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जब तपती दोपहर में आपका बच्चा अचानक चिड़चिड़ा होने लगे और उसकी मखमली त्वचा पर लाल-लाल दाने उभर आए, तो एक मां के दिल पर क्या गुजरती है, यह कोई नहीं समझ सकता। गर्मी का मौसम खुशियों के साथ-साथ बच्चों के लिए ‘हीट रैश’ की चुनौती भी लाता है।
छोटे बच्चे अपनी तकलीफ बोलकर नहीं बता सकते, वे सिर्फ रोकर अपनी बेचैनी जाहिर करते हैं। बच्चों में घमौरियाँ होना एक आम समस्या लग सकती है, लेकिन अगर सही समय पर घमौरियों का इलाज न किया जाए, तो यह त्वचा के गंभीर संक्रमण का रूप ले सकती है। सीके बिरला अस्पताल में हम आपकी इसी चिंता को समझते हैं और चाहते हैं कि आपका बच्चा गर्मी में भी खिलखिलाता रहे।
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वैज्ञानिक भाषा में घमौरियों को ‘मिलियारिया’ (Miliaria) कहा जाता है। सरल शब्दों में कहा जाए, तो जब त्वचा के रोम छिद्र बंद हो जाते हैं और पसीना बाहर नहीं निकल पाता, तो वह त्वचा के नीचे जमा होने लगता है। इससे छोटे-छोटे लाल दाने या फफोले बन जाते हैं, जिनमें तेज खुजली और चुभन होती है, जिसे घमौरियाँ कहा जाता है।
हम घमौरियाँ को एक गंभीर समस्या की श्रेणी में रखते हैं क्योंकि एक हालिया स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार, गर्मी के महीनों में पीडियाट्रिक डर्मेटोलॉजी (बच्चों के त्वचा रोग) के ओपीडी में आने वाले 35% से 40% मामले हीट रैश और घमौरियों से संबंधित होते हैं। चूँकि बच्चों की त्वचा वयस्कों की तुलना में बहुत पतली और संवेदनशील होती है, इसलिए बच्चों में हीट रैश बहुत जल्दी और गहराई से असर करते हैं।
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अक्सर माता-पिता पूछते हैं कि गर्मी में घमौरियाँ क्यों होती हैं? इसके पीछे कई शारीरिक और वातावरणीय कारण हैं –
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घमौरियाँ के लक्षण सिर्फ लाल दाने नहीं हैं, बल्कि यह बच्चे के व्यवहार में भी दिखते हैं –
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हर घमौरी एक जैसी नहीं होती। विशेषज्ञों के अनुसार इन्हें तीन भागों में बांटा जा सकता है:
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अगर आप सोच रहे हैं कि बच्चों में घमौरियाँ कैसे ठीक करें, तो सीके बिरला अस्पताल के विशेषज्ञ इन उपायों की सलाह देते हैं –
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घमौरियाँ का घरेलू इलाज अक्सर सबसे कारगर साबित होता है क्योंकि इसमें रसायन (Chemicals) नहीं होते। इसके लिए आप निम्न उपायों को अपना सकते हैं, जो हमारी दादी और नानी के द्वारा प्रमाणित भी होते हैं –
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इस टेबल की मदद से समझते हैं कि आपको इस गर्मी में अपने बच्चे को गर्मी से बचाने के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए –
| क्या करें (Dos) | क्या न करें (Don’ts) |
| ठंडक का ध्यान: बच्चे को हमेशा छायादार और ठंडी जगह पर ही रखें। | धूप से बचाव: तेज धूप और गर्मी में बच्चे को बाहर ले जाने से पूरी तरह बचें। |
| हवा का प्रबंध: सोते समय पंखे या कूलर की हवा का उचित प्रबंध रखें, लेकिन ध्यान रहे कि सीधी हवा बच्चे को न लगे। | भारी क्रीम/तेल: घमौरियों वाली जगह पर गाढ़ा तेल, लोशन या पेट्रोलियम जेली न लगाएं, क्योंकि इससे रोमछिद्र बंद हो जाते हैं। |
| नाखूनों की सफाई: बच्चे के नाखून हमेशा काटकर रखें ताकि खुजलाने पर त्वचा पर घाव या इंफेक्शन न हो। | असुरक्षित लेप: घमौरियों पर दालचीनी, मिर्च या अन्य गर्म तासीर वाली चीजों का लेप भूलकर भी न लगाएं। |
सीके बिरला अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि उचित सावधानी और शुरुआती उपचार से 90% बच्चों में घमौरियाँ 3 से 4 दिनों के भीतर ठीक हो जाती हैं।
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घमौरियाँ से छुटकारा कैसे पाएं, उससे बेहतर है कि उन्हें होने ही न दिया जाए। नीचे कुछ टिप्स दिए गए हैं, जिनका पालन करने से आपको बहुत लाभ मिल सकता है –
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यदि आपको नीचे बताए गए लक्षण अपने बच्चे में महसूस होते हैं, तो बिना देर किए हमारे अनुभवी विशेषज्ञों से मिलें और अपने बच्चे के लिए परामर्श लें –
यह लक्षण सेकेंडरी बैक्टीरियल इन्फेक्शन के हैं। ऐसे में बच्चों की घमौरियाँ का इलाज विशेषज्ञ डॉक्टर से ही कराना चाहिए।
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बच्चों की त्वचा उनकी मुस्कान जैसी ही नाजुक होती है। घमौरियाँ होना भले ही एक सामान्य मौसमी समस्या हो, लेकिन बच्चे के लिए यह बहुत कष्टदायक होती है। सही जानकारी और सतर्कता के साथ आप अपने नन्हे-मुन्ने को इस जलन से बचा सकते हैं। याद रखें, एक ठंडा और खुशहाल बच्चा ही स्वस्थ विकास की ओर बढ़ता है।
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क्या घमौरियाँ संक्रामक (छूत) होती हैं?
नहीं, घमौरियाँ बिल्कुल भी संक्रामक नहीं होती हैं। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलतीं क्योंकि यह पसीने की ग्रंथियों के बंद होने के कारण होती हैं, न कि किसी वायरस या बैक्टीरिया से।
क्या घमौरियों में पाउडर लगाना सही है?
