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पेट में जलन का कारण और इलाज | Stomach Burning in Hindi
Mar 29, 2023|Dr. Anukalp Prakash

पेट में जलन का कारण और इलाज | Stomach Burning in Hindi

पेट में जलन अनेक कारणों से होता है और एसिडिटी इसका एक सामान्य लक्षण है। एसिडिटी के दौरान, पेट में मौजूद अत्यधिक मात्रा में अम्ल उत्पन्न होता है जो जलन का कारण बनता है। यह पेट के ऊपरी हिस्से में होता है जहां एसिडिटी उत्पन्न होती है। इसलिए, पेट में जलन का कारण अधिकतर एसिडिटी होती है।

पेट जलन का कारण

पेट जलन के कई कारण हो सकते हैं। इसके मुख्य कारणों में निम्न शामिल हो सकते हैं:

  • पेट में अधिक अम्ल उत्पन्न होने से एसिडिटी होना
  • खराब खानपान और मसालेदार और तैलीय चीजों का सेवन करना
  • स्ट्रेस यानी तनाव भी पेट में जलन का कारण बन सकता है
  • जीभ के संक्रमण होना
  • कुछ दवाओं का सेवन भी पेट में जलन का कारण बन सकता है

यदि आप लंबे समय से पेट में जलन और अन्य लक्षणों का सामना कर रहे हैं तो आपको जल्द से जल्द विशेषज्ञ से परामर्श करना चाहिए।

ये भी पढ़े: एसिडिटी से तुरंत राहत पाने के घरेलू नुस्खे

पेट में जलन होने पर क्या खाना चाहिए?

अगर आपको पेट में जलन हो रही है तो निम्नलिखित खान-पान की चीजें आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं:

  • केले एसिडिटी से निजात पाने के लिए बहुत ही लाभदायक माना जाता है
  • दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स एसिडिटी को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं
  • घी एसिडिटी के लिए बहुत ही उपयोगी होता है। इसके अलावा, यह पेट के दर्द को कम करने में भी मदद करता है।
  • नारियल पानी पेट के गैस और जलन को कम करने में मदद करता है।
  • आटे की रोटी भी अम्लता को कम करने में मदद करती है।

इसके अलावा, आपको खाने से कम समय के अंतराल में खाना खाना चाहिए और तली हुई, मसालेदार चीजों और तीखे भोजन से बचना चाहिए। आपको अधिक मात्रा में पानी पीना चाहिए ताकि आपके शरीर में अम्ल का स्तर नियंत्रित रहे।

यह भी पढ़े: मुंह में छाला होने के कारण, लक्षण और उपचार | Mouth Ulcers in Hindi

पेट में जलन होने पर क्या नहीं खाना चाहिए?

जब पेट में जलन का अनुभव होता है, तो खाने के खान-पान के समय काफी सावधानी बरतनी होती है। निम्नलिखित चीजों के सेवन पेट में जलन को बढ़ा सकता है, इसलिए इन सबसे बचना चाहिए:

  • तीखी और मसालेदार चीजें जैसे कि मिर्च, नमकीन, गरम मसाले, सोसेज आदि
  • तला हुआ, अधिक मसला युक्त और तीखे वाले खाद्य पदार्थ
  • शराब, सिगरेट और अन्य नशीली चीजें
  • कॉफी और चाय का अत्याधिक सेवन
  • चॉकलेट और मिठाई।

इसके अलावा, भोजन करने के तुरंत बाद पानी पीने और सोने से भी बचना चाहिए, क्योंकि इससे भी पेट में जलन हो सकती है। आशा करते हैं कि यह जानकारी आपकी सहायता करेगी।

पेट के जलन का इलाज कैसे होता है?

पेट में जलन के विभिन्न कारण हो सकते हैं जैसे कि खराब खान-पान की आदतें, ऊतकों का दोष, एसिडिटी, पाचन तंत्र की अनुपचयता, एलर्जी, विषैले पदार्थों से प्रभावित होना आदि।

जब खाने में तीखी और मसालेदार चीजें होती हैं तो पेट में अधिक एसिडिटी का उत्पादन होता है जिससे पेट में जलन होती है। इसके अलावा, एसिडिटी के कारण भी पेट में जलन हो सकती है।

जब पाचन तंत्र की अनुपचयता होती है, तो पाचन तंत्र में खराबी के कारण आहार के पाचन को पूरा करने में कठिनाई होती है। इससे आहार पेट में रह जाता है जो बाद में पेट में जलन का कारण बनता है।

एलर्जी और विषैले पदार्थों से प्रभावित होने से भी पेट में जलन हो सकती है। एलर्जी के कारण आहार के साथ-साथ शरीर में सूजन होती है जो पेट में जलन या दर्द का कारण बन सकती है। इसी तरह, विषैले पदार्थों से प्रभावित होने से भी पेट में जलन होती है।

पेट में जलन होने पर डॉक्टर से कब मिलना चाहिए?

