibre. They work well in puddings, overnight oats, or sprinkled on salads.

11. Peanuts & Peanut Butter

Peanuts have ~26 grams of protein per 100 grams, and natural peanut butter is a convenient spread for toasts, fruits, or smoothies.

12. Pumpkin Seeds

These tiny seeds hold around 9 grams of protein per 28 grams, along with zinc and magnesium, which are vital for immunity and muscle function.

13. Green Peas

One cup of cooked green peas offers 9 grams of protein plus vitamin C and fibre. Add them to soups, pulao, or vegetable mixes.

14. Seitan (Wheat Gluten)

A wheat gluten product, seitan boasts a whopping 25 grams of protein per 100 grams. Its chewy texture makes it a great meat substitute.

15. Amaranth (Rajgira)

This ancient grain delivers 9 grams of protein per cup cooked and is high in iron and manganese. Ideal for porridge, salads, or khichdi.

Why Variety Maximises Your Nutritional Benefits

A variety in your protein picks is not just to avoid a monotonous diet, but to offer you several health benefits. Each source of protein diet brings a unique blend of amino acids, nutrients and taste. This keeps your meals delightful while fulfilling your daily protein requirement. It is better for absorption and also keeps your palate and muscles happy.

Bursting the 5 Popular Myths Around Plant-Based Protein

Myth ❌ Fact ✔
1 Vegetarian diets cannot provide enough protein. A well-planned vegetarian diet with diverse protein sources (pulses, dairy, soy, nuts, seeds) can easily meet your daily protein needs.
2 Plant proteins are incomplete. While some plant proteins may be low in one or two amino acids, combining different sources (like rice and lentils) ensures a complete amino acid profile.
Also, sources like soy, quinoa fall in the category of complete protein.
3 Only meat can help build muscle. Many vegetarian athletes and fitness enthusiasts build strong muscles with plant-based proteins and proper resistance training.
4 Plant proteins are harder to digest. Cooking, soaking, sprouting, and fermenting plant-based foods improve their digestibility and nutrient absorption.
5 Plant-based protein is only for vegetarians. Plant-based protein diet is beneficial for everyone as it is power-packed with fibre, antioxidants and healthy fats alongside protein.

7-Day Vegetarian Protein-Rich Menu Plan

Day Breakfast Lunch Snack Dinner
Mon Moong dal chilla + green chutney Palak Paneer with brown rice or millet-based roti (gluten-free) Greek yoghurt with fruit Roti with mixed vegetables & salad
Tues Quinoa porridge Rajma with brown rice Roasted chana mix Paneer with whole wheat roti
Wed Poha with curd Masoor dal + roti + sautéed greens Peanut butter on whole-wheat toast Mixed dal with millet/wheat roti
Thu Veg uthappam + sambhar Tofu curry + roti + salad Mixed nuts & a bowl of vegetable soup Moong dal khichdi with sautéed spinach
Fri Oats with chia and fruit Split peas curry with brown rice Fruit + Greek yoghurt Besan chila with vegetables
Sat Idli + Sambhar Chickpea curry + roti with salad & curd Sprouts salad Paneer bhurji wrap with salad
Sun Quinoa vegetable upma Rajma rice + cucumber raita Roasted green peas Tofu/chickpea curry + millet or roti

Note: This meal plan is a general guide on how you can incorporate plant-based protein into your diet. Every individual has unique nutritional needs, which differ according to their age, health, activity levels and fitness goals. Please consult a certified dietitian or healthcare professional before making significant dietary changes.

FAQs

Can I get enough protein from a vegetarian diet?

Yes! With a smart mix of legumes, soy, dairy, seeds, and grains, vegetarian diets easily meet and can even exceed daily protein needs.

Which vegetarian food has the highest protein?

Soy chunks stand out (around 50 g per 100 g)! Alongside that, tempeh, paneer, lentils, rajma, and seitan are also loaded with a good amount of protein.

Are plant-based proteins as effective as animal proteins?

Absolutely. There are many options, like soy, quinoa, which are complete proteins. Even the other sources we discussed, when consumed across meals, cover all essential amino acids.

Wrapping it Up!

Now you must be feeling confident that, being a vegetarian, you can also have plenty of options for a protein-rich diet. You can easily power up your body with delicious meals without relying on meat. However, you must note that every individual’s requirement is unique when it comes to nutrition. Listen to your body, explore different protein sources and do not hesitate to get professional advice if you have any doubts.

Apple Cider Vinegar: Health Benefits & Side Effects
Aug 15, 2025|Ms. Deepali Sharma

Apple Cider Vinegar: Health Benefits & Side Effects

Quick Highlights

  • Apple cider vinegar, also called ACV, is made through the fermentation of apples. It contains acetic acid, probiotics and has antioxidant properties.
  • ACV is known for its multiple health benefits, including supporting blood sugar control, aiding weight management, improving digestion, offering antimicrobial effects, and possibly benefiting heart health.
  • There are some side effects, such as tooth enamel erosion, digestive discomfort, low potassium, and interactions with certain medications, if taken excessively or undiluted.
  • ACV is not for everyone. People with acid reflux, ulcers, low potassium, osteoporosis, or those on specific medications should avoid or consult a doctor before use.
  • Usage tips: Always dilute ACV, start with small amounts, and incorporate it into meals rather than directly drinking.
Apple cider vinegar has become something of a wellness celebrity. You can find people using it from detox drinks to salad dressings. But is it really a miracle liquid or just another passing health trend? Let’s understand and break down its benefits, risks and the proper way to use it

What is Apple Cider Vinegar (ACV)?

Apple cider vinegar is made through the fermentation of crushed apples with yeast which converts their natural sugars into alcohol. After that, the alcohol is converted into acetic acid by adding bacteria. This acetic acid is the main ingredient responsible for the tangy taste and potential health benefits of ACV.

The unfiltered form of ACV contains the “mother” strands of proteins, enzymes, and friendly bacteria that give it a cloudy appearance. Many believe this is where most of the goodness lies, although research is still ongoing.

6 Health Benefits of Apple Cider Vinegar

ACV is backed by science for some of its health benefits, particularly when combined with a balanced diet and healthy lifestyle.

May Help with Blood Sugar Control

ACV may help reduce blood sugar spikes by slowing the digestion of carbohydrates. Research shows that taking vinegar before meals can improve insulin sensitivity in people with insulin resistance which in turn helps control post-meal blood sugar levels.

Helps with Weight Management

ACV though, might not melt your body fat instantly but it can make you feel full which helps in lowering overall calorie intake. Some studies have shown that if consumed with a calorie-controlled diet, ACV can result in modest weight loss.

Supports Digestive Health

The acetic acid present in ACV boosts the growth of healthy gut bacteria. Raw and unfiltered ACV with the “mother” contains probiotics that help support digestion.

Antimicrobial Properties

Historically, vinegar has been used for cleaning and food preservation because it can kill harmful bacteria. While you shouldn’t swap it for antibiotics, ACV may help prevent the growth of certain bacteria in foods.

May Improve Heart Health

Some studies have suggested that ACV can help lower cholesterol and triglyceride levels but there is still a scope for more research though early findings are promising.

Rich in Antioxidants

ACV consists of polyphenols which are plant based antioxidants and possess anti-inflammatory properties. This may help in fighting oxidative stress and support cell protection.

Also Read: Diet chart for weight loss

Side Effects of Apple Cider Vinegar

Excess of anything is bad. Though filled with numerous health benefits, being acidic in nature, it may not be suitable for all especially when taken in high amount. The following are some of its side effects.

  • Tooth Enamel Erosion: Directly sipping ACV can wear down your enamel over time. Always dilute it in water.
  • Digestive Issues: High doses can cause nausea or worsen acid reflux in some people.
  • Low Potassium Levels: Excessive intake has been linked to reduced potassium and weakened bones in rare cases.
  • Medication Interactions: It may interfere with diuretics, laxatives, and insulin, potentially lowering potassium or blood sugar too much.

Who Should Avoid Apple Cider Vinegar?

While small amounts are generally safe for most individuals, ACV is not made for everyone.

  • People with acid reflux or stomach ulcers because it may worsen symptoms.
  • Those with low potassium or osteoporosis.
  • Individuals taking insulin or water pills due to a possible drug interaction.
  • Anyone with tooth sensitivity because acetic acid may cause more erosion.

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How to Use Apple Cider Vinegar Safely

If you are ready to try ACV, here is how to use it in a healthy way.

  • Dilute It: Mix 1–2 teaspoons in a large glass of water. Never drink it straight.
  • Start Small: Begin with once a day and see how your body reacts.
  • Best Time: Some prefer before meals to help with digestion and appetite control.
  • Use in Food: You can add it to salad dressings, marinades, or even dilute it in herbal teas.

FAQs about Apple Cider Vinegar

1. How to consume apple cider vinegar?

Dilute 1–2 teaspoons in at least 200 ml of water. You can drink it before meals or mix it into salad dressings.

2. Does apple cider vinegar reduce belly fat?

It may help with overall weight loss because it makes you feel full and reduces the urge for more calorie intake, but it does not specifically target belly fat.

3. How much ACV per day is safe?

Most experts recommend 1–2 tablespoons (15–30 ml) daily, always diluted.

4. Can I drink apple cider vinegar every day?

Yes, if you stick to the safe daily limit and dilute it. However, overuse can lead to tooth erosion or digestive discomfort.

5. What is the best time to take apple cider vinegar?

Many prefer taking it before meals to support digestion and control appetite, but timing depends on personal preference and tolerance.

The Bottom Line

Apple cider vinegar comes with many benefits and can be used as a healthy addition to your diet. Its properties are backed by some research although there is more to explore. From helping with blood sugar control to aiding digestion, ACV has gained significant popularity.
Do remember: moderation is key and dilution is non-negotiable. If you are considering adding ACV to your routine, especially if you have a medical condition or take medication, it is best to confirm with your doctor first.

Hyaluronic Acid: Benefits, Uses, and How It Enhances Skin Health

Hyaluronic Acid: Benefits, Uses, and How It Enhances Skin Health

Many of you probably have seen hyaluronic acid mentioned in every other skincare ad but have you ever wondered why this skincare ingredient is so popular? Is it just a marketing hype or does it really work wonders for your skin? Whether you want that fresh facial glow or are struggling with too much dryness, hyaluronic acid might be your skin’s new best friend. Let’s uncover the facts about hyaluronic acid, why it is in the spotlight and how it can be beneficial for your skin.

What is Hyaluronic Acid?