घमौरियों में पाउडर का उपयोग सावधानी से करना चाहिए। खुशबूदार पाउडर के बजाय मेडिकेटेड डस्टिंग पाउडर बेहतर है। पाउडर की बहुत मोटी परत न लगाएं, क्योंकि यह पसीने के छिद्रों को और ज्यादा बंद कर सकती है।
क्या घमौरियों में साबुन का इस्तेमाल करना चाहिए?
नहाते समय हल्के, सुगंध-रहित और पीच (pH) बैलेंस वाले साबुन का उपयोग करें। ज्यादा स्क्रब करने वाले या कठोर एंटी-बैक्टीरियल साबुन से बचें, क्योंकि वे त्वचा को और ज्यादा इरिटेट कर सकते हैं।
क्या नारियल तेल घमौरियों में फायदेमंद है?
नारियल तेल में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, लेकिन घमौरियों की शुरुआती अवस्था में तेल लगाने से बचें क्योंकि यह रोमछिद्रों को ब्लॉक कर सकता है। जब दाने सूखने लगे, तब हल्का नारियल तेल लगाया जा सकता है।
क्या डायपर पहनने से घमौरियाँ बढ़ सकती हैं?
हाँ, डायपर के अंदर नमी और गर्मी के कारण घमौरियाँ और ‘डायपर रैश’ बढ़ सकते हैं। गर्मियों में कोशिश करें कि बच्चे को कॉटन की लंगोट पहनाएं या डायपर को बार-बार बदलें और बीच-बीच में ‘डायपर-फ्री’ समय दें।
कल्पना कीजिए कि आप एक सामान्य सुबह सोकर उठते हैं, अपनी चाय की चुस्की लेते हैं और अचानक आपको अपनी आंखों के सामने एक छोटा सा काला धब्बा या मकड़ी का जाला तैरता हुआ दिखाई देता है। आप अपनी आंखें मलते हैं, पानी से धोते हैं, लेकिन वह धब्बा वहीं का वहीं रहता है। इसके साथ-साथ शाम होते-होते, जब आप कमरे की लाइट बंद करते हैं, तो आपको आंख के कोने में बिजली की कड़क जैसी एक तेज चमक (Flash) दिखाई देती है।
यह अनुभव किसी को भी डराने के लिए काफी है। आंखों में होने वाले ये अचानक बदलाव असल में एक आम लेकिन बेहद महत्वपूर्ण आई कंडिशन की ओर इशारा करते हैं, जिसे मेडिकल भाषा में पोस्टीरियर विट्रियस डिटैचमेंट (Posterior Vitreous Detachment – PVD) कहा जाता है। यदि आपको भी हाल ही में आंखों की रोशनी धुंधली होना या आंखों के आगे अनचाही आकृतियां तैरने जैसी समस्या का सामना करना पड़ा है, तो आपको इसे नजरअंदाज बिल्कुल नहीं करना चाहिए। अपनी आंखों की सुरक्षा के लिए किसी भी तरह की लापरवाही न बरतें और आज ही अनुभवी विशेषज्ञों के साथ अपॉइंटमेंट बुक करें ताकि आपकी आंखों की सही स्थिति का समय रहते पता चल सके।
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इस स्थिति को गहराई से समझने के लिए हमें अपनी आंख की बनावट को थोड़ा करीब से देखना होगा। हमारी आंख के भीतर, लेंस और रेटिना (आंख का पिछला पर्दा जो तस्वीरें बनाता है) के बीच में एक खाली जगह होती है। यह पूरी जगह एक पारदर्शी, अंडे की सफेदी जैसे गाढ़े जेल से भरी होती है। इस जेल को ‘विट्रियस ह्यूमर’ (Vitreous Humor) कहा जाता है। यह जेल हमारी आंख के गोल आकार को बनाए रखने में मदद करता है और रेटिना को अपनी जगह पर टिका कर रखता है।
जब हम बच्चे होते हैं या अपनी युवावस्था में होते हैं, तो यह जेल एकदम ठोस और पूरी तरह से पारदर्शी होता है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, इस जेल की बनावट बदलने लगती है। यह धीरे-धीरे सिकुड़ने लगता है और पानी के रूप में बदलने लगता है जिसे मेडिकल भाषा में विट्रियस लिक्विफैक्शन कहते हैं। जब यह जेल जरूरत से ज्यादा सिकुड़ जाता है, तो यह आंख के पिछले हिस्से यानी रेटिना की सतह को छोड़ देता है और उससे अलग हो जाता है। इसी प्राकृतिक अलगाव की स्थिति को हम कहते हैं कि पोस्टीरियर विट्रियस डिटैचमेंट क्या है।
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जब विट्रियस जेल रेटिना की सतह से अलग होता है, तो आंख के भीतर कुछ छोटे-छोटे बदलाव होते हैं जो सीधे हमारी दृष्टि को प्रभावित करते हैं। इसके दो सबसे प्रमुख लक्षणों को नीचे विस्तार से लिखा गया है –
जब विट्रियस जेल सिकुड़ता है, तो उसके भीतर मौजूद कोलाजन के बारीक रेशे आपस में गुच्छे बना लेते हैं। ये गुच्छे विट्रियस के पानी वाले हिस्से में तैरने लगते हैं। जब बाहर से आने वाली रोशनी इन तैरते हुए रेशों पर पड़ती है, तो इनकी परछाई हमारी आंख के पर्दे (रेटिना) पर पड़ती है। यही परछाई हमें बाहर काले धब्बे, बारीक धागे, छल्ले या मकड़ी के जाले के रूप में तैरती हुई दिखाई देती है। जब आप किसी साफ सफेद दीवार या नीले आसमान की तरफ देखते हैं, तो ये फ्लोटर्स और ज्यादा साफ नजर आने लगते हैं।
चूंकि विट्रियस जेल कुछ जगहों पर रेटिना से बहुत मजबूती से जुड़ा होता है, इसलिए अलग होते समय यह रेटिना को थोड़ा पीछे की तरफ खींचता है या उस पर दबाव डालता है। हमारा रेटिना इस खिंचाव को एक मैकेनिकल सिग्नल की तरह लेता है और मस्तिष्क को बिजली की चमक जैसा संदेश भेजता है। यही कारण है कि मरीज को खासकर अंधेरे में या आंखें घुमाते समय ऐसा लगता है जैसे कोई कैमरा फ्लैश चमका हो।
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ज्यादातर मामलों में PVD एक हानिरहित प्रक्रिया है। कुछ ही हफ्तों में फ्लोटर्स नीचे बैठ जाते हैं और हमारा दिमाग उन्हें नजरअंदाज करना सीख जाता है। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब यह जेल अलग होते समय रेटिना को इतनी जोर से खींचता है कि उसमें बारीक छेद या दरार आ जाती है। इसे रेटिनल टियर (Retinal Tear) कहते हैं।
यदि इस छेद के रास्ते आंख का तरल पदार्थ रेटिना के पीछे चला जाए, तो वह अपनी जगह से पूरी तरह उखड़ जाता है। इसे रेटिनल डिटैचमेंट (Retinal Detachment) कहा जाता है, जो कि एक गंभीर मेडिकल इमरजेंसी है।
अगर आपको PVD के शुरुआती लक्षणों के साथ अचानक धुंधला दिखना शुरू हो जाए, तो यह आंख के भीतर ब्लीडिंग या रेटिना हटने का संकेत हो सकता है। आंखों की रोशनी धुंधली होना दर्शाता है कि आंख का केंद्रीय हिस्सा (मैक्युला) प्रभावित हो रहा है। आंकड़ों के अनुसार, तीव्र लक्षणों वाले 10% से 15% PVD मरीजों में रेटिना फटने की समस्या देखी जाती है, जो इलाज न मिलने पर हमेशा के लिए अंधापन ला सकती है।