यदि आपको लगातार पेट में जलन होती है तो आपको एक डॉक्टर से जल्द से जल्द मिलना चाहिए। अधिक मात्रा में जलन के कुछ गंभीर कारण हो सकते हैं, जैसे कि पेट के अल्सर, गैस्ट्रो-ओइसोफेजियल रिफ्लक्स रोग, कैंसर या अन्य गंभीर समस्याएं आदि।

इसके अलावा, यदि जलन के साथ-साथ आपको जी मचलाना, उलटी, दस्त, बुखार या अन्य संबंधित लक्षण भी होते हैं, तो आपको तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए। साथ ही, आप डॉक्टर से मिलने से पहले अपने लक्षणों को ध्यान से समझें और डॉक्टर से मिलकर इस बारे में बी=उन्हें विस्तार से बताएं। साथ ही, डॉक्टर से मिलने से पहले तक मसालेदार और तली हुई या तीखी चीजों को खाने से बचें।

अगर आपको पेट में जलन रहता है या एसिडिटी से परेशान हैं तो आप हमारे विशेषज्ञ के साथ अपॉइंटमेंट बुक करके उनसे परामर्श कर सकते हैं। सीके बिरला हॉस्पिटल में पेट में जलन और एसिडिटी का सर्वश्रेष्ठ उपचार प्रदान किया जाता है। अपना अपॉइंटमेंट बुक करने के लिए आप इस पेज के ऊपर दाहिनी और दिए गए बुक अपॉइंटमेंट फॉर्म या मोबाईल नंबर का इस्तेमाल कर सकते हैं।

एसिडिटी का कारण और इलाज | Acidity Causes & Treatment in Hindi
Mar 29, 2023|Dr. Anukalp Prakash

एसिडिटी का कारण और इलाज | Acidity Causes & Treatment in Hindi

एसिडिटी आम स्थिति है जिसमें पेट के ऊपरी हिस्से में एसिड की मात्रा बढ़ जाती है। इसके कारण आपको अनेक समस्याओं का सामना करना पद सकता है जैसे कि अपच, उल्टी, पेट में तकलीफ, त्वचा में जलन आदि। एसिडिटी के मुख्य कारणों में अत्याधिक खान-पीना, भोजन के समय अधिक पानी पीना, डाइट में तीखी मसालों और चाय जैसी चीजों को करना आदि।

एसिडिटी का इलाज में डाइट में बदलाव और जीवनशैली में व्यायाम आदि शामिल हैं। एक चिकित्सक द्वारा निर्धारित दवाओं और घरेलू नुस्खे भी एसिडिटी के इलाज में मदद कर सकते हैं।

एसिडिटी में क्या खाना चाहिए?

एसिडिटी होने पर आपको ऐसे आहार का सेवन करना चाहिए जो आपको अधिक ऊर्जा और पोषण प्रदान और एसिडिटी के लक्षणों को कम करें। एसिडिटी में निम्नलिखित आहार के सेवन का सुझाव दिया जाता है:

  • सलाद, गाजर, गोभी, शिमला मिर्च, खीरा, अंगूर, खरबूजा और पपीता जैसे फल आदि
  • अंडे, दूध, दही, पनीर, सोया आदि जैसे प्रोटीन युक्त आहार
  • ब्राउन चावल, ओट्स, ब्रेड, मक्का, रोटी और बेसन जैसे अनाज का सेवन
  • दाल, चना, लोबिया और मूंगफली जैसे फलौलीय भोजन का सेवन
  • एसिडिटी में हरी चाय का सेवन करना फायदेमंद होता है। इससे पेट की गर्मी भी कम होती है।

इसके अलावा, आपको अधिक पानी पीना चाहिए और खाने के बाद अधिक पानी पीने से बचना चाहिए। साथ ही, भोजन के बाद जल्दी सोने से बचना चाहिए और खाना खाने के थोड़े समय के बाद टहलना चाहिए।

ये भी पढ़े: एसिडिटी से तुरंत राहत पाने के घरेलू नुस्खे

एसिडिटी में क्या नहीं खाना चाहिए?

एसिडिटी होने पर आपको कुछ चीजों का सेवन करने से बचना चाहिए, क्योंकि ये आपके लक्षणों को और गंभीर बना सकते हैं। एसिडिटी होने पर निम्न चीजों से परहेज करने का सुझाव दिया जाता है:

  • मसालेदार और तली हुई चीजें एसिडिटी को बढ़ा सकती हैं, इसलिए उन्हें खाने से बचें।
  • कॉफी और चाय में कैफीन और अन्य उत्तेजक तत्व होते हैं, जो एसिडिटी को बढ़ा सकते हैं। इसलिए, इन दोनों की मात्रा कम से कम रखें।
  • फास्ट फूड में तेल और मसाले होते हैं, जो एसिडिटी को बढ़ा सकते हैं। इसलिए, इन्हें खाने से बचें।
  • चिप्स और फ्रेंच फ्राइज अधिक मसालेदार होते हैं और तले हुए होते हैं, जो एसिडिटी को बढ़ा सकते हैं। इसलिए, इन्हें खाने से बचें।

इन सबके अलावा, सिगरेट और सिगरेट से परहेज करें। ये एसिडिटी के मुख्य कारणों में से एक हैं।

एसिडिटी का इलाज

एसिडिटी का इलाज उसके कारण और लक्षणों के आधार पर निर्भर करता है। यदि एसिडिटी कम होती है, तो इलाज की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन यदि लक्षण गंभीर होते हैं और नियंत्रण में नहीं होते हैं, तो निम्नलिखित उपायों को अपनाना चाहिए:

  • एंटासिड दवाएं एसिडिटी के लक्षणों को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। डॉक्टर आपको आपके लक्षणों के आधार पर उचित दवा निर्धारित करेंगे।
  • आपको खाने की आदतों में बदलाव करने की आवश्यकता हो सकती है। आपको अपने भोजन में तले हुए खाद्य पदार्थों और मसालेदार खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए। अधिक मात्रा में भोजन करने से भी एसिडिटी होती है, इसलिए छोटे-छोटे भोजन करें।
  • योग और व्यायाम एसिडिटी को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। कुछ योगासन और प्राणायाम एसिडिटी को कम करने में मदद कर सकते हैं।

एसिडिटी एक आम समस्या है जो जलन, पेट में गैस, ऊंचाई के दर्द और भोजन के बाद तकलीफ पैदा करती है। इस समस्या के लिए कुछ घरेलू उपचार निम्नलिखित हैं:

  • दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स अपनी पाचन शक्ति को बढ़ाते हैं जो एसिडिटी को कम करने में मदद करते हैं। आप रोज दो या तीन बार एक कप दही का सेवन कर सकते हैं।
  • सेब का सिरका एसिडिटी के कारण उत्पन्न होने वाली जलन को शांत करने में मदद करता है। आप एक टेबल स्पून सेब के सिरके को एक कप पानी में मिलाकर पी सकते हैं।
  • नारियल पानी अम्लता को नियंत्रित करने में मदद करता है। आप रोज एक गिलास नारियल पानी का सेवन कर सकते हैं।
  • टुलसी में पाए जाने वाले विशेष तत्व एसिडिटी को कम करने में मदद करते हैं। आप एक गिलास पानी में 5-6 तुलसी की पत्तियों को उबालकर उस पानी को ठंडा करके पी सकते हैं।

इन सबके अलावा, आप का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। जीरा में मौजूद विशेष तत्व एसिडिटी को दूर करने में मदद करता है। आप पानी में जीरा को हल्का गर्म करने के बाद उसका पानी पी सकते हैं।

अगर आप एसिडिटी से परेशान हैं तो हमारे विशेषज्ञ के साथ अपॉइंटमेंट बुक करके उनसे परामर्श कर सकते हैं। सीके बिरला हॉस्पिटल में एसिडिटी का सर्वश्रेष्ठ उपचार प्रदान किया जाता है। अपना अपॉइंटमेंट बुक करने के लिए आप इस पेज के ऊपर दाहिनी और दिए गए बुक अपॉइंटमेंट फॉर्म या मोबाईल नंबर का इस्तेमाल कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एसिडिटी बढ़ने से क्या होता है?

एसिडिटी बढ़ने से पेट में अधिक अम्ल उत्पन्न होता है जो जलन, पेट में गैस, ऊंचाई के दर्द और भोजन के बाद तकलीफ पैदा करती है। इससे भोजन के पाचन को भी प्रभावित किया जा सकता है जो पेट में तकलीफ का कारण बनता है।

एसिडिटी का दर्द कहाँ होता है?

एसिडिटी के दौरान दर्द अधिकतर ऊंचाई के ऊपरी हिस्से, पेट के उच्च भाग में, सीने के पीछे या छाती के मध्य भाग में होता है।

क्या दही खाने से एसिडिटी होती है?

नहीं, दही एसिडिटी का कारण नहीं होती है। बल्कि ,दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स एसिडिटी और पाचन संबंधी समस्याओं को कम करने में मदद करते हैं।

गैस और एसिडिटी में क्या अंतर है?

गैस और एसिडिटी दो अलग-अलग समस्याएं हैं। गैस उत्पन्न होने से पेट में सूजन, तकलीफ और उच्चार के समय दर्द होता है। एसिडिटी में पेट के ऊपरी हिस्से में जलन, दर्द और पेट फूलने जैसी समस्याएं होती हैं।

किडनी में सूजन का कारण और इलाज | Kidney Inflammation in Hindi
Mar 20, 2023|Dr. Mohit Khirbat

किडनी में सूजन का कारण और इलाज | Kidney Inflammation in Hindi

किडनी में सूजन का मतलब होता है कि किडनी की सामान्य स्थिति से अधिक तरलता हो जाती है जो कि एक या दोनों किडनियों में हो सकता है। यह असामान्य तरलता किडनी के स्वस्थ फंक्शन को प्रभावित कर सकती है, जिससे मूत्र में प्रोटीन, रक्त या अन्य संदृश्य तत्वों के उच्च स्तर का अनुभव हो सकता है। 

किडनी में सूजन के कुछ कारण हो सकते हैं जैसे गुर्दे की पथरी, संक्रमण, किडनी का कैंसर या अन्य गंभीर रोग।

किडनी में सूजन के कारण

किडनी में सूजन के कई कारण हो सकते हैं। यहां कुछ सामान्य कारण दिए गए हैं:

  • गुर्दे की पथरी किडनी के बॉक्स में अतिरिक्त दबाव डालती है जो सूजन का कारण बनता है।
  • किडनी में संक्रमण सूजन के एक अहम कारण है।
  • किडनी का संक्रमण, जिसे पायलिया भी कहा जाता है, सूजन का कारण बन सकता है।
  • किडनी का कैंसर भी सूजन का कारण बनता है।
  • गुर्दे का संक्रमण भी किडनी में सूजन का कारण बन सकता है।
  • गुर्दे की खराबी भी सूजन का कारण बन सकती है।
  • उच्च रक्तचाप भी किडनी में सूजन का कारण बन सकता है।

अन्य कारण: अन्य कारण जैसे दवाओं का उपयोग, खाने का सामान और शरीर में तरलता के कारण भी सूजन का कारण बन सकते हैं।

किडनी में सूजन के क्या लक्षण हैं?