Hyaluronic acid is a natural substance produced by our body. It is found in the skin, eyes, and joints to keep them hydrated and cushioned. It makes the skin pump and supple as it can hold up to 1,000 times its weight in water. It comes in two forms: hyaluronic acid which hydrates the surface and sodium hyaluronate which penetrates deeper in the skin. You must be thinking that if it is naturally present in the skin, then what’s the need for it? 
With increasing age, the natural levels start dropping. Adding it to your routine helps restore moisture, smoothness, and firmness of your skin.

Benefits of Hyaluronic Acid

  • Intense hydration: Pulls moisture into the skin and keeps it there, giving you a soft, supple feel.
  • Plumps up the skin: Minimises the appearance of fine lines by filling them with hydration from within.
  • Smoothens texture: Regular use leaves skin feeling silky and looking refined.
  • Soothes irritation: Perfect for sensitive or easily inflamed skin.
  • Strengthens the skin barrier: Makes skin more resilient against pollution, harsh weather, and other stressors.
  • Restores natural glow: Hydrated skin reflects light better, giving you that healthy, dewy look.

What Does Hyaluronic Acid Do for You?

✔ Keeps skin bouncy and youthful by maintaining water levels in the deeper layers.

✔ Prevents that tight, uncomfortable feeling you get after washing your face.

✔ Works instantly. You can often feel the difference after the first few uses.

✔ Supports healing. Useful after sun exposure or treatments like chemical peels.

✔ Pairs well with almost any skincare ingredient, which makes it easy to slot into your existing routine.

Also Read: Skin Allergies- Types, Causes, Symptoms & Treatments

How is Hyaluronic Acid Made?

  • Modern, safe production: Most skincare hyaluronic acid today is made via fermentation of certain safe bacteria.
  • Sustainable process: No animal sources are needed, so it is vegan-friendly.
  • Purified and stabilised: This ensures it’s gentle and effective for skin application.
  • Often converted to sodium hyaluronate: This form is more stable and penetrates the skin better than pure hyaluronic acid.

How Hyaluronic Acid Works in the Body

Naturally present: Hyaluronic acid is found in skin, eyes, and joints, where it helps with lubrication, cushioning, and moisture balance.

In the skin: It functions like a moisture reservoir, binding water and maintaining skin softness, elasticity, and flexibility.

Topical application

  • Forms a thin, invisible film on the skin’s surface.
  • Draws water from the environment and deeper skin layers to the outer layer.
  • Reduces transepidermal water loss (TEWL), helping the skin stay hydrated for longer periods.

Hyaluronic Acid for Specific Skin Concerns

Here’s how it helps with different issues.

  • Dryness
    If your skin feels tight, rough, or flaky, hyaluronic acid is made for you. It pulls in moisture and locks it in, instantly soothing dry patches and giving your skin a soft, smooth finish.
  • Fine lines & wrinkles
    Dehydration often makes fine lines look more pronounced. By plumping the skin with hydration, hyaluronic acid softens its appearance, making your complexion look fresher and more youthful.
  • Acne-prone skin
    Many people with acne avoid moisturisers, fearing they will clog pores. Hyaluronic acid is different as it hydrates without adding oil or heaviness, which actually helps the skin repair itself.
  • Post-acne marks
    When skin is healing, hydration plays a big role. Hyaluronic acid supports this process by keeping the area moisturised, which can improve overall texture and reduce the appearance of lingering marks over time.
  • Dullness
    If your skin has lost its glow, this ingredient can revive it. By replenishing water levels, it makes skin look plump and luminous again, giving you that healthy “lit-from-within” radiance.
  • Irritation or sensitivity
    For skin that often feels red, itchy, or easily inflamed, hyaluronic acid provides gentle hydration and strengthens the skin barrier. Over time, this helps skin become calmer, more resilient, and less reactive.

Also Read: Dark Circles: Discover The Secrets to Brighter Eyes

Who Should Avoid Hyaluronic Acid?

Hyaluronic acid is normally considered safe for all skin types, but here are a few exceptions.

  • Individuals who are allergic or sensitive to skincare ingredients should do a patch test before applying it to their skin, since some added components, like fragrances or preservatives, can cause a reaction. 
  • Hyaluronic acid may draw moisture from deeper skin layers in very dry climatic conditions, which can make the skin feel tight. Applying a moisturiser over it can help. 
  • If you are taking medical-grade hyaluronic acid injections, such as dermal fillers, it is important to undergo that treatment only under the guidance of a qualified healthcare professional.

FAQs

  1. How long does it take for hyaluronic acid to work?
    Your skin might start feeling softer and more hydrated within a few days of use. A consistent application for over 4 to 6 weeks helps improve plumpness, smoothness and fine lines.  
  2. Is hyaluronic acid suitable for all skin types?
    Yes, it mostly works well for oily, dry, sensitive and combination skin. It is lightweight, non-comedogenic, and generally safe even for those with reactive or acne-prone skin.
  3. What does hyaluronic acid do for your skin?
    It attracts and retains moisture, helping your skin stay hydrated, plump, and smooth. This not only improves texture but also gives a healthy and radiant appearance.
  4. Can I use hyaluronic acid with retinol?
    Yes, Hyaluronic acid can help counter the dryness or flakiness that retinol sometimes causes. This makes the combination effective and more comfortable to use.
  5. Can I use hyaluronic acid with vitamin C?
    Yes. Using them together can boost hydration and also enhance the protective, brightening effects of vitamin C.
  6. Is hyaluronic acid good for acne?
    While it does not treat acne directly, it helps maintain healthy hydration levels, which supports healing and reduces irritation. This makes it beneficial for skin that’s recovering from breakouts.
  7. Can I use hyaluronic acid with niacinamide?
    Yes, both ingredients complement each other well. Together, they can hydrate the skin, improve its barrier function, and enhance overall vibrancy and smoothness.

 

नार्मल ओवरी सिस्ट साइज – ओवेरियन सिस्ट के प्रकार और आकार
Aug 8, 2025|Dr. Astha Dayal

नार्मल ओवरी सिस्ट साइज – ओवेरियन सिस्ट के प्रकार और आकार

Key Takeaways: 

  1. अगर आपके पेट के निचले हिस्से और कमर में हल्का दर्द बना रहता है, पेट में भारीपन महसूस होता है, पीरियड लेट होते हैं, यूरिन बार-बार महसूस होती है, तो आपकी ओवरी में सिस्ट हो सकता है। 
  2. आमतौर पर रेगुलर पीरियड वाली महिलाओं को जीवन में एक बार ओवेरियन सिस्ट हो सकता है और यह कई तरह का होता है। 
  3. कुछ सिस्ट में दर्द भी नहीं होता है और बिना इलाज के ठीक हो जाता है। लेकिन डरमॉइड, एंडोमेट्रियोमा या कैंसरयुक्त सिस्ट जैसे प्रकार में दर्द होता है।
  4. आमतौर पर बड़ी सिस्ट को निकालने के लिए सर्जरी की जरूरत पड़ती है। सर्जरी का निर्णय डॉक्टर्स आमतौर पर पेल्विक एग्जाम, अल्ट्रासाउंड और CA-125 ब्लड टेस्ट जैसी जांचों को करवाकर करते हैं। 
  5. अधिकतर सिस्ट कैंसर रहित होते हैं और इससे प्रेगनेंसी प्रभावित नहीं होती है। 

रेगुलर पीरियड्स वाली महिलाओं में ओवेरियन सिस्ट होना एक आम बात है। स्त्री रोग विशेषज्ञों के अनुसार, महिलाओं को अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार इस समस्या का सामना करना पड़ता है। यह सिस्ट एक तरह की तरल पदार्थ से भरी थैली होती है, जो ओवरी के अंदर या उसकी सतह पर बनती है। ओवरी यूट्रस के दोनों ओर स्थित होती है और आकार में छोटी और अंडाकार होती है। ये महिला हार्मोन जैसे एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का निर्माण करते हैं और हर महीने एक एग रिलीज करते हैं, जो पीरियड साइकिल का हिस्सा होता है। 

अधिकांश ओवेरियन सिस्ट नॉर्मल पीरियड साइकिल के कारण बनती हैं और आमतौर पर नुकसानदायक नहीं होती हैं। कई महिलाओं को पता भी नहीं चलता है, क्योंकि ये बिना किसी लक्षण के कुछ हफ्तों में अपने आप ठीक भी हो जाती हैं। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि हर सिस्ट एक जैसा ही हो। कुछ सिस्ट पूरी तरह से नॉर्मल और पेनलेस होते हैं, लेकिन कुछ मामलों में ये सिस्ट तेज दर्द, ब्लीडिंग या कैंसर जैसी गंभीर स्थिति का कारण भी बन सकते हैं। इसलिए महिलाओं को यह समझना जरूरी होता है कि ओवेरियन सिस्ट क्या है, ये क्यों बनती हैं और इनके लक्षण क्या हो सकते हैं और कब आपको स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। 

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ओवेरियन सिस्ट क्या है? (What is Ovarian Cyst?)

ओवेरियन सिस्ट, आमतौर पर ओवरी के अंदर या उसकी सतह पर बनने वाली तरल पदार्थ से भरी थैली होती है। महिलाओं के शरीर में दो ओवरी होती हैं, जो यूट्रस के दोनों ओर होती हैं। हर ओवरी का आकार लगभग बादाम जितना होता है। इन्हीं ओवरी में एग्स बनते हैं और हर महीने पीरियड्स के दौरान बाहर निकलते हैं। ओवेरियन सिस्ट होना आम बात है, कई मामलों में यह पेनलेस होते हैं और कुछ हफ्तों या महीनों में अपने आप ठीक भी हो जाते हैं। लेकिन, कुछ मामलों में सिस्ट मुड़ सकती है या फट सकती है, जिससे तेज दर्द या गंभीर समस्या हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि महिलाओं को समय-समय पर पेल्विक जांच करवाते रहना चाहिए। आप चाहें तो हमारी स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) से सलाह लेकर जांच करवा सकती हैं। 

नार्मल ओवरी सिस्ट का साइज क्या होता है? (What is the size of normal ovary cyst?)