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बढ़ती उम्र के अलावा कुछ विशेष स्थितियां इस प्रक्रिया को तेज कर देते हैं, जिससे कम उम्र में भी लोग इसका शिकार हो जाते हैं –
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यदि आपको नीचे दिए गए ‘रेड फ्लैग’ या चेतावनी के लक्षण महसूस हों, तो एक दिन का भी इंतजार न करें –
महत्वपूर्ण नोट: ऐसी स्थिति में तुरंत अनुभवी विशेषज्ञों से परामर्श लें, जहाँ इनडायरेक्ट ऑप्थैल्मोस्कोपी और बी-स्कैन अल्ट्रासाउंड के जरिए आपके आंख के पर्दे की जांच की जा सकती है।
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साधारण PVD के लिए किसी इलाज या आई ड्रॉप की जरूरत नहीं होती। यह उम्र का एक सामान्य बदलाव है और 2-3 महीनों में फ्लोटर्स खुद-ब-खुद दृष्टि के रास्ते से हट जाते हैं।
डॉक्टर आंख की पुतली को फैलाकर (Dilated Eye Exam) यह जांचते हैं कि रेटिना सुरक्षित है या नहीं।
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आंखों के सामने धब्बे तैरना या अचानक धुंधला दिखना हमेशा किसी बड़ी बीमारी का संकेत नहीं होता, लेकिन इसे नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। PVD को लेकर घबराने की बजाय जागरूक होना जरूरी है। सही समय पर रेटिना विशेषज्ञ की सलाह आपकी आंखों की रोशनी को जीवन भर सुरक्षित रख सकती है।
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गर्मियों में दिन लंबे हो जाते हैं, लोग बीच पर घूमने जाते हैं, और धूप भी तेज़ होती है, लेकिन इसके साथ ही कुछ ऐसी चुनौतियाँ भी आती हैं जिनका सामना आपकी त्वचा को हर रोज़ करना पड़ता है। अगर आप अपनी त्वचा का ध्यान नहीं रखते हैं, तो गर्मी, नमी, UV किरणें और पसीना आपकी त्वचा को गंभीर नुकसान पहुँचा सकते हैं। गर्मियों में त्वचा की अच्छी देखभाल का मतलब सिर्फ़ ताज़ा दिखना ही नहीं है; बल्कि इसका मतलब है अपनी त्वचा को अंदर से भी स्वस्थ रखना।
चाहे आप अपना ज़्यादातर समय बाहर बिताते हों या फिर किसी एयर-कंडीशन्ड कमरे के अंदर, गर्मियों के महीनों में आपकी त्वचा को फिर भी ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत होती है। अच्छी बात यह है कि अपनी त्वचा को सुरक्षित रखने के लिए आपको किसी बहुत बड़े रूटीन या महँगे प्रोडक्ट्स की ज़रूरत नहीं है। कुछ लगातार अपनाई जाने वाली आदतें बहुत बड़ा फ़र्क ला सकती हैं। इस लेख में गर्मियों में त्वचा की देखभाल से जुड़े कुछ ऐसे व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं, जिन्हें अपनाना आसान है और जो सचमुच असरदार भी हैं। यदि त्वचा की समस्या आपको ज्यादा परेशान करे, तो बिना देर किए हमारे अनुभवी विशेषज्ञों से परामर्श लें।
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गर्मियों में त्वचा पर असर कई तरीकों से पड़ता है जैसे कि –
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गर्मियों में त्वचा की सुरक्षा के लिए आप इन सबसे प्रभावी उपायों को अपना सकते हैं –
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गर्मियों में अपने चेहरे को साफ रखने के लिए आप नीचे बताए गए नियमों का पालन कर सकते हैं –
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गर्मियों में त्वचा तैलीय होने पर भी मॉइस्चराइज़र लगाना ज़रूरी है, बस आपका तरीका सही होना चाहिए –
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क्या खाएं:
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क्या न खाएं:
गर्मियों में त्वचा की देखभाल के सबसे बेहतरीन उपायों में से एक हल्का, मौसमी और ताज़ा भोजन करना है।
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गर्मियों में त्वचा की देखभाल करना मुश्किल नहीं है। एक आसान रूटीन – जिसमें नियमित सनस्क्रीन, सही सफाई, हल्का मॉइस्चराइज़र, पर्याप्त पानी और अच्छा खान-पान शामिल हो – आपकी त्वचा को स्वस्थ रखने के लिए काफी है। जरूरी यह नहीं कि आपका रूटीन परफेक्ट हो, बल्कि जरूरी यह है कि आप इसे रोज निभाएं। मौसम के हिसाब से अपनी त्वचा की जरूरत को समझें और उसे सही पोषण दें। यदि समस्या अधिक गंभीर है, तो बिना देर किए हमारे अनुभवी डॉक्टरों से मिलें।
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मई-जून की तेज दोपहर में बाहर से घर लौटें और आपको ऐसा लगे कि सिर फट रहा है।बहुत जाना-पहचाना एहसास है, है ना? गर्मी का मौसम आते ही सिरदर्द और माइग्रेन की शिकायतें तेजी से बढ़ जाती हैं और यह कोई सहयोग नहीं है।
सिनसिनाटी यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ने 6,000 से ज्यादा माइग्रेन मरीजों की जांच करके पाया कि तापमान में हर 10 डिग्री की बढ़ोतरी पर सिरदर्द के मामले 6 प्रतिशत बढ़ जाते हैं। हार्वर्ड स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के एक अन्य रिसर्च में भी यह बात सामने आई कि गर्मी माइग्रेन को बढ़ाने वाले सबसे बड़े कारणों में से एक है।
तो अगर हर बार गर्मी में आपका सिर दर्द करने लगता है, तो यह ब्लॉग आपके लिए ही है। अगर यह दर्द बार-बार, बहुत तेज, या बेकाबू हो रहा है, तो सीके बिरला अस्पताल के अनुभवी न्यूरोलॉजी विशेषज्ञ से अभी संपर्क करें क्योंकि माइग्रेन का सही इलाज जल्दी शुरू होना जरूरी है।
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गर्मी में तेज सिरदर्द होने के पीछे कई कारण एक साथ काम करते हैं –
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बहुत से लोग सामान्य सिरदर्द और माइग्रेन के बीच उलझन में रहते हैं। दोनों में सिर दर्द होता है, लेकिन दोनों का व्यवहार और इलाज अलग होता है। चलिए दोनों के बीच के अंतर को इस टेबल की मदद से समझने का प्रयास करते हैं –