किडनी में सूजन होने पर आप खुद में अनेक लक्षणों को अनुभव कर सकते हैं। इसमें मुख्य रूप से निम्नलिखित शामिल हैं:

  • किडनी में सूजन के कारण पेशाब में तकलीफ हो सकती है। यह तकलीफ पेशाब करते समय महसूस की जाती है।
  • किडनी में सूजन के कारण पेशाब की मात्रा में बदलाव आ सकता है। पेशाब की मात्रा कम हो सकती है या फिर बहुत ज्यादा हो सकती है।
  • किडनी में सूजन के कारण पेशाब में रक्त आने का खतरा होता है।
  • किडनी में सूजन के कारण शरीर में पानी की कमी होती है। इसके चलते बहुत अधिक प्यास लगती है।
  • किडनी में सूजन के कारण थकान और ऊब हो सकती है।
  • किडनी में सूजन के कारण मुंह से बदबू आने लगती है।
  • किडनी में सूजन के कारण उल्टी आने की समस्या हो सकती है।

यदि आपको इन लक्षणों में से कुछ भी होता है तो आपको तुरंत अपने चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।

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किडनी में सूजन का इलाज

किडनी में सूजन के इलाज के लिए कारगर उपाय निम्नलिखित हो सकते हैं:

  1. दवाइयां: डॉक्टर द्वारा निर्धारित दवाओं का सेवन करना सूजन के कारणों को ठीक करने में मदद कर सकता है। दवाइयों में शामिल हो सकती हैं: पेशाब का अधिक उत्सर्जन करने वाली दवाएं, स्टेरॉयड दवाएं, यूरिक एसिड के स्तर को कम करने वाली दवाएं, जिनके प्रभाव से सूजन में कमी होती है।
  2. विशेष आहार: सूजन के कारण अधिक खाद्य पदार्थों, शराब या कॉफी जैसी चीजों से बचना चाहिए। इसके बजाय, खाद्य पदार्थों में उच्च प्रोटीन और नियमित रूप से पानी का सेवन करना चाहिए। अधिक मात्रा में पानी पीने से शरीर से तैयार उपयोग के अतिरिक्त पदार्थ निकालने में मदद मिलती है।
  3. व्यायाम: नियमित व्यायाम सूजन के कारणों को ठीक करने में मदद कर सकता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं की मौजूदगी में डॉक्टर द्वारा सलाह दी गई व्यायाम आदि।

किडनी में सूजन के इलाज के लिए सर्जरी अंतिम विकल्प होता है, जब अन्य उपचार विफल हो जाते हैं या सूजन बहुत अधिक होती है। सर्जरी की जरूरत निर्धारित करने के लिए, एक डॉक्टर रोगी की स्थिति के आधार पर अनुकूल उपचार का निर्णय लेता है।

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किडनी से संबंधित समस्याओं में सर्जरी के अलग-अलग प्रकार होते हैं, जैसे कि यूवीजी ट्रैक्ट संक्रमण, पेशाब में संक्रमण या गुर्दे के पत्थर आदि। सर्जरी के बाद, रोगी को विशेष देखभाल की जरूरत होती है और उन्हें डॉक्टर द्वारा निर्दिष्ट दवाओं का सेवन करना भी आवश्यक हो सकता है।

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किडनी में सूजन होने पर क्या खाना चाहिए?

किडनी में सूजन होने पर आपको उत्तरदायी खाद्य पदार्थ खाने से बचना चाहिए। सूजन के कारण, किडनी निर्मित किया जाने वाला उपयोगी पदार्थ भी इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे किडनी का दबाव कम हो सकता है।

यहाँ कुछ खाद्य पदार्थ हैं, जो किडनी में सूजन होने पर उपयोगी हो सकते हैं:

  • अधिक मात्रा में पानी पीने से किडनी के कार्य को सही ढंग से करने में मदद मिलती है। दिन में कम से कम 8-10 गिलास पानी पीने का सुझाव दिया जाता है।
  • सूजन कम करने के लिए हाई फाइबर सब्जियां और फल खाने की सलाह दी जाती है।
  • अधिक प्रोटीन और लो फैट वाले खाद्य पदार्थ खाने से किडनी को अधिक काम नहीं करना पड़ता है जो सूजन कम करने में मदद करता है।
  • ये फल किडनी को सही ढंग से काम करने में मदद करते हैं।

साथ ही, अगर आपको पहले से कोई स्वास्थ्य संबंधित समस्या है तो इन सबका पालन करने से पहले डॉक्टर से एक बार अवश्य राय लें।

मुंह में छाला होने के कारण, लक्षण और उपचार | Mouth Ulcers in Hindi
Mar 20, 2023|Dr Manisha Arora

मुंह में छाला होने के कारण, लक्षण और उपचार | Mouth Ulcers in Hindi

मुंह में छाले होने का मतलब है मुंह में छोटे दाने बनना। ये आमतौर पर एक सप्ताह से दस दिनों के भीतर अपने आप ही ठीक हो जाते हैं। मुंह के छले को अल्सर या अफ़्ता के रूप में भी कहा जाता है।

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मुंह में छाला क्यों होता है?