आमतौर पर महिलाओं की ओवरी में बनने वाली ओवेरियन सिस्ट अलग-अलग आकार की होती हैं। इनका आकार इस बात पर निर्भर करता है कि सिस्ट किस प्रकार की है और शरीर में कितने टाइम से मौजूद है। अधिकतर ओवेरियन सिस्ट छोटी होती हैं और इनका आकार लगभग 3 सेंटीमीटर यानी 1 इंच से कम होता है। ऐसे छोटे सिस्ट हानिरहित होते हैं और बिना इलाज के अपने आप ठीक हो सकते हैं। 

फंक्शनल सिस्ट जो पीरियड साइकिल के दौरान बनती हैं, अक्सर 2 से 3 सेंटीमीटर की होती हैं, ये नॉर्मल होती हैं और बिना इलाज के अपने आप ठीक हो सकती हैं। लेकिन अगर सिस्ट का आकार 5 सेंटीमीटर यानी लगभग 2 इंच या उससे ज्यादा हो, तो आप हमारी स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क कर सकती हैं। वहीं, कुछ सिस्ट का आकार 10 सेंटीमीटर या उससे ज्यादा का होता है, तो यह दर्दभरी और समस्याएं पैदा करने वाली होती हैं। कई बार सर्जरी की भी जरूरत पड़ती है। 

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ओवेरियन सिस्ट के प्रकार (Types of Ovarian Cyst)

ओवेरियन सिस्ट कई प्रकार के होते हैं और उनका कारण अलग-अलग हो सकता है। 

फंक्शनल सिस्ट (Functional Cysts)

  • ये सिस्ट सबसे नॉर्मल और पेनलेस होती हैं। 
  • जब ओवरी में एग निकलने की प्रक्रिया (ओव्यूलेशन) के दौरान कुछ बदलाव होते हैं। 
  • इन सिस्ट का मतलब होता है कि आपकी ओवरी ठीक से काम कर रही है।
  • आमतौर पर 60 दिनों के भीतर अपने आप यह सिस्ट ठीक हो जाती हैं और इलाज की जरूरत नहीं पड़ती है। वैसे तो फंक्शनल सिस्ट दो तरह की होती हैं। 

फॉलिक्युलर सिस्ट (Follicular Cyst)

हर महीने ओवरी में एक फॉलिकल नाम की छोटी थैली बनती है जो एक एग रिलीज करती है। अगर फॉलिकल एग छोड़ने में असफल रहती है, तो वह तरल पदार्थ से भरकर सिस्ट बन जाती है। इसे फॉलिक्युलर सिस्ट कहा जाता है। 

कॉर्पस ल्यूटियम सिस्ट (Corpus Luteum Cyst)

जब फॉलिकल एग रिलीज कर देता है, तो वह एक हार्मोन बनाने वाली संरचना बनाता है, जिसे कॉर्पस ल्यूटियम कहते हैं। अगर प्रेगनेंसी नहीं होती है, तो यह आमतौर पर घुल जाता है, लेकिन कभी-कभी यह लिक्विड से भरकर सिस्ट बन सकता है। 

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अन्य प्रकार की ओवेरियन सिस्ट (Other types of ovarian cyst)

आपको बता दें कि सभी सिस्ट पीरियड्स के कारण नहीं बनती हैं। कुछ सिस्ट शरीर में अन्य वजहों से बनती हैं और कुछ खतरनाक भी हो सकती हैं, इसलिए आपको स्त्री रोग विशेषज्ञ से नियमित जांच करानी चाहिए। 

सिस्टैडेनोमा (Cystadenoma)

सिस्टैडेनोमा सिस्ट ओवरी के बाहरी सतह पर बनती है और इसमें तरल पदार्थ या गाढ़ा चिपचिपा पदार्थ भरा होता है। 

डर्माइड सिस्ट (Dermoid Cyst/Teratoma)

ये सिस्ट अलग तरह की होती हैं, जिसमें स्किन, बाल भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि ये अजीब होती हैं लेकिन ये कैंसररहित होती हैं। 

एंडोमेट्रियोमा (Endometrioma)

ये सिस्ट पीरियड ब्लड से भरी होती हैं और अक्सर  एंडोमेट्रियोसिस नामक बीमारी से जुड़ी होती है। इसमें यूट्रस की तरह की कोशिकाएं ओवरी के बाहर विकसित होने लगती हैं। 

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कैंसर से जुड़ी सिस्ट (Ovarian Cancer Cysts)

कैंसरयुक्त सिस्ट अक्सर ठोस होती हैं और इनका साइज धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। इस तरह की सिस्ट मेनोपॉज के बाद ज्यादा देखी जाती हैं और इनकी जांच और इलाज बेहद जरूरी होती है। 

ओवरी सिस्ट के कारण (Causes of ovarian cyst)

कई बार छोटी साइज की ओवेरियन सिस्ट में किसी भी तरह के लक्षण नहीं दिखाई देते हैं और महिलाओं को पता भी नहीं चल पाता है। लेकिन अगर सिस्ट थोड़ी बड़ी हो जाए, तो कुछ लक्षण आपको दिखाई दे सकते हैं। जैसे कि-

ओवरी सिस्ट के आकार का प्रभाव (Effect of different ovary cyst size)

अक्सर ओवरी सिस्ट का असर इस बात पर निर्भर करता है कि उसका साइज कितना है। 

1. छोटे आकार की सिस्ट (2 सेमी तक)

आमतौर पर यह फंक्शनल सिस्ट होती हैं और यह पीरियड्स के दौरान बनती हैं। कुछ हफ्तों में अपने आप ठीक भी हो जाती हैं। इसमें दर्द नहीं होता है और इलाज की जरूरत नहीं पड़ती है। आमतौर पर ये फंक्शनल सिस्ट होती हैं।

2. मध्यम आकार की सिस्ट (3–5 सेमी)

मीडियम साइज की सिस्ट में हल्का दर्द, पेट भारी लगने जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। इसकी पुष्टि के लिए आप हमारी स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क कर सकती हैं और अल्ट्रासाउंड जांच के बाद उचित इलाज करवा सकती हैं। 

3. बड़े आकार की सिस्ट (5 सेमी से ऊपर)

इस साइज की सिस्ट में दर्द, सूजन, यूरिन पास करने में तकलीफ और पेट में हमेशा भारीपन बना रहना महसूस हो सकता है। इस तरह की सिस्ट मुड़ और फट सकती है, जिससे तेज दर्द पैदा हो सकता है। वहीं, अगर सिस्ट का साइज 10 सेमी से अधिक का है, तो सर्जरी की जरूरत पड़ सकती है। 

क्या आकार से कैंसर का खतरा बढ़ता है?

आमतौर पर अधिकतर ओवेरियन सिस्ट कैंसररहित (non-cancerous) होती हैं। लेकिन मेनोपॉज (menopause) के बाद अगर बड़ी और ठोस सिस्ट बनती हैं, तो डॉक्टर बायोप्सी करके चेक करते हैं कि सिस्ट में कैंसर है या नहीं। 

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ओवरी सिस्ट का इलाज और उपचार (Treatment of Ovarian Cyst)

ओवरी में सिस्ट है या नहीं इसके लिए सबसे पहले डॉक्टर कुछ जांचें करवाते हैं और जांच के बाद डायग्नोसिस करते हैं। 

1. पेल्विक जांच (Pelvic Exam)

ओवरी में सिस्ट है या नहीं इसके लिए सबसे पहले पेल्विक जांच कराई जाती है, जिसकी मदद से डॉक्टर यह समझने की कोशिश करते हैं कि आपके पेट की निचले हिस्से में कोई सिस्ट है या नहीं।

2. ट्रांसवेजिनल अल्ट्रासाउंड (Transvaginal Ultrasound)

यह एक खास तरह का अल्ट्रासाउंड होता है, जिसमें एक छोटी सी डिवाइस को वजाइना के जरिए अंदर डाला जाता है जिससे ओवरी की साफ इमेज मिलती है। इसकी मदद से डॉक्टर चेक करते हैं कि सिस्ट तरल पदार्थ से भरी है या ठोस है, सिस्ट का साइज, जगह और स्ट्रक्चर कैसा है। 

3. ब्लड टेस्ट CA-125 टेस्ट

अगर डॉक्टर को किसी सिस्ट में कैंसर का शक होता है, तो वह CA-125 टेस्ट करवाते हैं। इस टेस्ट से पता चलता है कि शरीर में CA-125 नामक प्रोटीन कितना है, जो कुछ कैंसर को बढ़ावा दे सकता है। आमतौर पर स्त्री रोग विशेषज्ञ मेनोपॉज के बाद की महिलाओं के लिए यह जांच जरूर लिखती हैं। 

4. MRI या CT स्कैन

अगर ओवरी में सिस्ट बड़ी है, तो डॉक्टर MRI (Magnetic Resonance Imaging) या CT (Computed Tomography) स्कैन करवाने की सलाह देते हैं। इससे बॉडी के अंदर की बारीक जांच हो जाती है और तस्वीर साफ हो जाती है कि सिस्ट की सर्जरी करनी है या दवाओं से ठीक किया जा सकता है। 

5. दवाइयों से इलाज

अगर सिस्ट की वजह से हल्का दर्द हो रहा होता है, तो डॉक्टर आइबुप्रोफेन या अन्य दर्द निवारक दवाएं लेने की सलाह देते हैं। इसके अलावा, गर्म पानी से पेट की सिंकाई करने से भी राहत मिल सकती है। 

6. लैप्रोस्कोपी (Laparoscopy)

जब सिस्ट का साइज छोटा और मीडियम होता है और उसमें कैंसर का कोई संकेत नहीं होता है, तो यह सर्जरी की जाती है। इसमें पेट में छोटे-छोटे चीरे लगाकर सिस्ट को बाहर किया जाता है। 

7. लैपरोटॉमी (Laparotomy)

जब सिस्ट का साइज 10 सेमी से ज्यादा का होता है और उसमें कैंसर की संभावना होती है, तो यह ट्रेडिशनल सर्जरी की जाती है। इसमें पेट में बड़ा चीरा लगाया जाता है और सिस्ट को निकाला जाता है। 

8. एंडोमेट्रियोमा के लिए लैप्रोस्कोपी

जब सिस्ट में पीरियड का खून भर जाता है, तो लैप्रोस्कोपी सर्जरी की जाती है। 

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ओवेरियन सिस्ट से जुड़ी सामान्य मिथक और सच्चाई (Myths & Facts About Ovarian Cyst)

 

मिथक (myths about ovarian cyst) सच्चाई (facts about ovarian cyst)
सभी तरह के ओवेरियन सिस्ट इनफर्टिलिटी का कारण बनते हैं।  अधिकांश फंक्शनल सिस्ट फर्टिलिटी को प्रभावित नहीं करते हैं। 
सिस्ट का मतलब हमेशा कैंसर होता है।  उम्र और कुछ लक्षणों के साथ कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
सिस्ट को हटाने के लिए सर्जरी की जरूरत होती है।  कई मामलों में सिस्ट 1 से 3 महीनों में ठीक हो जाता है। 
सर्जरी हमेशा लैपरोटॉमी (Laparotomy)ही होती है। 

सिस्ट हमेशा दर्द देते हैं। 

अधिकांश सर्जरी लैप्रोस्कोपी होती हैं, जिसमें पेट में छोटे चीरे लगाकर सिस्ट को बाहर निकाला जाता है। 
सिस्ट हमेशा दर्द देते हैं।  केवल बड़े आकार के, फटे या मुड़े हुए सिस्ट ही दर्द का कारण बनते हैं। 

 

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निष्कर्ष

महिलाओं के पीरियड्स साइकिल के दौरान ओवेरियन सिस्ट होना आम बात है। ये सिस्ट ओवरी में पानी या तरल पदार्थ से भरी छोटी-छोटी थैली होती हैं। सिस्ट अलग-अलग प्रकार और आकार की होती हैं। कुछ सिस्ट बड़ी और दर्दभरी होती हैं। ऐसे में महिलाओं को बिना देर किए स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। समय रहते जांच और सही इलाज से ओवेरियन सिस्ट के बढ़ने से रोका जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नोत्तर (FAQs Related to Ovarian Cyst)

क्या ओवेरियन सिस्ट से भविष्य में गर्भवती होने में परेशानी होगी?