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गर्मी में सिरदर्द का तुरंत इलाज करने के लिए ये उपाय घर पर ही आजमाए जा सकते हैं:
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बचाव इलाज से बेहतर है, और गर्मी में माइग्रेन से बचने के उपाय बेहद आसान है:
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गर्मी का सिरदर्द अक्सर घर पर ठीक हो जाता है, लेकिन कुछ लक्षणों में बिल्कुल लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए:
ये लक्षण किसी गंभीर दिमागी समस्या के संकेत हो सकते हैं। इन्हें केवल सामान्य सिरदर्द कहकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।
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गर्मी में सिरदर्द और माइग्रेन बढ़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसे हर बार मामूली समझकर टालना ठीक नहीं। पानी पीते रहें, धूप से बचें, खाना समय पर खाएं और अपनी सेहत का ध्यान रखें। अगर दर्द बार-बार आता है या तेज होता जा रहा है, तो सीके बिरला अस्पताल के विशेषज्ञ से आज ही परामर्श लें।
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माता-पिता जब अपने बच्चे में थोड़ी सी भी समस्या नजर आती है, तो उनके दिल पर एक भारी बोझ गिर जाता है। सोचिए, रात में अचानक बच्चे का शरीर तेज बुखार से तपने लगे, उसे लगातार सूखी खांसी आ रही हो और अगले ही दिन उसके मासूम चेहरे पर लाल-लाल दाने उभर आएं। यह स्थिति किसी भी माता-पिता को पूरी तरह डरा सकती है। जी हां, हम बात कर रहे हैं खसरा (Measles) की, जो 5 साल तक बच्चों के माता-पिता को परेशान करता रहता है।
आज के इस आधुनिक दौर में जहां हम हाइजीन और सेहत को लेकर इतने सजग हैं, वहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ (UNICEF) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि दुनिया भर में टीकाकरण की दरों में आई मामूली कमी के कारण खसरे के मामलों में अप्रत्याशित उछाल देखा गया है। भारत में भी हर साल हजारों बच्चे इस संक्रामक बीमारी की चपेट में आते हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी है कि बच्चों में खसरा क्यों होता है, इसके शुरुआती संकेत क्या हैं और आप अपने जिगर के टुकड़े को इस गंभीर खतरे से कैसे सुरक्षित रख सकते हैं।
यदि आपके बच्चे को लगातार बुखार है या त्वचा पर कोई भी संदेहास्पद चकत्ते दिख रहे हैं, तो किसी भी घरेलू उपचार में समय गंवाने के बजाय तुरंत हमारे बाल रोग विशेषज्ञों से परामर्श लें और अपने बच्चे को सुरक्षित हाथों में सौंपें।
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यदि आप सोच रहे हैं कि खसरा क्या है, तो आपको बता दें कि यह केवल त्वचा पर होने वाले सामान्य दाने या रैशेज नहीं हैं। खसरा श्वसन प्रणाली (Respiratory System) में होने वाला एक अत्यंत संक्रामक और गंभीर वायरल संक्रमण है, जो ‘पैरामिक्सोवायरस’ (Paramyxovirus) नामक वायरस के कारण होता है।
खसरा किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है, लेकिन 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चे इसकी चपेट में सबसे आसानी से आते हैं। इसके मुख्य रूप से दो कारण हैं:
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यह समझना बहुत जरूरी है कि खसरा के कारण क्या हैं और बच्चों में खसरा कैसे फैलता है, ताकि हम इसकी रोकथाम के सही कदम उठा सकें। इसका एकमात्र कारण पैरामिक्सोवायरस संक्रमण है, लेकिन नीचे इसके फैलने के कई कारण दिए गए हैं –
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कई बार माता-पिता खसरे के लक्षणों को सामान्य सर्दी-जुकाम या फ्लू समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। वायरस के शरीर में प्रवेश करने के लगभग 10 से 14 दिनों बाद इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं। खसरा के लक्षण दो चरणों में सामने आते हैं –
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यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार, खसरा कमजोर इम्युनिटी वाले बच्चों के लिए जानलेवा हो सकता है। समय पर इलाज न मिलने पर निम्नलिखित जटिलताएं हो सकती हैं –
खसरे के वायरस को खत्म करने के लिए कोई विशिष्ट एंटीवायरल दवा नहीं है। इसका एकमात्र अचूक समाधान टीकाकरण (Vaccination) है। बीमारी होने पर लक्षणों के आधार पर इलाज किया जाता है –
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यदि बच्चे को खसरा हो गया है, तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें –
बच्चों को पूरी सुरक्षा देने के लिए इस टीके की दो खुराकें दी जानी अनिवार्य हैं:
आमतौर पर यह टीका MMR (Measles, Mumps, Rubella) या MR (Measles, Rubella) के रूप में दिया जाता है, जो बच्चे को खसरे के साथ-साथ कण्ठमाला (Mumps) और रूबेला जैसी खतरनाक बीमारियों से भी जीवनभर के लिए सुरक्षा प्रदान करता है।
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बच्चों में खसरा होना बेशक एक चिंताजनक स्थिति है, लेकिन सही जानकारी, समय पर लक्षणों की पहचान और सबसे महत्वपूर्ण – पूर्ण टीकाकरण के माध्यम से इस बीमारी को न केवल हराया जा सकता है, बल्कि इससे पूरी तरह बचा भी जा सकता है। एक जागरूक माता-पिता के रूप में आपकी सतर्कता ही आपके बच्चे का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है। टीकों के शेड्यूल में कभी भी लापरवाही न बरतें।
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जिंदगी की रफ़्तार में हादसे कभी बताकर नहीं आते। सुबह की सैर पर अचानक पैर फिसलना, बच्चों का खेलते-खेलते गिर जाना, या फिर सड़क पर कोई अनचाही दुर्घटना, पलक झपकते ही एक हंसता-खेलता इंसान बिस्तर पर आ जाता है। जब कोई गंभीर चोट लगती है और असहनीय दर्द के साथ अंग बेजान होने लगता है, तो मन में सबसे पहला डर यही आता है – “कहीं हड्डी तो नहीं टूट गई?”