मुंह में छाले कई कारणों से हो सकते हैं। इसके मुख्य कारणों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:

  • मुंह में छाले सबसे आमतौर पर त्वचा के घावों से होते हैं। ये घाव मुंह के किसी भी हिस्से में हो सकते हैं जैसे कि गले, जीभ या मुंह के अंदरी भाग।
  • मुंह के अंदर जीभ या दांतों से चोट लगने से भी छाले हो सकते हैं।
  • वायरस, बैक्टीरिया या फंगल संक्रमण भी मुंह में छाले के कारण हो सकते हैं।
  • कुछ लोगों को मुंह में छालों की समस्या खाने की वस्तुओं से एलर्जी के कारण होती है।
  • मुंह में छाले होने के अन्य कारणों में नुस्खेदार गायब होने के कारण भी शामिल होते हैं, जो मुंह में छाले को बढ़ावा देते हैं।

आप ऊपर दिए गए कारणों को ध्यान में रखकर कुछ सावधानियां बरतें तो खुद को इस समस्या से बचा सकते हैं।

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मुंह में छाले होने पर क्या लक्षण दिखते हैं?

मुंह में छाले होने पर आपका दैनिक जीवन बुरी तरह प्रभावित हो सकता है, क्योंकि आपका खाना-पीना मुश्किल हो जाता है। मुंह में छाले होने पर आप छालों के अलावा निम्नलिखित लक्षण अनुभव कर सकते हैं:

  • मुंह में छाले होने पर ज्यादातर लोगों को दर्द का अनुभव होता है।
  • छाले के कारण असुविधा की स्थिति हो सकती है, जिससे खाने में तकलीफ हो सकती है।
  • छाले के आसपास फुंसियां हो सकती हैं जो और ज्यादा दर्दभरी हो सकती हैं।
  • छाले के समय जलन हो सकती है जो खाने पीने में तकलीफ पैदा कर सकती है।
  • छाले के कारण मुंह में सुखापन अनुभव हो सकता है जो आराम नहीं देता है।
  • कुछ छाले यदि संक्रमित हो जाते हैं तो उनमें पानी भर सकता है जो संक्रमण के बढ़ने का कारण बन सकता है।

अगर आप खुद में ऊपर दिए गए लक्षणों को अनुभव करते हैं तो जल्द से जल्द विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।

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मुंह में छाले का इलाज कैसे होता है?

मुंह में छाले का उपचार उनकी वजह और गंभीरता पर निर्भर करता है। यदि छाले गंभीर हैं और लंबे समय तक ठीक नहीं होते हैं, तो चिकित्सक द्वारा निर्धारित उपचार करना चाहिए।

कुछ आम उपाय निम्नलिखित हैं:

  • हल्दी, नमक और लाल मिर्च जैसे घरेलू उपचार मुंह में छालों के लिए लाभदायक हो सकते हैं। तुलसी, बेकिंग सोडा और नींबू का रस भी उपयोगी होता है।
  • लगातार मुंह सुखाने से या जीभ कटने से मुंह के संरक्षक तंत्र में नुकसान हो सकता है। इसलिए, मुंह को हमेशा नम रखें और संरक्षण के लिए मुंह के लिए बनाए गए मुंहदोष उत्पादों का उपयोग करें।
  • बड़े और गंभीर छालों के लिए, चिकित्सक द्वारा निर्धारित दवाइयों का उपयोग करें। कुछ दवाएं जैसे कॉर्टिकोस्टेरॉयड क्रीम और मुंहदोष संरक्षण दवाएं छाले को ठीक करने में मदद कर सकती हैं।

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मुंह में छाले होने से कैसे बचें?

मुंह में छालों से बचने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं:

  • मुंह को साफ रखना बहुत महत्वपूर्ण है। रोजाना दो बार अच्छी तरह से मुंह धोना चाहिए।
  • फल, सब्जियां, दूध, दही आदि जैसे ऊर्जा और पोषण से भरपूर आहार को शामिल करना चाहिए।
  • तंबाकू छालों के विकास का एक मुख्य कारण होता है। इसलिए इसका सेवन करना बंद कर देना चाहिए।
  • खट्टे मसालेदार, तले हुए, और मसालेदार चीजों से बचना चाहिए।
  • अल्सर दवाओं का उपयोग डॉक्टर की सलाह के अनुसार करें।
  • नियमित रूप से दांतों की सफाई करें।
  • अत्यधिक स्ट्रेस के कारण छाले हो सकते हैं। इसलिए स्ट्रेस कम करने के उपाय अपनाना चाहिए, जैसे मेडिटेशन और योग।

अगर आप खुद को मुंह के छले से बचाना चाहते हैं तो ऊपर दिए गए सुझावों का नियमित रूप से पालन करें।

खून की कमी के कारण, लक्षण और इलाज | Blood Deficiency in Hindi
Mar 20, 2023|Dr Rajiva Gupta

खून की कमी के कारण, लक्षण और इलाज | Blood Deficiency in Hindi

शरीर में खून की कमी होने पर उसे मेडिकल भाषा में अनीमिया कहते हैं। यह एक स्वास्थ्य स्थिति है जिसमें शरीर में संख्यात्मक रूप से कम रक्त कोशिकाएं होती हैं जिससे शरीर को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। एनीमिया कई प्रकार की हो सकती हैं जैसे कि आयरन की कमी, फोलिक एसिड की कमी और विटामिन बी 12 की कमी इत्यादि।