कई बार ओवेरयिन सिस्ट होने पर भी अधिकांश महिलाएं प्रेगनेंट हो सकती हैं। दरअसल कई सिस्ट इतने छोटे होते हैं कि वह प्रेगनेंसी को प्रभावित नहीं करते हैं। 

क्या ओवेरियन सिस्ट कैंसर का कारण बन सकता है?

नहीं, हर तरह के ओवेरियन सिस्ट कैंसर का कारण नहीं होते हैं। कुछ सिस्ट कैंसर रहित होते हैं।

क्या ओवेरियन सिस्ट को रोकने का कोई तरीका है?

ओवेरेयिन सिस्ट को रोकने का कोई विशिष्ट तरीका नहीं है। लेकिन, आप हमारे स्त्री रोग विशेषज्ञ से नियमित पेल्विक जांच करवाकर अपनी ओवरी में होने वाले बदलाव को पता कर सकती हैं। 

पोस्टीरियर प्लेसेंटा क्या है? गर्भावस्था में प्लेसेंटा की भूमिका
Aug 8, 2025|Dr Keerti Khetan

पोस्टीरियर प्लेसेंटा क्या है? गर्भावस्था में प्लेसेंटा की भूमिका

Key takeaways

  • पोस्टीरियर प्लेसेंटा का अर्थ है प्लेसेंटा गर्भाशय की पीठ की ओर नाल का होना।
  • यह पूरी तरह सामान्य स्थिति है, चिंता की जरूरत नहीं।
  • इससे बच्चे की हलचल जल्दी और तेज महसूस होती है।
  • इससे सामान्य डिलीवरी की संभावना बढ़ जाती है।
  • प्लेसेंटा माँ और शिशु के बीच पोषण और ऑक्सीजन का पुल है।
  • लो-लाइंग या असामान्य दर्द हो तो डॉक्टर से तुरंत मिलें।
  • नियमित चेकअप स्वस्थ गर्भावस्था के लिए ज़रूरी है।

हम यह समझते हैं कि प्रेगनेंसी एक खूबसूरत सफर है और इस सफर में आपके मन में कई अनगिनत सवाल भी उठते होंगे। जब भी प्रेगनेंसी के दौरान अल्ट्रासाउंड होता है, तो एक डर या खतरा महिलाओं के मन में मंडराता रहता है कि उनका बच्चा स्वस्थ होगा या नहीं। सभी परिवार, खासतौर पर महिलाएं यह नहीं सुनना चाहती कि प्रेगनेंसी में कोई समस्या है। उन सभी समस्याओं में से ‘पोस्टीरियर प्लेसेंटा’ एक ऐसी स्थिति है, जिसके बारे में अक्सर महिलाओं को गलत जानकारी होती है।

यदि आप अपने और अपने बच्चे की सुरक्षा, विकास और भविष्य को लेकर विचार कर रहे हैं, तो आपके मन के सभी सवालों के जवाब इस ब्लॉग से आपको मिल जाएंगे। हर गर्भवती मां के अच्छे स्वास्थ्य, बच्चे की सुरक्षित ग्रोथ, और परिवार के सुकून की चाह यही है कि वह सही जानकारी लें और आवश्यकता के अनुसार सही इलाज या कदम उठाएं। प्रेगनेंसी में कोई भी समस्या दिखने पर तुरंत हमारे अनुभवी विशेषज्ञों से मिलें और इलाज के विकल्पों पर बात करें।

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पोस्टीरियर प्लेसेंटा क्या है? (What is Posterior Placenta?)

भारत में प्रेगनेंसी को लेकर पहले से बहुत सारी बातें चलते आई हैं। वहीं इसी बीच कुछ मेडिकल शब्द है, जिससे वह खुद ही अनजान होती हैं। ऐसे में जब वह अपने अल्ट्रासाउंड के रिपोर्ट में ‘पोस्टीरियर प्लेसेंटा’ लिखा देखती हैं, तो वह घबरा जाती हैं कि यह क्या चीज है।

पोस्टीरियर प्लेसेंटा वह स्थिति है, जब आपकी नाल या प्लेसेंटा (placenta) गर्भाशय की पिछली दीवार यानी पीठ (रीढ़) की ओर जुड़ी होती है। अक्सर इस स्थिति को सामान्य स्थिति में ही गिना जाता है और खतरे का संकेत नहीं माना जाता है। करीब 70-75% महिलाओं में प्रेगनेंसी के दौरान यह स्थिति देखी जाती है, और यह डिलीवरी, बच्चे के विकास या मां की सेहत के लिए आमतौर पर कोई परेशानी नहीं होती है। यदि आपके रिपोर्ट में पोस्टीरियर प्लेसेंटा लिखा है, तो घबराइए नहीं। यह एक सामान्य अवस्था है, जो स्वस्थ गर्भावस्था के साथ जुड़ी रहती है और यदि आपके मन में संदेह है, तो तुरंत एक अनुभवी स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलें और उनसे अपने प्रश्नों के उत्तर को जानें।

गर्भावस्था में प्लेसेंटा की भूमिका (Role of Posterior Placenta in Pregnancy)

हमें यह समझना पड़ेगा कि प्लेसेंटा मां और अजन्मे बच्चे के बीच के बीच एक जीवन बचाने वाला पुल है, जो बच्चे को वह सारे आवश्यक एवं पोषक तत्व प्रदान करता है, जिससे वह सारा समय मां के गर्भ में जीवित और स्वस्थ रहे। यह मुख्यतः इन कार्यों के लिए जिम्मेदार होता है – 

  • ऑक्सीजन और पोषण पहुंचाना: प्लेसेंटा की मदद से मां का खून बच्चे तक ऑक्सीजन और जरूरी पोषक तत्व पहुंचाता है। उन्हीं की मदद से बच्चों में ग्रोथ होती है।
  • अपशिष्ट बाहर निकालना: शिशु के शरीर से जो भी हानिकारक पदार्थ निकलता है, वह प्लेसेंटा के जरिए मां के रक्त में वापस जाता है और मां का शरीर उसे शरीर से बाहर निकालता है।
  • हार्मोन बनाना: प्लेसेंटा गर्भावस्था को बनाए रखने में सहायक हार्मोन बनाता है, जैसे कि HCG (hcg level in pregnancy), प्रोजेस्टेरोन और एस्ट्रोजन (how to increase estrogen hormone in hindi)
  • संक्रमण से सुरक्षा: यह माँ की एंटीबॉडी बच्चों तक पहुँचाकर संक्रमण और बीमारियों से रक्षा करता है। इसके लिए मां को भी एक स्वस्थ जीवन शैली को अपनाने की सलाह दी जाती है।
  • बच्चे के अंगों की ग्रोथ: शिशु के मस्तिष्क, फेफड़े और अन्य अंगों के विकास के लिए जरूरी तत्व प्लेसेंटा से ही मिलते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, हर साल लगभग 13 करोड़ गर्भवती महिलाओं में, 95% में प्लेसेंटा का विकास बिलकुल सामान्य ढंग से होता है, जिससे मां और बच्चे दोनों सुरक्षित रहते हैं।

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प्लेसेंटा की स्थिति (पोस्टीरियर, एंटीरियर, आदि) और उसका प्रभाव (Position of Posterior Placenta)

अक्सर डॉक्टर दूसरी तिमाही में अल्ट्रासाउंड में प्लेसेंटा की स्थिति की जांच कर लेते हैं। चलिए उन सभी प्लेसेंटा की स्थितिओं के बारे में जानते हैं और समझते हैं कि उसका क्या प्रभाव होता है।

 

स्थिति  स्थान प्रभाव/महत्व
पोस्टीरियर (posterior placenta) पीठ की ओर हलचल जल्दी महसूस होती है, सामान्य डिलीवरी की संभावना अधिक होती है।
एंटीरियर (anterior placenta) पेट की ओर शिशु की हलचल देर से महसूस हो सकती है और कोई विशेष खतरा नहीं होता है।
फंडल (fundal placenta) गर्भाशय का ऊपरी भाग सबसे सुरक्षित, सभी ओर से स्पेस उपलब्ध है।
लो-लाइंग/प्रीविया (low-lying/previa placenta) गर्भाशय-मुख के पास जटिलता/ब्लीडिंग की संभावना होती है। इसमें विशेष निगरानी की जरूरत होती है।
लैटरल (lateral placenta) दाएँ या बाएँ दीवार सामान्य, और अक्सर इसमें कोई समस्या नहीं होती है।

 

गर्भावस्था के दौरान प्लेसेंटा कभी-कभी ऊपर, साइड या पीछे-नीचे भी खिसक सकता है (placental migration), जो ज्यादातर मामलों में डिलीवरी के समय तक सही स्थान पर आ जाता है। इसलिए समय-समय पर डॉक्टर से जांच और परामर्श आवश्यक होता है।

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पोस्टीरियर प्लेसेंटा और इसके फायदे (Benefits of Posterior Placenta)

पोस्टीरियर प्लेसेंटा एक सामान्य स्थिति है, जिसके कुछ फायदे भी होते हैं जैसे कि – 

  • हलचल जल्दी महसूस होती है: पोस्टीरियर प्लेसेंटा होने से मां को शिशु की हरकत जल्दी और स्पष्ट महसूस होती है। इसके कारण मां को अपने बच्चे का अनुभव होता है।
  • सामान्य प्रसव की संभावना अधिक: इस स्थिति में प्लेसेंटा गर्भाशय-मुख से दूर होता है, जिससे आमतौर पर नॉर्मल डिलीवरी (normal delivery) में सुविधा होती है।
  • बच्चे को बेहतर ग्रोथ का स्थान: शिशु के घूमने और विकास के लिए ज़्यादा जगह मिलती है, जिससे उसका शारीरिक विकास और सक्रियता बढ़ती है।
  • प्रीविया का जोखिम कम: क्योंकि पोस्टीरियर प्लेसेंटा नीचे नहीं होता, प्लेसेंटा प्रीविया (जहाँ नाल गर्भाशय-मुख ढक लेती है) का जोखिम बहुत कम हो जाता है।

