
तब होता है जब दिमाग तक खून की सप्लाई रुक जाए या नस फट जाए। अचानक चेहरा टेढ़ा होना, हाथ-पैर में कमजोरी या बोलने में रुकावट – ये थकान या गैस नहीं, इमरजेंसी के संकेत हैं। स्ट्रोक में हर मिनट कीमती होता है और यही “थोड़ा इंतज़ार कर लेते हैं” वाली सोच सबसे भारी पड़ती है।
इस ब्लॉग में जानें स्ट्रोक के शुरुआती लक्षण, FAST नियम, इसके कारण और इलाज के तरीके। अगर ऐसे लक्षण दिखें, तो तुरंत न्यूरोलॉजी विभाग और इमरजेंसी एवं क्रिटिकल केयर के विशेषज्ञ डॉक्टरों से संपर्क करें।
दिमाग को लगातार ऑक्सीजन और पोषण वाला खून चाहिए। जब किसी नस में थक्का जम जाए या नस फट जाए, तो उस हिस्से की कोशिकाएं कुछ ही मिनटों में नुकसान झेलने लगती हैं। इसे ही ब्रेन स्ट्रोक, ब्रेन अटैक या आम बोलचाल में लकवा का दौरा कहते हैं।
एक बात अक्सर गलत समझी जाती है: स्ट्रोक दिल का दौरा नहीं है, और इसमें ज़रूरी नहीं कि दर्द हो। कई बार सिरदर्द के बिना, बस हाथ-पैर में कमजोरी से शुरुआत होती है।
स्ट्रोक मुख्य रूप से दो तरह का होता है। नीचे की टेबल से फर्क एक नज़र में समझ आ जाएगा।

ध्यान रखें कि बाहर से लक्षण देखकर प्रकार तय नहीं किया जा सकता। यह CT या MRI स्कैन से ही पता चलता है, और इलाज इसी पर निर्भर करता है। इसलिए घर पर कोई दवा देने की कोशिश न करें।
एक तीसरी स्थिति TIA (मिनी स्ट्रोक) भी है, जिसमें लक्षण कुछ मिनटों या घंटों में अपने आप ठीक हो जाते हैं। यह राहत की बात नहीं, बल्कि आने वाले बड़े स्ट्रोक की चेतावनी हो सकती है। इसमें भी उसी दिन जांच जरूरी है।
स्ट्रोक के लक्षण अचानक शुरू होते हैं। यही इसकी सबसे बड़ी पहचान है। धीरे-धीरे हफ्तों में बढ़ती कमजोरी आम तौर पर दूसरे कारणों से होती है, पर उसकी भी जांच करवानी चाहिए।
सबसे आम संकेत:
क्या हर चक्कर या सिरदर्द स्ट्रोक है? नहीं। माइग्रेन, कान की समस्या, लो ब्लड शुगर,कम बीपी और घबराहट में भी चक्कर और सिरदर्द होते हैं। फर्क यह है कि स्ट्रोक में अचानक सिरदर्द और चक्कर के साथ कमजोरी, बोलने की दिक्कत, चेहरे का टेढ़ापन या देखने में बदलाव जैसे दूसरे संकेत भी जुड़ जाते हैं। लक्षण अकेले दिखें या मिले-जुले, शक होने पर जांच करवाना ही सुरक्षित है।
FAST एक आसान तरीका है, जिससे कोई भी व्यक्ति, बिना मेडिकल जानकारी के, 30 सेकंड में स्ट्रोक का शक पहचान सकता है।
याद रखें: स्ट्रोक के इलाज में हर मिनट कीमती है। लक्षण दिखने पर इंतजार न करें, सीधे अस्पताल पहुंचे।
कारण और जोखिम कारक एक चीज़ नहीं हैं। जोखिम कारक स्ट्रोक की संभावना बढ़ाते हैं, जबकि कारण वह सीधी वजह है, जो किसी एक व्यक्ति में स्ट्रोक करवाती है (जैसे थक्का या फटी हुई नस)।
| जोखिम कारक | प्रभाव / असर |
| हाई ब्लड प्रेशर | नसों को कमजोर और सख्त बनाता है। |
| डायबिटीज | लंबे समय तक शुगर बढ़ने से नसें क्षतिग्रस्त होती हैं और थक्के बनते हैं। |
| हाई कोलेस्ट्रॉल | नसों में वसा (Fat) जमाकर खून का रास्ता तंग करता है। |
| Atrial Fibrillation | दिल की धड़कन अनियमित होने से बने थक्के दिमाग तक पहुँचते हैं। |
| धूम्रपान व तंबाकू | खून को गाढ़ा करता है और नसों को नुकसान पहुंचाता है। |
| अस्वस्थ जीवनशैली | मोटापा, शराब और निष्क्रियता सीधे BP व शुगर बिगाड़ते हैं। |
| उम्र व जेनेटिक्स | बढ़ती उम्र और फैमिली हिस्ट्री। |