खून की कमी के कारण (Reason for Blood Deficiency)

खून की कमी के कई कारण हो सकते हैं। इसके मुख्य कारणों में निम्न शामिल हो सकते हैं: 

  • आयरन, फोलिक एसिड और विटामिन बी 12 जैसे पोषक तत्वों की कमी के कारण खून की कमी हो सकती है।
  • कुछ बीमारियां या अन्य स्थितियों में रक्तसंचार में बाधा हो सकती है, जो अलग-अलग कारणों से हो सकती है, जैसे अंगों में रक्त की कमी, कैंसर, थालस्सेमिया आदि।
  • जैसे कि चिकित्सा के दौरान अधिक रक्त निकाला जाता है, दुर्घटना, शल्य चिकित्सा, अनुवांशिक कारणों से रक्त की नष्ट हो सकती है।
  • अनेक संक्रमण खून की कमी के कारण बन सकते हैं। उदाहरण के लिए, मलेरिया, टाइफाइड, हेपेटाइटिस इत्यादि।

इन सबके अलावा, शरीर में खून की कमी होने के अन्य कारण भी हो सकते हैं जैसे कि ऑटोइम्यून विकार। कुछ ऑटोइम्यून विकार जैसे लुपस, रेक्टम अर्थराइटिस, सेलियक रोग आदि भी खून की कमी के कारण बन सकते हैं।

खून की कमी के लक्षण(Symptoms of Anemia)

खून की कमी होने पर आप खुद में कुछ लक्षणों को अनुभव कर सकते हैं जैसे कि:

  • थकान और कमजोरी महसूस करना
  • सांस लेने में दिक्कत होना
  • बुखार के साथ कपकपी होना
  • त्वचा में सूखापन और सूजन होना
  • सिरदर्द होने और नींद नहीं आना 
  • मांसपेशियों और नसों का दुर्बल होना
  • धड़कन तेज होना जिससे बेचैनी होती है
  • चक्कर आना और कभी-कभी उलटी होना
  • भूख का कम होना और खाने में कुछ खास स्वाद न होना

अगर आप ऊपर दिए गए किसी भी लक्षण को खुद में अनुभव करते हैं तो आपको जल्द से जल्द विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श करना चाहिए।

खून की कमी का इलाज (Treatment of Anemia)

खून की कमी का इलाज उसके कारणों पर निर्भर करता है। खून की कमी के उपचार के लिए कुछ सामान्य उपाय निम्नलिखित हैं:

खून की कमी के उपचार के लिए आहार में आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन सी और विटामिन बी 12 के स्रोतों का सेवन बढ़ाया जा सकता है। अनाज, फल और सब्जियां, दूध और दूध से बनी चीजें, मांस आदि खाद्य पदार्थों के सेवन से आपको जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं।

आयुर्वेद में खून की कमी के लिए कई जड़ी-बूटियों का उपयोग किया जाता है। ये जड़ी-बूटियां आयरन की अवधि को बढ़ाती हैं और खून की संरचना को बढ़ाती हैं।

शिलाजीत, अश्वगंधा आदि विशिष्ट आयुर्वेदिक आश्वासन खून की कमी में लाभकारी होते हैं। एलोपैथिक दवाओं का उपयोग भी खून की कमी के इलाज में किया जाता है। एलोपैथिक दवाएं खून की कमी से होने वाले खतरों की संभावना को कम करते हैं।

अगर आपके शरीर में खून की कमी है तो विशेषज्ञ डॉक्टर से परामर्श करना आवश्यक है। डॉक्टर खून की कमी के कारण, लक्षण, पहले से चल रही आपकी दवा और संपूर्ण स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए उपचार के प्रकार का चयन करते हैं।

खून की कमी से बचने के उपाय (Ways to avoid Blood Deficiency)

अपने आहार में आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन सी, विटामिन बी 12 और अन्य महत्वपूर्ण पोषक तत्वों को शामिल करें। अपने आहार में पालक, अंडे, मांस, सूखी फलों, दालें, अनाज आदि शामिल करें।

नियमित रूप से व्यायाम करें और पर्याप्त नींद लें। समय पर खाना खाएं और विश्राम करें। डॉक्टर द्वारा सलाह दी गई विटामिन सुप्लीमेंट्स का सेवन करें। विटामिन बी 12 और डी के सप्लीमेंट का सेवन खून की कमी से बचने में मदद करता है।

नियमित चेकअप कराएं ताकि आप खून की कमी या किसी भी अन्य स्वास्थ्य समस्या का पता लगा सकें और उसे सही समय पर ठीक कर सकें। साथ ही, तंबाकू या अल्कोहल से दूर रहें और अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। आपके खून की कमी के पीछे अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं, इसलिए उन्हें भी ध्यान रखें।

कैल्शियम की कमी के कारण, लक्षण और उपचार | Calcium Deficiency In Hindi
Mar 16, 2023|Ms. Deepali Sharma

कैल्शियम की कमी के कारण, लक्षण और उपचार | Calcium Deficiency In Hindi

कैल्शियम एक धातु है जो मानव शरीर के लिए आवश्यक होता है। कैल्शियम हड्डियों, दांतों, मांसपेशियों, नसों और अन्य शरीर के अंगों के विकास और संरचना के लिए जरूरी होता है। इसके अलावा, कैल्शियम शरीर की अनेक क्रियाओं जैसे दिल की गतिशीलता, खून का थक्का, हॉर्मोन सक्रियता आदि को नियंत्रित करता है।