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पोस्टीरियर प्लेसेंटा की संभावित समस्याएं (Complications with Posterior Placenta)

पोस्टीरियर प्लेसेंटा सामान्य है, पर कुछ महिलाओं को अपनी प्रेगनेंसी के दौरान निम्न समस्याएं हो सकती हैं – 

  • पीठ दर्द: पीठ पर अधिक दबाव के कारण कुछ महिलाओं को दर्द महसूस हो सकता है।
  • लो-लाइंग पोस्टीरियर: यदि नाल नीचे की ओर झुकी है, तो डिलीवरी में ब्लीडिंग के खतरे और प्लेसेंटा प्रीविया जैसी जटिलता उत्पन्न हो सकती है।
  • ट्रामा/चोट: गिरना, एक्सीडेंट या दबाव से नाल अलग हो सकती है, जिसका मेडिकल टर्म ‘अब्रप्शन’ (placental abruption) है, जो इमरजेंसी बन सकता है।
  • बहुत कम में संक्रमण/रुकावट: दुर्लभ मामलों में नाल की सही स्थिति न होने से पोषण/ऑक्सीजन आपूर्ति बाधित हो सकती है और कुछ मामलों में संक्रमण का खतरा भी उत्पन्न हो सकता है।

किसी भी असामान्य दर्द, अचानक ब्लीडिंग, या हलचल में बदलाव महसूस हो तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लें।

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प्लेसेंटा का कार्य और इसके बिना गर्भावस्था का विकास 

प्लेसेंटा मां और बच्चे के बीच जीवन का सबसे अहम सेतु है। इसके बिना प्रेगनेंसी की कल्पना ही मुश्किल है। यदि ऐसा नहीं होता है या फिर प्लेसेंटा अपना सामान्य काम नहीं कर पा रहा है, तो शिशु का विकास सही से नहीं हो पाता है, जिसके कारण प्री-टर्म डिलीवरी (preterm delivery/labour) या गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। 

हमेशा याद रखें, हर माँ और परिवार के लिए प्लेसेंटा की स्थिति और सेहत पर ध्यान देना, डॉक्टर के संपर्क में रहना, और नियमित चेकअप कराना सबसे असरदार रास्ता है। स्वस्थ माँ और बच्चे के भविष्य के लिए प्लेसेंटा की स्वस्थ बहुत ज्यादा आवश्यक है।

यदि आप भी अपने गर्भावस्था की रिपोर्ट या पोस्टीरियर प्लेसेंटा को लेकर संशय में हैं, तो आज ही विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करें या ऑनलाइन अपनी रिपोर्ट साझा करें। इसके लिए आप हमारे अनुभवी डॉक्टर से भी परामर्श ले सकते हैं।

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अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs related to posterior placenta)

क्या पोस्टीरियर प्लेसेंटा में खतरा है?

नहीं! 95% से ज्यादा मामलों में यह एकदम सामान्य व सुरक्षित स्थिति है। बस किसी भी असामान्य दर्द, ब्लीडिंग या हलचल कम होने पर डॉक्टर को बताएं।

क्या प्लेसेंटा की स्थिति बदल सकती है?

हां, विशेषकर शुरुआती महीनों में, जैसे-जैसे आपका गर्भाशय बढ़ता है, प्लेसेंटा ऊपर या साइड में खुद-ब-खुद सरक सकता है, जिसे मेडिकल भाषा में ‘प्लेसेंटल माइग्रेशन’ कहते हैं।

सबसे अच्छी प्लेसेंटा पोजीशन कौन सी है?

प्लेसेंटा अगर ‘फंडल’ (ऊपर) या ‘पोस्टीरियर’ है और बच्चेदानी, मुख को नहीं ढंके, तो वह सबसे उपयुक्त स्थिति मानी जाती है।

प्रेगनेंसी के दौरान पेट में दर्द होने के कारण और इलाज
Aug 7, 2025|Dr. Astha Dayal

प्रेगनेंसी के दौरान पेट में दर्द होने के कारण और इलाज

  • प्रेगनेंसी के दूसरे ट्राइमेस्टर में पेट दर्द होना एक सामान्य बात है। 
  • पेट दर्द आमतौर पर हार्मोनल बदलाव, राउंड लिगामेंट स्ट्रेचिंग, ब्रेक्सटन-हिक्स कॉन्ट्रैक्शन और गैस या कब्ज के कारण होता है। हालांकि पेट दर्द को आप घरेलू उपायों की मदद से ठीक कर सकते हैं। 
  • कुछ परिस्थितियों जैसे एक्टोपिक प्रेगनेंसी, यूट्रिन इंफेक्शन, मिसकैरेज, या प्लेसेंटा संबंधी समस्याओं की वजह से पेट दर्द होना गंभीर समस्या हो सकती है, इसलिए आपको तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से जाकर संपर्क करना चाहिए। 

एक महिला के लिए मां बनना एक बेहद खूबसूरत एहसास होता है। प्रेगनेंसी सिर्फ शरीर में ही नहीं, बल्कि मन और सोच में भी बदलाव लाती है। इस दौरान खुशी, डर, चिंता और मातृत्व सब एक साथ महसूस होते हैं। 9 महीनों के दौरान प्रेगनेंट महिला के शरीर में कई बदलाव आते हैं, जो उसे मानसिक रूप से एक नया अनुभव देते हैं। इसी यात्रा के दौरान कई शारीरिक बदलाव होते हैं और उन्हीं में से एक है प्रेगनेंसी में पेट दर्द।

ज्यादातर महिलाओं को प्रेगनेंसी के दौरान पेट में दर्द होना सामान्य है और इसे लेकर ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं होती। लेकिन कुछ खास स्थितियों में यह दर्द किसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि पेट में दर्द कब नॉर्मल होता है, इसके कारण क्या हैं, इसे कैसे कम किया जा सकता है और किन परिस्थितियों में आपको डॉक्टर से मिलना चाहिए।

क्या प्रेगनेंसी के दौरान पेट में दर्द सामान्य होता है?

हां, प्रेगनेंसी के दौरान पेट में हल्का दर्द या ऐंठन होना सामान्य बात है। यह दर्द शरीर में हो रहे हार्मोनल बदलावों के कारण होता है, क्योंकि उस समय महिला का शरीर नई जिंदगी को बनाने और संभालने के लिए खुद को तैयार कर रहा होता है। लेकिन कई बार पेट दर्द कुछ दूसरे कारणों की वजह से भी हो सकता है। ऐसे में आपको स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलना जरूरी हो जाता है।

इसे भी पढ़ें: प्रेगनेंसी में कितने समय के बाद सम्बन्ध बनाना बंद कर देना चाहिए

प्रेगनेंसी के दौरान पेट में दर्द के कारण (Causes of stomach pain during pregnancy)

प्रेगनेंसी का समय बहुत सेंसिटिव होता है और इस दौरान आपको अपनी सेहत का ध्यान रखना जरूरी होता है। 9 महीने के सफर में आपको पेट दर्द की समस्या भी हो सकती है, जिसके कुछ कारण नीचे दिए गए हैं-

जब बच्चा धीरे-धीरे बड़ा होता है, तो यूट्रस भी फैलने लगता है। यूट्रस को सहारा देने के लिए एक पतली और मजबूत पट्टी होती है, जिसे राउंड लिगामेंट कहते हैं। जब बच्चा बढ़ता है, तो ये लिगामेंट खिंचती हैं, जिसकी वजह से पेट के निचले हिस्से में तेज दर्द महसूस हो सकता है। आमतौर पर प्रेगनेंसी के दूसरे ट्राइमेस्टर में पेट दर्द होना (things to expect in 2nd trimester of pregnancy) आम होता है।

  • ब्रेक्सटन-हिक्स कॉन्ट्रैक्शन (Braxton Hicks Contractions)

प्रेगनेंसी के दौरान एक समय ऐसा आता है जब पेट के निचले हिस्से में हल्की ऐंठन या खिंचाव जैसा महसूस होता है, जिसे प्रैक्टिस कॉन्ट्रैक्शन (practise contraction) कहते हैं। यह दर्द लेबर पेन की तरह ही होता है लेकिन यह असली नहीं होता, बल्कि यह महिला के शरीर को डिलीवरी के लिए तैयार करता है। आमतौर पर दूसरे ट्राइमेस्टर में यह दर्द शुरू होता है। हालांकि, यह पेट दर्द लगातार नहीं होता, बल्कि कभी-कभी होता है।

  • गैस और कब्ज (Gas & Constipation)

प्रेगनेंसी के दौरान गैस (गैस की वजह से पेट फूलने के घरेलू उपचार क्या हैं), एसिडिटी (एसिडिटी से तुरंत राहत पाने के घरेलू नुस्खे) और पेट में भारीपन महसूस होना आम बात है। यह कोई गंभीर समस्या नहीं है, लेकिन इस पर ध्यान देना जरूरी है। आमतौर पर प्रेगनेंसी के समय शरीर में हार्मोन बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं, जिसकी वजह से डाइजेशन (digestion) धीमा पड़ जाता है और खाना जल्दी डायजेस्ट नहीं होता। इसी वजह से पेट में गैस, कब्ज जैसी समस्या पैदा हो जाती है और दर्द महसूस होने लगता है।

  • एक्टोपिक प्रेगनेंसी (Ecotopic Pregnancy)

आमतौर पर सामान्य प्रेगनेंसी में बच्चा यूट्रस के अंदर होता है। लेकिन एक्टोपिक प्रेगनेंसी में बच्चा यूट्रस के बाहर होता है। यह एक गंभीर मेडिकल स्थिति होती है, जहां बच्चे का विकास नहीं होता और यह स्थिति गर्भवती महिला की जान के लिए भी खतरा बन सकती है।

  • अन्य संभावित कारण

प्रेगनेंसी के दौरान यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI – Symptoms & Prevention), समय से पहले लेबर पेन (Labour Pain Management), मिसकैरेज (गर्भपात के बाद गर्भधारण: समय, स्वास्थ्य और सलाह) का खतरा, गॉल ब्लैडर में पथरी, अपेंडिक्स में सूजन, प्लेसेंटा का खिसकना या फटना और यूट्रस में सूजन भी पेट दर्द का कारण हो सकते हैं।