इस स्थिति में लोग अक्सर समझ नहीं पाते कि स्थिति सामान्य मोच की है या हड्डी टूट चुकी है। सही जानकारी न होने के कारण कई बार लोग मालिश करने या घरेलू उपाय आज़माने की बड़ी गलती कर बैठते हैं, जिससे अंदरूनी चोट और भी गंभीर हो जाती है। डब्ल्यूएचओ (WHO) और वैश्विक आर्थोपेडिक डेटा के अनुसार, भारत में लगभग 15-20% फ्रैक्चर के मामले केवल इसलिए बिगड़ जाते हैं क्योंकि मरीज़ को सही समय पर सही प्राथमिक उपचार नहीं मिलता या वे गलत डॉक्टर के पास चले जाते हैं।
यदि आपके या आपके किसी करीबी के साथ ऐसा कोई हादसा हो जाए, तो घबराएं नहीं। सीके बिरला हॉस्पिटल (CK Birla Hospital) के अनुभवी ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. अश्विनी माईचंद की देखरेख में आप पूरी तरह सामान्य जीवन में लौट सकते हैं।
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चिकित्सीय भाषा में कहें तो जब किसी बाहरी दबाव, झटके, दुर्घटना या किसी बीमारी के कारण शरीर की किसी हड्डी की निरंतरता (Continuity) टूट जाती है या उसमें दरार आ जाती है, तो उसे बोन फ्रैक्चर कहा जाता है। हमारी हड्डियाँ बहुत मज़बूत और लचीली होती हैं, लेकिन जब उन पर लगने वाला बाहरी बल उनकी सहनशक्ति से अधिक हो जाता है, तो वे टूट जाती हैं।
कभी-कभी बढ़ती उम्र या ऑस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis) जैसी बीमारियों के कारण हड्डियां इतनी कमजोर हो जाती हैं कि हल्का सा झटका लगने या खांसने-छींकने से भी उनमें मामूली फ्रैक्चर हो जाता है, जिसे ‘स्ट्रेस फ्रैक्चर’ या ‘पैथोलॉजिकल फ्रैक्चर’ भी कहा जाता है।
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किसी दुर्घटना के बाद मोच और फ्रैक्चर में अंतर करना आम इंसान के लिए थोड़ा मुश्किल हो सकता है। इसलिए, हड्डी टूटने के लक्षणों को पहचानना बेहद आवश्यक है। जब कोई हड्डी टूटती है, तो शरीर तुरंत कुछ स्पष्ट संकेत देता है –
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हड्डी पर लगे दबाव और चोट की गंभीरता के आधार पर मेडिकल साइंस में फ्रैक्चर के प्रकार को कई श्रेणियों में बांटा गया है। मुख्य रूप से इन्हें निम्नलिखित रूपों में देखा जाता है –
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हादसे के वक्त एंबुलेंस आने या हॉस्पिटल पहुँचने से पहले के 15-20 मिनट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। आपके द्वारा किया गया सही प्राथमिक उपचार मरीज की तकलीफ को आधा कर सकता है। जानिए हड्डी टूटने पर क्या करें –
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आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों के कारण आज हड्डी टूटने का इलाज बहुत ही सटीक, दर्दमुक्त और प्रभावी हो गया है। सीके बरला हॉस्पिटल में आर्थोपेडिक सर्जन मरीज़ की स्थिति, उम्र और फ्रैक्चर के प्रकार को देखकर निम्नलिखित उपचार तकनीक अपनाते हैं:
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गंभीर, मल्टीपल (कई टुकड़ों वाले) या जोड़ों के पास के फ्रैक्चर के लिए सर्जरी की जाती है –
दुर्घटनाएं अचानक होती हैं, लेकिन हड्डियों को मजबूत बनाकर उनके टूटने के खतरे को कम किया जा सकता है:
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ग्रामीण और शहरी इलाकों में आज भी हड्डी जोड़ने के घरेलू उपाय जैसे हल्दी-चूना बांधना, बांस की लकड़ियों से बांधना या विशेष तेलों की मालिश का चलन है। चिकित्सा विज्ञान के दृष्टिकोण से, घरेलू उपाय केवल सूजन और सामान्य दर्द में राहत दे सकते हैं, लेकिन वे टूटी हुई हड्डी को आपस में सही संरेखण (Alignment) में नहीं ला सकते। यदि हड्डी टेढ़ी जुड़ गई, तो मरीज को जीवन भर का दर्द और अपंगता मिल सकती है। इसलिए रिस्क बिल्कुल न लें।
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हड्डी टूटने पर सही समय पर लिया गया फैसला रिकवरी आसान बनाता है। प्राथमिक उपचार अपनाएं और नीम-हकीमों या मालिश से दूर रहें।
यदि आपको या आपके किसी परिजन को चोट लगी है या जोड़ों में पुराना दर्द है, तो अत्याधुनिक तकनीकों से लैस सीके बिरला हॉस्पिटल (CK Birla Hospital) के आर्थोपेडिक विभाग से संपर्क करें। हमारे विशेषज्ञ आपकी हड्डियों को पुरानी ताकत और गतिशीलता देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। आज ही अपना परामर्श सुरक्षित करें!