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कैल्शियम की कमी के कारण

शरीर में कैल्शियम की कमी होने पर आपको अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कैल्शियम की कमी अनेक कारणों से हो सकती है जिसमें मुख्य रूप से निम्न शामिल हैं:

  • यदि आपका आहार कैल्शियम समृद्ध नहीं है, तो आपके शरीर में कैल्शियम की कमी हो सकती है। आमतौर पर दूध उत्पादों, गाजर, मूली, पालक, नींबू, अंजीर जैसे आहार में कैल्शियम मौजूद होता है।
  • अधिक मात्रा में कैफीन और एल्कोहल के सेवन से भी कैल्शियम की कमी हो सकती है।
  • वयस्कता के साथ, शरीर कैल्शियम का संचय कम करता है।
  • कैल्शियम की कमी नपुंसकता या ओस्टियोपोरोसिस के कारण हो सकती है।
  • विटामिन डी शरीर में कैल्शियम का संचय करने में मदद करता है। विटामिन डी की कमी भी कैल्शियम की कमी का कारण बन सकती है।

अन्य कारण: कुछ दवाओं और बीमारियों भी कैल्शियम की कमी का कारण बन सकते हैं, जैसे कि किडनी रोग, अल्जाइमर रोग, और कैंसर।

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कैल्शियम की कमी के लक्षण

कैल्शियम शरीर के लिए एक महत्वपूर्ण मिनरल होता है जो हड्डियों, दांतों और न्यूरो-मस्कुलर फण्क्शन के लिए आवश्यक होता है। कैल्शियम की कमी के कुछ लक्षण निम्नलिखित हैं:

  • कैल्शियम आपकी हड्डियों के लिए आवश्यक होता है जो उन्हें मजबूत और स्वस्थ रखता है। कम कैल्शियम वाले खाद्य पदार्थों के सेवन से, हड्डियों की कमजोरी होती है जिससे आपकी हड्डियां भंगुर हो सकती हैं और घायल होने की संभावना बढ़ जाती है।
  • कैल्शियम एक महत्वपूर्ण रोल न्यूरो-मस्कुलर फंक्शन के लिए भी निभाता है, जो मांसपेशियों को संचालित करता है। कम कैल्शियम से, आप मांसपेशियों में दर्द और दुख से पीड़ित हो सकते हैं।
  • कैल्शियम दांतों के लिए भी आवश्यक होता है जो उन्हें स्वस्थ और मजबूत बनाता है। कम कैल्शियम से, आपके दांतों में संक्रमण और दर्द की संभावना बढ़ जाती है।

इन सबके अलावा, कैल्शियम की कमी होने पर आप खुद में अन्य लक्षण भी अनुभव कर सकते हैं जैसे की जोड़ों और हड्डियों में दर्द आदि।

शरीर में कैल्शियम की कमी होने पर क्या करना चाहिए?

अधिकतर केस में, आपके शरीर में कैल्शियम की कमी आहार में कैल्शियम की कमी के कारण होती है। इसलिए, आपको कैल्शियम से भरपूर आहार लेना चाहिए। आप दूध और दूध से बनी चीजें, सोया दूध, तिल, साग और खजूर जैसी खाद्य पदार्थ खा सकते हैं जो कैल्शियम से भरपूर होते हैं।

विटामिन डी की कमी भी कैल्शियम की कमी का कारण हो सकती है। विटामिन डी सूर्य की किरणों के संपर्क में शरीर में उत्पन्न होता है। इसलिए, रोज सूर्योदय और सूर्यास्त के दौरान कम समय के लिए सूर्य की किरणों से संपर्क करना चाहिए।

नियमित व्यायाम भी शरीर में कैल्शियम की आपूर्ति में सुधार करता है। व्यायाम करने से हड्डियों में तनाव बढ़ता है और इससे शरीर में कैल्शियम की आपूर्ति में सुधार होता है।

कैल्शियम की कमी से कमर में दर्द होता है क्या?

हाँ, कैल्शियम की कमी से कमर में दर्द हो सकता है। कैल्शियम एक महत्वपूर्ण मिनरल होता है जो हड्डियों, दांतों, नसों, मांसपेशियों और अन्य शरीर के अंगों के स्वस्थ विकास और कार्यों के लिए आवश्यक होता है।

कैल्शियम की कमी होने पर हड्डियों और मांसपेशियों की कमजोरी होती है जो कमर और पीठ में दर्द का कारण बन सकती है। इसके अलावा कमजोर हड्डियों की वजह से बढ़ती उम्र के साथ अधिक बोझ उठाने पर भी कमर में दर्द हो सकता है।

यदि आपको कमर और पीठ में दर्द हो रहा है तो आपको अपने चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। वे आपकी स्थिति की जांच करेंगे और कमजोर हड्डियों या कैल्शियम की कमी जैसी किसी समस्या को दूर करने के लिए आपको सलाह देंगे।

क्या कैल्शियम की कमी से घुटनों में दर्द होता है?