प्रेगनेंसी के दौरान पेट दर्द को कम करने के उपाय

प्रेगनेंसी के दौरान हल्का पेट दर्द होना आम बात है और इस दर्द को कुछ आसान घरेलू तरीकों से अपनाकर आराम पाया जा सकता है:

  • धीरे-धीरे चलना और हल्की स्ट्रेचिंग

प्रेगनेंसी के दौरान मसल्स और लिगामेंट्स पर खिंचाव आने लगता है, जिससे पेट के नीचे हल्का दर्द महसूस हो सकता है। इस दर्द को कम करने के लिए प्रेगनेंट महिलाएं हल्की स्ट्रेचिंग (stretching) कर सकती हैं। पेट दर्द को कम करने के लिए आप धीरे-धीरे चल सकती हैं।

  • प्रेगनेंसी योग

प्रेगनेंट वुमेन के लिए खास योगासन बनाए गए हैं, जिनकी मदद से फ्लेक्सिबिलिटी और मांसपेशियों को आराम मिल सकता है। आपको किसी योगा ट्रेनर की देखरेख में योग करना सही रहेगा। प्रेगनेंसी के दौरान आप स्विमिंग करके मांसपेशियों में खिंचाव को भी कम कर सकती हैं।

  • पेल्विक टिल्ट एक्सरसाइज

यह एक आसान एक्सरसाइज है, जो पेट और पीठ दर्द को कम कर सकती है। इसे दीवार या मीन पर बैठकर किया जा सकता है। आप किसी योगा ट्रेनर से सीख सकती हैं।

  • गर्म सिकाई या गुनगुने पानी से नहाना

आप पेट के निचले हिस्से या कमर पर हॉट वाटर बैग की मदद से सिकाई कर सकती हैं। प्रेगनेंसी के दौरान दिन में एक बार गुनगुने पानी से नहाना आपके लिए फायदेमंद हो सकता है और इससे शरीर को आराम मिलता है।

  • मैटरनिटी बेल्ट का सहारा लें

आजकल बाजार में पेट और पीठ को सपोर्ट करने वाली बेल्ट मिलती हैं, जिन्हें गर्भवती महिलाएं आराम से पहन सकती हैं।

  • सही खानपान

प्रेगनेंसी के दौरान गैस, कब्ज या पाचन में गड़बड़ी से पेट दर्द होना आम समस्या है। ऐसे में आपको दिन में 3 बार खाना खाने की जगह 5-6 बार थोड़ा-थोड़ा खाना सही रहेगा। इससे पेट पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ता और खाना आराम से हजम हो जाता है। आपको रोजाना 8 से 10 गिलास पानी पीना चाहिए।

  • आराम करना जरूरी

प्रेगनेंसी के दौरान आपको थोड़ा आराम करना जरूरी होता है। ज्यादा देर तक खड़े होकर या बैठकर काम न करें। सोते समय अपनी पीठ के नीचे और घुटनों के बीच तकिया रखें। इससे शरीर को सहारा मिलता है और दर्द कम हो सकता है। अगर आपको खांसी या छींक आती हैं, तो थोड़ा झुक जाएं। इससे पेट के निचले हिस्से में खिंचाव कम पड़ता है।

इसे भी पढ़ें: जानिए प्रेगनेंसी में संबंध बनाना चाहिए या नहीं ?

कब डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए?

प्रेगनेंसी के दौरान हल्का दर्द या परेशानी होना सामान्य बात हो सकती है, लेकिन कुछ खास स्थितियों में आपको तुरंत डॉक्टर को दिखाना जरूरी हो जाता है। अगर आपको नीचे दिए गए लक्षणों में से कोई भी महसूस हो रहा है, तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें।

  • अगर आपके पेट में तेज और लगातार दर्द हो रहा है।
  • अगर आपको थोड़ी ब्लीडिंग हो रही है और लगातार हल्का खून निकल रहा है।
  • पेशाब करते समय जलन या दर्द महसूस हो रहा है।
  • अगर आपको बहुत ठंड या बुखार जैसा लग रहा है।
  • आपको बहुत उल्टी या मतली हो रही है।
  • प्रेगनेंसी के 20 हफ्तों के बाद अगर पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द हो रहा है, तो यह प्रीक्लेम्पसिया का संकेत हो सकता है।
  • अगर आपको 37वें हफ्ते से पहले बार-बार लेबर पेन जैसा दर्द महसूस हो रहा है।
  • अगर आपको बच्चे का मूवमेंट महसूस नहीं हो रहा है। ऐसी परिस्थितियों में आप हमारे अनुभवी गायनोलॉजिस्ट से संपर्क कर सकती हैं।

इसे भी पढ़ें: पीरियड्स मिस होने से पहले प्रेग्नेंसी के क्या लक्षण दिखाई देते हैं?

निष्कर्ष

प्रेगनेंसी एक बहुत ही खास और बदलावों से भरा समय होता है। इस समय आपके शरीर में बहुत तरह के बदलाव हो रहे होते हैं, जिसकी वजह से पेट में होने वाली परेशानियां आम हो जाती हैं, जिन्हें आप घरेलू तरीकों से ठीक कर सकती हैं। लेकिन अगर परेशानी बढ़ती जा रही है, तो आपको किसी अनुभवी गायनोलॉजिस्ट (Gynaecologist) से संपर्क करना चाहिए और अपनी प्रेगनेंसी की यात्रा को खूबसूरत बनाना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नोत्तर (FAQs)

क्या प्रेगनेंसी में पेट का दर्द सामान्य होता है? 

हां, प्रेगनेंसी के दौरान पेट में दर्द होना सामान्य है, खासकर पहली और दूसरी तिमाही में क्योंकि उस समय बच्चा बढ़ रहा होता है और गर्भाशय में खिंचाव हो रहा होता है।

क्या गर्भावस्था के दौरान पेट में अत्यधिक दर्द होना खतरनाक होता है? 

प्रेगनेंसी के दौरान पेट में हल्का दर्द होना सामान्य है, लेकिन ज्यादा दर्द होना खतरे का संकेत हो सकता है। इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर को जाकर जांच कराएं।

प्रेगनेंसी के दौरान पेट में दर्द और सूजन का क्या कारण होता है? 

प्रेगनेंसी के दौरान पेट में दर्द और सूजन होने के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें शारीरिक, हार्मोनल बदलाव और पाचन से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं।

हल्दी वाले दूध पीने के स्वास्थ्य लाभ (benefits of turmeric milk)
Aug 7, 2025|Ms. Deepali Sharma

हल्दी वाले दूध पीने के स्वास्थ्य लाभ (benefits of turmeric milk)

आयुर्वेद में सदियों से हल्दी वाला दूध एक असरदार औषधि के तौर पर इस्तेमाल होता आ रहा है। इसे गोल्डन मिल्क भी कहा जाता है जिसको पीने से इम्यूनिटी बढ़ती है, शरीर की सूजन कम होती है और नींद अच्छी आती है। हालांकि, हल्दी वाले दूध को सीमित मात्रा में पीना फायदेमंद रहता है क्योंकि अधिक सेवन से पेट, किडनी में पथरी जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। खासतौर पर प्रेगनेंट महिलाओं को डॉक्टर की सलाह लेकर ही हल्दी वाला दूध पीना चाहिए। 

हल्दी वाले दूध को गोल्डन मिल्क कहा जाता है। आयुर्वेद में सैकड़ों सालों से हल्दी का इस्तेमाल पुरानी और असरदार औषधि के रूप में होता आ रहा है। भारत ही नहीं, बल्कि दुनियाभर के लोगों को हल्दी वाले दूध के फायदे अच्छी तरह से पता हैं। आमतौर पर लोग शरीर में सूजन को कम करने, बीमारियों से लड़ने और इम्यूनिटी सिस्टम को मजबूत करने में हल्दी वाला दूध पीना पसंद करते हैं। भारत में हमेशा से नेचुरल हेल्थ ड्रिंक के रूप में इसे पिया जाता रहा है, जो शरीर के साथ-साथ तनाव और डिप्रेशन जैसी समस्याओं से भी राहत पाने में मदद करता है। 

हल्दी को करक्यूमा लोंगा पौधे की जड़ यानी राइजोम से तैयार किया जाता है। कर्क्यूमिन हल्दी को उसका पीला रंग और औषधीय गुण देता है। कर्क्यूमिन में सूजनरोधी और एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं। जब इसे दूध के साथ मिलाया जाता है, तो यह एक पावरफुल ड्रिंक बन जाती है। 

हल्दी वाले दूध के स्वास्थ्य लाभ

हल्दी वाले दूध पीने के फायदे हम सभी जानते हैं, क्योंकि इसमें मौजूद कर्क्यूमिन हमारे शरीर के लिए फायदेमंद होता है। 

1. इम्यूनिटी बढ़ाता है

अगर आप रोजाना हल्दी वाला दूध पीते हैं, तो आपका इम्यून सिस्टम मजबूत होता है और आपका शरीर बैक्टीरिया, वायरस और फंगल इंफेक्शन से लड़ने की क्षमता रखता है। (immunity boosting foods in hindi)

2. सूजन और जोड़ों के दर्द में आराम देता है

अगर किसी को घुटनों या जोड़ों में दर्द, सूजन या शरीर में सूजन की समस्या बनी रहती है, तो उनके लिए हल्दी वाला दूध पीना फायदेमंद हो सकता है। हल्दी में पाए जाने वाले कर्क्यूमिन तत्व से सूजन को कम किया जा सकता है। साल 2016 में जर्नल ऑफ मेडिकल फूड द्वारा प्रकाशित रिसर्च में पाया गया कि हल्दी लेने से ऑस्टियोआर्थराइटिस (osteoarthritis) के मरीजों में जोड़ों का दर्द काफी कम हुआ और उनकी लाइफस्टाइल भी काफी बेहतर हो गई। 

3. पाचन में मदद करता है

अगर आपको एसिडिटी (acidity home remedies in hindi), अपच (food for upset stomach) और पेट फूलने (bloating) जैसी समस्याएं बनी रहती हैं, तो हल्दी वाला दूध आपके लिए रामबाण उपाय हो सकता है। हल्दी पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करती है और हमारे शरीर से वसा (fat) यानी फैट को पचाने में मदद करती है। 

4. नींद में सुधार करता है

अगर आपको नींद कम आती है और बार-बार नींद टूटती है, तो आपके लिए रात में सोने से पहले हल्दी वाला गर्म दूध पीना फायदेमंद हो सकता है। दरअसल गर्म दूध में ट्रिप्टोफैन (tryptophan) नामक तत्व पाया जाता है, जो दिमाग में सेरोटोनिन (serotonin) और मेलाटोनिन (melatonin) नामक केमिकल्स बनाने में मदद करता है। रात को हल्दी वाला दूध पीने से आपको अच्छी नींद आ सकती है। 