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अपने शरीर को लेकर आत्मविश्वास महसूस करना हर महिला का अधिकार है। कभी-कभी दुर्घटना, बीमारी या केवल स्वयं की खुशी के लिए महिलाएं ब्रेस्ट ऑग्मेंटेशन का सहारा लेती हैं। लेकिन, जब हम अपनी खूबसूरती निखारने के लिए किसी सर्जरी के बारे में सोचते हैं, तो मन के एक कोने में यह सवाल जरूर आता है कि “क्या यह सुरक्षित है? क्या ब्रेस्ट इम्प्लांट से कैंसर का खतरा तो नहीं बढ़ जाएगा?”
यह डर जायज भी है, क्योंकि स्वास्थ्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है। आज इस ब्लॉग में हम इसी डर की परतों को खोलेंगे और विज्ञान व तथ्यों के आधार पर जानेंगे कि ब्रेस्ट इम्प्लांट सर्जरी और कैंसर का आपस में क्या संबंध है। इस संबंध में आपके सभी प्रश्नों के उत्तर हमारे अनुभवी विशेषज्ञों के पास से मिल जाएंगे।
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आज के समय में ब्रेस्ट इम्प्लांट क्या है, इसे समझना बहुत जरूरी है। सरल भाषा में कहें तो, यह एक मेडिकल डिवाइस (प्रोस्थेसिस) है, जिसे सर्जरी के जरिए स्तनों के टिश्यू के अंदर रखा जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य स्तनों के आकार (Shape), साइज (Size) और उभार को बढ़ाना होता है। भारत में पिछले एक दशक में कॉस्मेटिक प्रक्रियाओं में 20% की वृद्धि देखी गई है, जिससे जागरूकता की आवश्यकता और बढ़ गई है, जिसमें से ब्रेस्ट इम्प्लांट सर्जरी का नंबर अधिक है।
महिलाएं अक्सर निम्नलिखित कारणों से ब्रेस्ट इम्प्लांट का चुनाव करती हैं –
ब्रेस्ट इम्प्लांट क्या होता है, यह जानने के साथ-साथ यह जानना भी जरूरी है कि ये मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं: सलाइन (नमक के पानी वाले) और सिलिकॉन (जेल वाले)। सीके बिरला अस्पताल में हम मरीजों को उनकी शारीरिक संरचना के आधार पर सही विकल्प चुनने में मदद करते हैं ताकि जोखिम न्यूनतम रहे और उनका लक्ष्य भी पूरा हो जाए।
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यह इस ब्लॉग का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि ब्रेस्ट इम्प्लांट और कैंसर के बीच का संबंध वैसा नहीं है जैसा लोग सामान्यतः समझते हैं।
वैज्ञानिक शोधों और फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA – Food and Drug Administration) के अनुसार, ब्रेस्ट इम्प्लांट सीधे तौर पर उस ‘ब्रेस्ट कैंसर‘ (Adenocarcinoma) का कारण नहीं बनते जो स्तन के टिश्यू में होता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने इम्प्लांट्स और एक दुर्लभ प्रकार के कैंसर के बीच संबंध पाया है जिसे BIA-ALCL (Breast Implant-Associated Anaplastic Large Cell Lymphoma) कहा जाता है।
यह ध्यान देना आवश्यक है कि ALCL स्तन का कैंसर नहीं है, बल्कि यह इम्यून सिस्टम (लसीका प्रणाली) का एक प्रकार का कैंसर है, जो इम्प्लांट के चारों ओर बनने वाले निशान (Capsule) में विकसित होता है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, यह जोखिम मुख्य रूप से ‘टेक्सचर्ड’ (खुरदरी सतह वाले) इम्प्लांट्स से जुड़ा पाया गया है। स्मूथ (चिकनी सतह वाले) इम्प्लांट्स में यह जोखिम न के बराबर देखा गया है।
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हर सर्जिकल प्रक्रिया की तरह, ब्रेस्ट इम्प्लांट के खतरे भी हो सकते हैं, जिन्हें सर्जरी से पहले समझना अनिवार्य है। ब्रेस्ट इम्प्लांट सर्जरी केवल एक कॉस्मेटिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह शरीर में एक बाहरी वस्तु (Foreign Object) को डालने की प्रक्रिया है।
इस प्रक्रिया के कुछ संभावित जोखिम हैं जैसे कि –
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सर्जरी के बाद अपने शरीर की प्रतिक्रिया को समझना बहुत जरूरी है। यदि आपको ब्रेस्ट इम्प्लांट से कैंसर जोखिम या अन्य समस्याओं का अंदेशा है, तो इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें –
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यदि आप इनमें से कोई भी लक्षण महसूस करती हैं, तो तुरंत विशेषज्ञ से परामर्श लें। सीके बिरला अस्पताल में हमारी ऑन्कोलॉजी और प्लास्टिक सर्जरी टीम ऐसे मामलों की बारीकी से जांच करती है।
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अगर आपने ब्रेस्ट ऑग्मेंटेशन करवाया है या करवाने वाली हैं, तो सुरक्षा के लिए कुछ प्रोटोकॉल का पालन करना आपके लिए जीवन रक्षक हो सकता है –
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ब्रेस्ट इम्प्लांट आपकी सुंदरता और आत्मविश्वास को बढ़ा सकते हैं, लेकिन यह आपकी जागरूकता की कीमत पर नहीं होना चाहिए। क्या ब्रेस्ट इम्प्लांट से कैंसर होता है? इसका जवाब यह है कि जोखिम बहुत कम और दुर्लभ है, लेकिन यह शून्य नहीं है। सही जानकारी, नियमित जांच और सीके बिरला अस्पताल जैसे विश्वसनीय संस्थान के विशेषज्ञों की निगरानी में रहकर आप इन जोखिमों को कम कर सकती हैं। याद रखें, एक जागरूक निर्णय ही सबसे खूबसूरत निर्णय होता है।
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भीषण गर्मी, तपती धूप और ऊपर से चलती गर्म हवाएं (लू); यह भारतीय गर्मियों का वो चेहरा है जो हर किसी को बेहाल कर देता है। इस मौसम में जैसे ही तापमान 40 डिग्री के पार जाता है, हमारे शरीर की ऊर्जा, पानी और जरूरी मिनरल्स पसीने के रास्ते बाहर बह जाते हैं। परिणामस्वरूप, थकान, डिहाइड्रेशन, चक्कर आना और पेट का खराब होना बेहद आम हो जाता है। ऐसे में हम अक्सर महंगे और केमिकल युक्त पैक्ड एनर्जी ड्रिंक्स या कोल्ड-ड्रिंक्स की तरफ भागते हैं, जो पल भर की ठंडक तो देते हैं, लेकिन शरीर को अंदर से खोखला और शुगर से भर देते हैं।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारी भारतीय संस्कृति के पास इसका एक ऐसा तोड़ है जिसे ‘गरीबों का प्रोटीन शेक’ या ‘देसी सुपरफूड’ कहा जाता है? जी हां, हम बात कर रहे हैं सत्तू (Sattu) की। चिकित्सा विज्ञान और आधुनिक न्यूट्रिशनिस्ट भी अब यह मानने लगे हैं कि गर्मियों में सत्तू का एक गिलास आपके शरीर के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। यह न केवल शरीर को अंदरूनी ठंडक देता है, बल्कि पाचन तंत्र को भी दुरुस्त रखता है।