बीपी और डायबिटीज स्ट्रोक के सबसे बड़े जोखिम कारक हैं। सही समय पर जांच और नियंत्रण से स्ट्रोक का खतरा काफी हद तक टल जाता है।युवाओं में यह खून की बीमारियों, नसों में चोट/फटाव (Dissection), दिल की जन्मजात समस्याओं या नशे की लत के कारण हो सकता है।
यदि स्ट्रोक के लक्षण दिखें तो निम्न बातों का ख्याल रखें –
| श्रेणी | क्या करें (Do’s) | क्या न करें (Don’ts) |
| आपातकालीन सेवा | तुरंत एम्बुलेंस (108/112) को फोन करें और “स्ट्रोक का शक है” स्पष्ट कहें। | लक्षण “अपने आप ठीक हो जाएंगे” – यह सोचकर इंतजार न करें। |
| समय का रिकॉर्ड | लक्षण शुरू होने का सटीक समय नोट करें। | घरेलू नुस्खे, मालिश या झाड़-फूंक में समय न गंवाएं। |
| मरीज की स्थिति | आराम से बैठें/लेटें। उल्टी या बेहोशी की स्थिति में करवट देकर लिटाएं। | मरीज को कुछ भी खाने या पीने को न दें। |
| दवाइयां | मरीज की पुरानी दवाओं की पर्ची और मेडिकल रिपोर्ट साथ रखें। | अपने मन से एस्पिरिन या BP की कोई दवा न दें। |
| अस्पताल का चुनाव | ऐसा अस्पताल चुनें जहां 24 घंटे CT/MRI और न्यूरोलॉजिस्ट उपलब्ध हों। | बिना आपातकालीन व्यवस्था वाले छोटे क्लिनिक में जाकर समय बर्बाद न करें। |
| स्ट्रोक का प्रकार | मुख्य इलाज |
| इस्केमिक स्ट्रोक (नस में थक्का) | Thrombolysis: थक्का घोलने का इंजेक्शन। Mechanical Thrombectomy: बड़ी नसों से थक्का निकालने की सर्जरी। |
| हेमरेजिक स्ट्रोक (नस का फटना) | सख्त BP नियंत्रण, खून बहना रोकने के उपाय और आवश्यकतानुसार न्यूरोसर्जरी। |
| दोनों में सामान्य देखभाल | स्ट्रोक यूनिट/ICU में निगरानी, दिमाग की सूजन रोकना और जोखिम कारकों का इलाज। |
महत्वपूर्ण: स्ट्रोक के इलाज में समय ही सबसे बड़ा कारक है। मरीज जितनी जल्दी अस्पताल पहुंचेगा, उसके ठीक होने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। अंतिम निर्णय विशेषज्ञ डॉक्टर स्कैन और मरीज की स्थिति देखकर ही लेते हैं।
सीके बिरला अस्पताल केप्रिवेंटिव हेल्थ औरकार्डियोलॉजी विभाग में ऐसी जाँचें और जोखिम आकलन कराए जा सकते हैं।
स्थिति स्थिर होते ही अस्पताल में ही रिहैबिलिटेशन शुरू कर दिया जाता है। रिकवरी की गति स्ट्रोक की गंभीरता, प्रभावित हिस्से और मरीज की उम्र पर निर्भर करती है।
रिहैबिलिटेशन थेरेपी और उनका काम:
| थेरेपी प्रकार | मुख्य लाभ / मदद |
| फिजियोथेरेपी | हाथ-पैर की ताकत लौटना, चलना-फिरना और संतुलन सुधारना। |
| ऑक्यूपेशनल थेरेपी (Occupational Therapy) | रोजमर्रा के काम जैसे नहाना, कपड़े पहनना और खाना खाना सीखना। |
| स्पीच थेरेपी | बोलने, भाषा समझने और खाना निगलने की समस्याओं में सुधार। |
| काउंसलिंग | स्ट्रोक के बाद होने वाले डिप्रेशन, उदासी और चिंता से उबरने में मदद। |
स्ट्रोक में सबसे बड़ा फर्क लक्षण पहचानने की गति से पड़ता है। FAST याद रखना एक छोटा-सा कदम है, पर यह किसी की ज़िंदगी और चलने-बोलने की क्षमता बचा सकता है। अपने बीपी और शुगर की जांच नियमित रखें और घर के बुजुर्गों को भी ये संकेत बता दें।
अगर आपके परिवार में स्ट्रोक की मेडिकल हिस्ट्री है, या आप बीपी, शुगर जैसे जोखिमों का सामना कर रहे हैं, तो न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेना उपयोगी हो सकता है। आपातकाल की स्थिति में सीधे एम्बुलेंस बुलाएं और अस्पताल में जा कर इलाज लें।
Written and Verified by:

Similar Neurology Blogs
Request a call back