5. दिल की सेहत के लिए फायदेमंद

हल्दी में मौजूद कर्क्यूमिन (curcumin) केमिकल से ब्लड फ्लो बेहतर होता है और कोलेस्ट्रॉल (cholesterol- home remedies to lower cholesterol level) लेवल कम होता है। हल्दी वाला दूध खराब कोलेस्ट्रॉल (बैड कोलेस्ट्रॉल) को शरीर में जमा होने से और धमनियों को बंद या संकुचित होने से रोकने में मदद करता है।

6. वजन कम करने में मदद करता है

अगर आप हल्दी वाले दूध को रोजाना एक्सरसाइज करने के बाद लेते हैं, तो यह वजन कम करने में मदद कर सकता है (तेजी से वजन कम करने के घरेलू उपाय और उपचार)। आमतौर पर हल्दी शरीर के मेटाबोलिज्म (metabolism) को संतुलित रखने में मदद करती है और शरीर में एक्स्ट्रा फैट को जमा नहीं होने देती है। 

7. त्वचा के लिए लाभदायक

अगर आपको मुंहासे यानी एक्ने (home remedies for acne in hindi), एक्जिमा (eczema) और त्वचा संबंधी रोग (skin disease) हैं, तो आपके लिए हल्दी वाला दूध पीना लाभकारी हो सकता है। यह हेल्थ ड्रिंक शरीर को अंदर से डिटॉक्स (विषैले पदार्थों को निकालना) करने में मदद करती है।

8. एंटीऑक्सीडेंट गुणों से भरपूर

हल्दी में पाए जाने वाले कर्क्यूमिन तत्व में एंटीऑक्सीडेंट (antioxidant) गुण पाए जाते हैं, जो शरीर में मौजूद हानिकारक कणों को खत्म करते हैं। दरअसल ये हानिकारक कण शरीर से झुर्रियां (wrinkles), थकान और पुरानी बीमारियों को लाने का काम करते हैं। अगर आप रोजाना हल्दी वाला दूध पीते हैं, तो हानिकारक कण खत्म होने लगते हैं और आप यंग और एनर्जेटिक दिखाई देने लगते हैं। 

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क्या हल्दी वाले दूध के कोई दुष्प्रभाव हैं?

आमतौर पर हल्दी वाला दूध अधिकतर लोगों के लिए फायदेमंद ही साबित होता है, लेकिन इसे एक सीमित मात्रा में पीना चाहिए। अगर आप इसे ज्यादा पी लेते हैं, तो आपको कुछ खास स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती है, जैसे कि – 

1. पेट से जुड़ी समस्याएं

अगर आप पहली बार हल्दी वाला दूध पी रहे हैं, तो आपको शुरुआत एक कप से करनी चाहिए और देखना चाहिए कि आपके शरीर पर इसका क्या असर होता है। अगर आप दूध में बहुत ज्यादा हल्दी डालकर पीते हैं, तो आपको गैस्ट्रिक, मतली और दस्त जैसी समस्याएं हो सकती हैं। 

2. गुर्दे की पथरी का खतरा

हल्दी में कर्क्यूमिन के अलावा ऑक्सालेट नामक तत्व पाया जाता है और जब आप दूध में हल्दी मिलाकर पीते हैं, तो यह शरीर में कैल्शियम के साथ मिल जाता है। कई बार यह किडनी में पथरी (kidney stone ke kaaran, lakshan aur upchar) बनाने का कारण भी बन सकता है। अगर आपको किडनी स्टोन की समस्या है या पहले रह चुकी है, तो आपको हल्दी वाला दूध पीने से पहले आप हमारे न्यूट्रिशनिस्ट से सलाह ले सकते हैं।  

3. खून को पतला करना

अगर आप खून को पतला करने वाली दवाएं ले रहे हैं, तो हल्दी वाला दूध लेने से परहेज करें। ऐसा नहीं करने से शरीर में अचानक ब्लीडिंग का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए आपको सलाह दी जाती है कि अगर आप कोई भी दवा ले रहे हैं, तो उसके साथ हल्दी वाला दूध पीने से पहले आप हमारे न्यूट्रिशनिस्ट से सलाह ले सकते हैं। 

4. गर्भावस्था और स्तनपान के दौरान सावधानी जरूरी

हल्दी वाला दूध प्रेगनेंसी (pregnancy) या ब्रेस्ट फीडिंग (breastfeeding tips) कराने वाली महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता है, क्योंकि हल्दी वाले दूध में कर्क्यूमिन सप्लीमेंट की मात्रा अधिक रहती है, जो गर्भाशय में ऐंठन या हार्मोनल बदलाव (hormonal imbalance) का खतरा पैदा कर सकता है। इसलिए प्रेगनेंट महिलाओं को हल्दी वाला दूध पीने से पहले आप हमारे न्यूट्रिशनिस्ट से सलाह ले सकते हैं। 

5. एलर्जी की समस्या भी हो सकती है

अगर आपको हल्दी या दूध से एलर्जी है, तो हल्दी वाला दूध पीने के बाद कुछ लक्षण दिखाई दे सकते हैं। 

  • स्किन पर लाल चकत्ते या खुजली
  • छोटे-छोटे दाने
  • सांस लेने में दिक्कत या घबराहट महसूस होना

अगर आपको ऐसी समस्याएं होने लगती हैं, तो आपको तुरंत इसका सेवन बंद कर देना चाहिए। 

और पढ़े: बदलते मौसम में बीमारियों से बचने के आसान टिप्स

हल्दी वाला दूध कैसे बनाएं?

वैसे तो हल्दी वाला दूध बनाना बहुत आसान होता है और आप इसे अपनी जरूरत और स्वाद के हिसाब से बना सकते हैं। 

हल्दी वाला दूध बनाने की सामग्री

  • 1 कप दूध 
  • ½ छोटा चम्मच हल्दी पाउडर
  • 1 चुटकी काली मिर्च
  • ¼ छोटा चम्मच दालचीनी 
  • 1 छोटा चम्मच शहद या गुड़ 

हल्दी वाला दूध बनाने की विधि

  1. एक पैन में दूध डालें और इसे धीमी या मीडियम आंच पर गर्म करें। 
  2. अब उसमें हल्दी, काली मिर्च और दालचीनी डालें।
  3. दूध को करीब 5 से 7 मिनट तक हल्की आंच पर पकाएं ताकि सभी मसाले अच्छी तरह से मिक्स हो जाएं। 
  4. फिर गैस को बंद करें और थोड़ा ठंडा होने दें।
  5. अगर आपने दालचीनी डाली है, तो दूध को छान लें। 
  6. फिर, गिलास में हल्दी वाला दूध लेकर उसमें शहद मिलाएं और गुनगुना करके पिएं। 

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निष्कर्ष

आजकल लोग नैचुरल और बिना साइड इफेक्ट वाले उपाय अपना रहे हैं और ऐसे में हल्दी वाला दूध प्राकृतिक दवा की तरह काम करता है। यह उपाय आयुर्वेद और विज्ञान के बीच सामंजस्य बिठाने का काम करता है। यह पेय पदार्थ केवल स्वादिष्ट ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य लाभ से भरपूर भी है। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नोत्तर (FAQs Around Turmeric Milk)

क्या हल्दी दूध रात में पीना चाहिए?

हां, हल्दी दूध को रात में पीने से नींद अच्छी आती है और शरीर को आराम मिलता है। 

क्या हल्दी दूध से वजन घटता है?

जी हां, हल्दी दूध पीने से वजन कम हो सकता है। इस हेल्थ ड्रिंक में एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटीऑक्सीडेंट और जरूरी फैटी एसिड होते हैं, जो शरीर में गर्मी पैदा करते हैं, जिससे शरीर में जमा फैट बर्न होता है और वजन कम करने में मदद मिलती है।

हल्दी दूध से क्या त्वचा पर कोई फर्क पड़ता है?

जी हां, हल्दी दूध स्किन के लिए बहुत फायदेमंद होता है। दरअसल हल्दी में कर्क्यूमिन तत्व पाया जाता है, जिसमें एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पाए जाते हैं, जो मुंहासों को कम करने और त्वचा की रंगत को सुधारने में मदद करता है। इसके अलावा, दूध में लैक्टिक एसिड पाया जाता है, जो प्राकृतिक एक्सफोलिएंट के रूप में काम करता है, जो डेड स्किन्स को हटाने में मदद करता है। 

क्या हर रोज हल्दी वाला दूध पीना अच्छा है?

जी हां, रोजाना हल्दी वाला दूध पीना फायदेमंद होता है और इससे इम्यूनिटी सिस्टम मजबूत होता है। हालांकि, अगर आपको कोई बीमारी है या किसी बीमारी का इलाज चल रहा है, तो डॉक्टर की सलाह लेकर ही हल्दी वाला दूध पीना सही रहता है।  

हल्दी वाला दूध किन्हें नहीं पीना चाहिए? 

हल्दी वाला दूध गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल वाले, गर्भवती महिलाओं, पित्ताशय की समस्या वाले, लीवर की बीमारी वाले, लैक्टोज इनटॉलेरेंस वाले लोगों को नहीं पीना चाहिए।  

पीरियड्स मिस होने से पहले प्रेग्नेंसी के क्या लक्षण दिखाई देते हैं? (pregnancy symptoms before missed period in hindi)
Aug 7, 2025|Dr. Anjali Kumar

पीरियड्स मिस होने से पहले प्रेग्नेंसी के क्या लक्षण दिखाई देते हैं? (pregnancy symptoms before missed period in hindi)

प्रेगनेंसी एक महिला की जिंदगी की सबसे खूबसूरत यात्रा होती है। आमतौर पर जब फर्टिलाइज एग यूट्रस की दीवार पर चिपक जाता है, तो उसे इम्प्लांटेशन कहते हैं। वहीं इम्प्लांटेशन के 6 से 12 दिन बाद महिलाओं को प्रेगनेंसी के लक्षण पीरियड से पहले महसूस होने लगते हैं। 

हर महिला के जीवन में प्रेगनेंसी एक बेहद खास और भावनात्मक यात्रा होती है। मां बनना केवल एक बायोलॉजिकल प्रोसेस नहीं है, बल्कि यह एक सुंदर और अनुभवी एहसास है। जब एक महिला के भीतर एक नई जिंदगी पनपती है, तो वह केवल शारीरिक रूप से नहीं बल्कि भावनात्मक रूप से भी बदलने लगती है। उसके सपनों और सोच में एक नन्ही-सी मुस्कान बसने लगती है।

मां बनने में बेचैनी भी है और उम्मीद भी। प्रेगनेंसी के सफर को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है, इसे केवल दिल से समझा जा सकता है। कई बार महिलाएं पीरियड मिस होने से पहले ही अपने शरीर में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों को महसूस करने लगती हैं और उन्हें एहसास होने लगता है कि शायद वह प्रेगनेंट है? 