अगर आप या आपके परिवार का कोई सदस्य इस गर्मी में लगातार थकान, हीट स्ट्रोक के लक्षणों या पेट की समस्याओं से परेशान है, तो नजरअंदाज न करें। आज हीसीके बिरला हॉस्पिटल (CK Birla Hospital) के अनुभवी डाइटीशियन और गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट से अपॉइंटमेंट बुक करें और अपनी सेहत के अनुसार सही डाइट चार्ट के बारे में विचार करें।
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बहुत से लोग सोचते हैं कि सत्तू और बेसन एक ही हैं, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। भुने हुए काले चने (Bengal Gram) को बालू में भूनकर, छिलके समेत या छिलका हटाकर जब पारंपरिक चक्की में पीसा जाता है, तो जो चमत्कारी आटा तैयार होता है, उसे सत्तू कहते हैं। कई जगहों पर चने के साथ भुने हुए जौ (Barley) को भी मिलाया जाता है।
NCBI (National Center for Biotechnology Information) की एक हालिया रिसर्च के अनुसार, भुने हुए चने के सत्तू में लगभग 19% से 22% तक हाई-क्वालिटी प्लांट-बेस्ड प्रोटीन पाया जाता है। इसके अलावा, इसमें डाइटरी फाइबर (लगभग 20-22%) की मात्रा बहुत अधिक होती है।
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गर्मियों के दिनों में सत्तू पीने के फायदे अनगिनत हैं। आइए जानते हैं वे 10 मुख्य कारण जिनकी वजह से आपको इसे अपनी डेली डाइट का हिस्सा जरूर बनाना चाहिए –
सत्तू की तासीर अत्यधिक ठंडी होती है। जब आप दोपहर की धूप में बाहर निकलते हैं या घर वापस आते हैं, तो सत्तू का शरबत पीने से शरीर का आंतरिक तापमान तुरंत गिरता है। यह आपके हाइपोथैलेमस (मस्तिष्क का वो हिस्सा जो तापमान नियंत्रित करता है) को शांत रखता है।
उत्तर और मध्य भारत में गर्मियों में ‘लू’ लगना एक बड़ी मेडिकल इमरजेंसी बन जाती है। सत्तू शरीर में एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यह खून के दौरे को संतुलित रखता है और त्वचा के जरिए होने वाले अत्यधिक पानी के नुकसान को रोकता है, जिससे लू लगने का खतरा न के बराबर हो जाता है।
जब गर्मी के कारण शरीर बिल्कुल सुस्त और थका हुआ महसूस होने लगे, तो चाय या कॉफी पीने के बजाय सत्तू पिएं। इसमें मौजूद कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट्स शरीर को तुरंत और लंबे समय तक चलने वाली ऊर्जा प्रदान करते हैं।
सत्तू में पाए जाने वाले अल्कलाइन गुण पेट के अत्यधिक एसिड (पित्त) को शांत करते हैं। गर्मियों में मसालेदार खाना खाने के बाद होने वाली जलन, खट्टी डकारें और ब्लोटिंग की समस्या में सत्तू का पानी अमृत समान है।
यदि आप नेचुरल तरीके से फैट बर्न करना चाहते हैं, तो सत्तू के फायदे आपको हैरान कर देंगे। सत्तू में हाई फाइबर और हाई प्रोटीन होता है। इसे पीने के बाद ‘घ्रेलिन’ (भूख बढ़ाने वाला हार्मोन) शांत हो जाता है, जिससे आपको 3 से 4 घंटे तक भूख नहीं लगती और आप ओवरईटिंग से बच जाते हैं।
लो-ग्लाइसेमिक इंडेक्स और हाई फाइबर के कारण, सत्तू खून में ग्लूकोज के अवशोषण (Absorption) को बहुत धीमा कर देता है। टाइप-2 डायबिटीज के मरीजों के लिए दोपहर के स्नैक्स के रूप में नमक और जीरे वाला सत्तू एक बेहतरीन विकल्प है।
क्रोनिक कॉन्स्टिपेशन (पुरानी कब्ज) से परेशान मरीजों के लिए सत्तू एक प्राकृतिक लैक्सेटिव है। यह आंतों की दीवारों को साफ करता है, मल को नरम बनाता है और मल त्याग की प्रक्रिया को आसान करता है।
सत्तू में मौजूद आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को सुधारता है। जब शरीर अंदर से हाइड्रेटेड और टॉक्सिन-मुक्त रहता है, तो चेहरे पर गर्मी के कारण होने वाले कील-मुंहासे, पिंपल्स और डलनेस गायब होने लगती है।
गर्भावस्था (Pregnancy) और मासिक धर्म (Periods) के दौरान महिलाओं के शरीर से बहुत सारे पोषक तत्व कम हो जाते हैं। सत्तू का सेवन महिलाओं में कमजोरी, चक्कर आना और एनीमिया (खून की कमी) की समस्या को दूर करने में बहुत प्रभावी है।
जो लोग जिम जाते हैं या हैवी वर्कआउट करते हैं, वे महंगे और सिंथेटिक व्हे प्रोटीन की जगह सत्तू को पोस्ट-वर्कआउट ड्रिंक के रूप में ले सकते हैं। यह जिम के बाद मांसपेशियों को रिपेयर करने में मदद कर सकता है।
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आयुर्वेद और आधुनिक गैस्ट्रोएंटरोलॉजी दोनों ही इस बात से सहमत हैं कि सुबह के समय हमारा पाचन तंत्र सबसे अधिक सक्रिय होता है। सुबह खाली पेट सत्तू पीने के फायदे आपके पूरे दिन की कार्यप्रणाली को बदल सकते हैं –
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बहुत से लोग सत्तू को केवल पानी के साथ ही पीते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि दूध में सत्तू पीने के फायदे आपकी हड्डियों और मांसपेशियों के लिए डबल बूस्टर का काम करते हैं? खासकर उन लोगों के लिए जिनका वजन नहीं बढ़ रहा या जो बहुत ज्यादा शारीरिक श्रम करते हैं।
सत्तू को बोरिंग समझने की भूल बिल्कुल न करें। आप अपनी पसंद के अनुसार इसे मीठा, नमकीन या गाढ़ा बनाकर खा-पी सकते हैं। यहाँ 3 सबसे लोकप्रिय तरीके दिए गए हैं –
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गर्मियों का मौसम हमारी सेहत की कड़ी परीक्षा लेता है, और इस परीक्षा में पास होने का सबसे आसान, सस्ता और प्रामाणिक तरीका है – सत्तू। इस गर्मी में बाजार के प्रिजर्वेटिव वाले जूस और कोल्ड-ड्रिंक्स को अलविदा कहें और सत्तू के पारंपरिक स्वास्थ्यवर्धक स्वाद को अपनाएं। स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें और अपनी सेहत को हमेशा पहली प्राथमिकता दें!