पीरियड्स मिस होना प्रेगनेंसी का एक मुख्य लक्षण भी है, और यदि आपके भी पीरियड्स मिस हुए हैं, तो हम आपको सलाह देंगे कि आप हमारे अनुभवी स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलें और परामर्श लें।

प्रेगनेंसी क्या है?

आमतौर पर प्रेगनेंसी के लिए ओव्यूलेशन का टाइम जरूरी होता है। जब महिला के शरीर में ओव्यूलेशन होता है, तब ओवरी से एक एग निकलता है और फैलोपियन ट्यूब में पहुंचता है। वहां वह स्पर्म का इंतजार करता है। अगर 12 से 24 घंटे के अंदर आप शारीरिक संबंध बनाते हैं और स्पर्म उस एग तक पहुंच जाता है, तो वह एग फर्टिलाइज (egg fertilization) हो जाता है। इसके बाद यह भ्रूण बनता है और महिला के गर्भाशय (uterus) की दीवार पर चिपक जाता है, इसे इम्प्लांटेशन (Embryo Implantation) कहा जाता है। कुछ महिलाओं को इस समय हल्की ब्लीडिंग (light bleeding) होने लगती है, जिसे इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग (implantation bleeding) कहते हैं। 

प्रेगनेंसी लक्षण जल्दी क्यों दिखाई देते हैं?

जब फर्टिलाइज एग यूट्रस में चिपकता है, तब महिला के शरीर में कुछ हार्मोन जैसे कि एचसीजी (hCG), प्रोजेस्टेरोन (Progesterone) और एस्ट्रोजेन (Estrogen) तेजी से बढ़ने लगते हैं। इन हार्मोन्स की वजह से शरीर में बदलाव महसूस होने लगते हैं। यह बदलाव आपको पीरियड्स (periods) से पहले भी महसूस हो सकते हैं।

इसे भी पढ़ें: प्रेगनेंसी के पहले महीने में क्या क्या होता है?

प्रेगनेंसी के लक्षण जो पीरियड से पहले होते हैं (symptoms of pregnancy before periods in hindi)

कई बार पीरियड शुरू होने से पहले ही महिलाएं प्रेगनेंट होने के हल्के संकेत महसूस करने लगती हैं। प्रेगनेंसी के शुरुआती लक्षण कुछ इस प्रकार हैं- 

1. हल्का स्पॉटिंग या इम्प्लांटेशन ब्लीडिंग

जब एग निकलकर स्पर्म से मिलकर फर्टिलाइल हो जाता है और फिर एग यूट्रस की दीवार में जाकर चिपक जाता है, तब उस समय कुछ महिलाओं को हल्की ब्लीडिंग होती है। 

2. हल्का पेट दर्द या ऐंठन

कुछ महिलाओं को प्रेगनेंसी की शुरुआत में हल्की मरोड़, पेट और पैर में ऐंठन भी महसूस हो सकती है। 

3. बॉडी टेम्परेचर बढ़ जाना 

अगर ओव्यूलेशन के 15-20 दिन बाद भी टेम्परेचर ज्यादा बना रहता है, तो यह प्रेगनेंसी के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं। 

4. थकान और नींद ज्यादा आना

प्रेगनेंसी के शुरुआती दिनों में महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसकी वजह से ज्यादा थकान और नींद महसूस हो सकती है। इसके अलावा, उन्हें पेट के नीचे भारीपन लग सकता है और चलने-फिरने के तरीके में थोड़ा बदलाव भी आ सकता है। 

5. ब्रेस्ट में बदलाव

प्रेगनेंसी के शुरुआती दिनों में ब्रेस्ट नरम और भारी महसूस हो सकते हैं। कुछ महिलाओं के निप्पल के आसपास की स्किन गहरे रंग के भी हो सकती है।

6. हल्की मतली या उलटी जैसा एहसास

आमतौर पर प्रेगनेंसी की शुरुआत में महिलाओं को मतली और उलटी महसूस होना आमबात है। आपको पीरियड से पहले मॉर्निग सिकनेस लग सकती है।

7. मूड जल्दी-जल्दी बदलना

प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसकी वजह से उनका मूड स्विंग (mood swings during pregnancy) होना सामान्य है। पीरियड से पहले महिलाएं ऐसा महसूस कर सकती हैं। 

8. सिरदर्द बना रहना

प्रेगनेंसी की शुरुआत में महिलाओं का ब्लड प्रेशर और शुगर कम हो सकता है, जो सिरदर्द और चक्कर का कारण बन सकता है। 

9. एसिडिटी की दिक्कत रहना

प्रेगनेंसी के दौरान पाचन क्रिया पर भी असर पड़ता है और महिलाओं को कब्ज की शिकायत हो सकती है। इसकी वजह पानी कम पीना, खानपान और हार्मोनल बदलाव हो सकते हैं। 

10. खाने का टेस्ट और स्मेल नहीं आना

कई बार प्रेगनेंट महिलाओं को अपने फेवरेट फूड से चिढ़ होने लगती है। उन्हें हर चीज की स्मेल बहुत तेज लगती है। उनके मुंह का स्वाद कसैला हो जाता है, जिसकी वजह से उन्हें खट्टा खाने का मन करता है। 

11. बार-बार टॉयलेट लगना 

प्रेगनेंसी की शुरुआत में बार-बार पेशाब लगना आम बात है, क्योंकि उस समय खून की मात्रा बढ़ने लगती है और किडनी पर ज्यादा प्रेशर पड़ता है। 

पीरियड से पहले प्रेगनेंसी के लक्षण कब शुरू होते हैं? 

आमतौर पर प्रेगनेंसी के लक्षण पीरियड से एक हफ्ते पहले और ओव्यूलेशन के 6 से 12 दिन के बाद आपको महसूस होने लग सकते हैं। आपको बता दें कि हर महिला में लक्षण अलग हो सकते हैं। किसी में एक या दो, तो किसी में कोई भी लक्षण नहीं दिखाई दे सकता है। हालांकि लक्षण नहीं भी दिखाई देते हैं, तो भी प्रेगनेंसी मुमकिन है। 

इसे भी पढ़ें: जानिए प्रेगनेंसी में संबंध बनाना चाहिए या नहीं ?

PMS और प्रेगनेंसी लक्षण में क्या फर्क होता है? 

आमतौर पर पीरियड्स आने से पहले महिलाओं को पेट दर्द, मूड स्विंग या ब्रेस्ट में दर्द जैसे लक्षण महसूस होते हैं जिसे PMS (प्री-मेंस्ट्रुअल सिंड्रोम) कहते हैं। लेकिन यही लक्षण प्रेगनेंसी के शुरुआती लक्षण भी हो सकते हैं। ऐसे में PMS और प्रेगनेंसी के लक्षणों को समझ पाना मुश्किल हो सकता है। 

 

लक्षण पीएमएस (PMS-Pre Menstrual Syndrome) प्रेगनेंसी
क्रैम्प्स (cramps) आमतौर पर पीरियड के दौरान तेज और दर्दभरी ऐंठन होती है।  प्रेगनेंसी की शुरुआत में हल्की और रुक-रुक कर होने वाली ऐंठन हो सकती है।
मूड स्विंग पीरियड से पहले चिड़चिड़ापन या उदासी महसूस हो सकती है। प्रेगनेंसी की शुरुआत में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसकी वजह से मूड स्विंग होते हैं। 
मतली (उल्टी जैसा लगना) पीरियड में कुछ महिलाओं को कभी-कभी उल्टी महसूस होती है। प्रेगनेंसी में मतली या उल्टी आना आमबात है। 
ब्रेस्ट में दर्द पीरियड शुरू होने से पहले ब्रेस्ट में हल्का दर्द और कोमलता आ जाती है। प्रेगनेंसी की शुरुआत में दर्द ज्यादा हो सकता है और ब्रेस्ट में भारीपन लगता है।

 

इसे भी पढ़ें: पीरियड कम आने के नुकसान: कारण, प्रभाव और इलाज

पीरियड आने से पहले प्रेगनेंसी के लक्षणों की पुष्टि कैसे करें?

यदि आपको पीरियड से पहले प्रेगनेंट होने के लक्षण महसूस हो रहे हैं, तो आप इसकी पुष्टि कर सकते हैं।

1. घर पर प्रेग्नेंसी टेस्ट (HPT)

आमतौर पर पीरियड मिस होने पर यह टेस्ट किया जाता है। इस टेस्ट की मदद से आपके यूरिन में HCG हार्मोन को पहचानने में मदद मिलती है। आमतौर पर सबसे अच्छा रिजल्ट पीरियड मिस होने के 1 हफ्ते बाद मिलता है। यह टेस्ट सुबह की पहली यूरिन से किया जाता है। 

2. ब्लड टेस्ट (blood test)

आप ब्लड के जरिए क्वालिटेटिव और क्वांटिटेटिव टेस्ट कराकर प्रेगनेंसी का पता कर सकते हैं। आप हमारे हॉस्पिटल (CK Birla Hospital) में जाकर इसकी जांच करा सकते हैं। 

अल्ट्रासाउंड (ultrasound)

आमतौर पर अल्ट्रासाउंड पीरियड मिस होने के 5 से 6 हफ्ते बाद किया जाता है। डॉक्टर इस टेस्ट के जरिए देखते हैं कि फीटस (fetus) सही जगह पर और स्वस्थ है या नहीं। 

निष्कर्ष

आमतौर पर प्रेगनेंसी की शुरुआत हैप्पी और हेल्दी होती है। लेकिन अगर आपको ज्यादा दर्द और ब्लीडिंग हो रही है, लगातार चक्कर और उल्टी आ रही है या फीवर, वायरल जैसी समस्या हो रही है, तो आपको हमारे अनुभवी गायनोलॉजिस्ट (gynaecologist) से सलाह जरूर लेनी चाहिए। 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नोत्तर 

1. क्या प्रेगनेंसी टेस्ट से पहले पीरियड आने के लक्षण दिख सकते हैं?

जी हां, प्रेगनेंसी के शुरुआती दिनों में आपको पीरियड जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं। आपको पेट में ऐंठन,  हल्की स्पॉटिंग आदि लक्षण दिखाई दे सकते हैं। 

2. प्रेगनेंसी के लक्षण कितने दिनों तक पहले दिख सकते हैं?

आमतौर पर कंसीव करने के 3-4 दिन बाद ही प्रेगनेंसी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।