इस गर्मी में अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें और यदि आपको समस्या अधिक महसूस हो रही है, तो बिना देर किए हमारे डॉक्टरों से मिलें और परामर्श लें।
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आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, ऑफिस का तनाव और अनियमित खानपान ने हमें एक ऐसी बीमारी के मुहाने पर खड़ा कर दिया है, जिसे ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है, जो है डायबिटीज। वैसे तो साइलेंट किलर कई चीजों को कहा जाता है, लेकिन ये एक स्लो पॉइजन है, जो धीरे-धीरे शरीर को खोखला करने लगता है। जब हम थका हुआ महसूस करते हैं या बार-बार प्यास लगती है, तो अक्सर हम इसे सामान्य समझकर टाल देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आपके खून में दौड़ रही शुगर (ग्लूकोज) आपके अंगों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचाती है? चाहे आप अपने परिवार के लिए चिंतित हो या अपनी सेहत के लिए, सही डायबिटीज लेवल चार्ट की समझ होना बेहद जरूरी है।
अपनी सेहत के साथ जोखिम न लें। यदि आपको जरा भी संदेह है, तो आज ही हमारे अनुभवी विशेषज्ञों के साथ अपॉइंटमेंट बुक करें और एक स्वस्थ भविष्य की ओर कदम बढ़ाएं।
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हमारे शरीर को ऊर्जा ग्लूकोज से मिलती है, जो हमारे भोजन से आता है। इंसुलिन नामक हार्मोन इस ग्लूकोज को कोशिकाओं तक पहुँचाने का काम करता है। जब यह प्रक्रिया बाधित होती है, तो खून में शुगर का स्तर बढ़ जाता है। नियमित रूप से शुगर की जांच करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि बढ़ा हुआ शुगर लेवल हृदय रोग, किडनी फेलियर और आंखों की रोशनी जाने जैसी गंभीर समस्याओं का कारण बन सकता है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 101 मिलियन लोग डायबिटीज के साथ जी रहे हैं, और इससे भी अधिक संख्या ‘प्री-डायबिटीज’ वालों की है।
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शुगर लेवल को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जाता है। इसे समझने के लिए नीचे दी गई टेबल आपकी मदद करेगी –

नॉर्मल डायबिटीज लेवल बनाए रखना न केवल आपके वजन को संतुलित रखता है, बल्कि आपकी ऊर्जा के स्तर को भी स्थिर रखता है।
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हर व्यक्ति का शरीर अलग होता है। एक 20 साल के युवा और 70 साल के बुजुर्ग के लिए नॉर्मल डायबिटीज रेंज समान नहीं हो सकती। इसलिए इसे समझने के लिए हम आपको नीचे विस्तार से समझाने वाले हैं –
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अक्सर लोग तब तक जांच नहीं कराते जब तक लक्षण गंभीर न हो जाएं। हाई शुगर (Hyperglycemia) और लो शुगर (Hypoglycemia) दोनों ही खतरनाक है। चलिए कुछ संकेतों को समझते हैं, जो आपको शुगर की गंभीर समस्या से बचा सकता है।
सही उपचार के लिए सही टेस्ट का चुनाव जरूरी है। चलिए तीनों टेस्ट के बारे में जानते हैं और इन्हें कब कराना चाहिए –
मधुमेह को नियंत्रित करने में दवा से ज्यादा आपकी थाली की भूमिका होती है। एक सही मधुमेह आहार चार्ट या डायबिटीज डाइट चार्ट में निम्नलिखित शामिल होना चाहिए –
डायबिटीज आहार में मेथी दाना, दालचीनी और जामुन के सिरके को शामिल करना भी काफी फायदेमंद पाया गया है। आप इन्हें किसी न किसी तरह से अपने आहार में ज़रूर शामिल करें।
यदि आप प्री डायबिटिक हैं, तो घबराएं नहीं। यह एक चेतावनी है, जिसे बदला जा सकता है। प्री-डायबिटीज डाइट चार्ट में ‘कार्ब काउंटिंग’ बहुत जरूरी है। रात का खाना हल्का रखें और सोने से कम से कम 3 घंटे पहले खाएं। दिन भर में कम से कम 30 मिनट की पैदल सैर आपके इंसुलिन रेजिस्टेंस को 25-30% तक कम कर सकती है।
इन प्रभावी उपायों को अपनाकर आप अपने शुगर लेवल को नॉर्मल तो रख ही सकते हैं, इसके साथ-साथ अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी कंट्रोल में रह सकती हैं –
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डायबिटीज कोई सजा नहीं, बल्कि एक जीवन शैली की स्थिति है जिसे सही जानकारी और अनुशासन से मैनेज किया जा सकता है। डायबिटीज लेवल कितना होना चाहिए, इसकी सटीक जानकारी रखना आपके स्वस्थ जीवन की पहली सीढ़ी है। सही डायबिटीज डाइट चार्ट का पालन करें और समय-समय पर अपने डॉक्टर से परामर्श लें। याद रखें, सावधानी ही सबसे बड़ा उपचार है।