हाँ, कैल्शियम की कमी से घुटनों में दर्द हो सकता है। कैल्शियम एक महत्वपूर्ण मिनरल होता है जो हड्डियों, दांतों, नसों, मांसपेशियों और अन्य शरीर के अंगों के स्वस्थ विकास और कार्यों के लिए आवश्यक होता है।

कैल्शियम की कमी होने से हड्डियों और मांसपेशियों की कमजोरी होती है जो घुटनों जैसे जोड़ों को भी प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा कमजोर हड्डियों की वजह से घुटनों को सहने में अधिक दर्द हो सकता है।

यदि आपको घुटनों में दर्द हो रहा है तो आपको अपने चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। वे आपकी स्थिति की जांच करेंगे और कमजोर हड्डियों या कैल्शियम की कमी जैसी किसी समस्या को दूर करने के लिए आपको सलाह देंगे।

रोबोटिक सिस्टम और आर्थोपेडिक सर्जरी

रोबोटिक सिस्टम और आर्थोपेडिक सर्जरी

1980 से सर्जरी में रोबोट का इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालाँकि, 1992 में पहली बार आर्थोपेडिक सर्जरी में रोबोट का उपयोग किया गया था। समय के साथ, यह तकनीक विकसित हुई है और पारंपरिक आर्थोपेडिक प्रक्रियाओं की तुलना में आशाजनक यानी प्रोमिसिंग परिणाम दिखाए हैं।

वर्तमान में, सर्जरी में रोबोट का इस्तेमाल दो रूप में किया जाता है जिसमें हैप्टिक और ऑटोनॉमस शामिल हैं।

  1. हैप्टिक या स्पर्श सिस्टम: ये सर्जन को ऑपरेशन करने के लिए रोबोट का उपयोग या उसे ड्राइव करने में मदद करते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान सर्जन द्वारा निरंतर इनपुट की मांग होती है।
  2. ऑटोनोमस रोबोटिक सिस्टम: मशीन को स्थापित करने के लिए सर्जन की आवश्यकता होती है, लेकिन एक बार स्थापित हो जाने के बाद, सर्जन की मदद के बिना ही रोबोट सर्जरी को खुद पूरा करता है। रोबोटिक तकनीक के उपयोग ने न्यूनतम इनवेसिव सर्जरी दृष्टिकोण को व्यापक रूप से अपनाने में सक्षम बनाया है। साथ ही, इसने रोगियों के बीच अत्यधिक लोकप्रियता हासिल की है।

रोबोटिक या रोबोट-असिस्टेड सर्जरी मिनिमम एक्सेस सर्जरी को अगले स्तर तक ले जा रही है, जिसमें सर्जन के साथ-साथ रोगी के लिए भी ढेर सारे फायदे हैं। वर्तमान में इसका उपयोग अधिकांश सर्जिकल प्रक्रियाओं में किया जाता है। इसने सर्जन को अधिक सुरक्षा और सटीकता के साथ-साथ सामान्य और जटिल प्रक्रियाएं करने में सक्षम बनाया है।

रोबोटिक सर्जरी कैसे की जाती है?

रोबोट असिस्टेड सर्जरी मुख्य रूप से एक रोबोटिक सिस्टम है जिसे एक सर्जन द्वारा नियंत्रित किया जाता है। सर्जन ऑपरेटिंग टेबल के पास एक कंसोल से काम करते हैं, जो रोबोटिक सिस्टम की भुजाओं (arms) को नियंत्रित करता है।

सर्जन के हाथ और कलाई की हरकतों यानी मूवमेंट्स को रोबोटिक भुजाएं दोहराती हैं। मानव कलाई की सीमाओं को पार करने के लिए रोबोटिक सिस्टम की भुजाओं में व्यापक गति और लचीलापन होता है। जिसके कारण, सर्जन सर्जरी के लिए शरीर के उन क्षेत्रों में भी नेविगेट कर सकते हैं जो पहले पारंपरिक सर्जरी में सुलभ या संभव नहीं था।

इसके अलावा, रोबोटिक सिस्टम 3डी सर्जिकल इमेजिंग तकनीक के कारण सर्जन की धारणा यानी परसेप्शन में भी उच्च गहराई मिलती है जिससे सर्जिकल प्रक्रिया की सटीकता, सुरक्षा और सफलता का स्तर काफी हद तक बढ़ जाता है।

रोबोटिक सर्जरी के फायदे

रोबोटिक सर्जरी के कुछ प्रमुख लाभ हैं, जैसे की:

  • इस सर्जरी की सटीकता अधिक होती है
  • मैनुअल त्रुटि की संभावना कम होने के कारण सुरक्षा अधिक होती है
  • कम से कम दर्द और रक्तस्राव होता है
  • एक ही दिन के अंदर मरीज को अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया है
  • छोटे चीरे लगते के कारण दाग भी नहीं आते हैं

रोबोटिक सिस्टम एक इन-बिल्ट सेफ्टी मैकेनिज्म के साथ आते हैं जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग के एल्गोरिदम के साथ जुड़ा हुआ है। अधिकांश लेप्रोस्कोपिक सर्जन रोबोटिक सर्जरी के ट्रांजिशन को सहज पाते हैं और इसके बारे में ट्रेनिंग लेकर इसे आसानी से अपना लेते हैं। बेहतर पेशेंट रिजल्ट, सुरक्षा उपायों पर सर्जिकल नियंत्रण में वृद्धि और प्रक्रिया की बढ़ी हुई सटीकता धीरे-धीरे रोबोटिक सर्जरी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए पसंदीदा विकल्प बना रही है।

टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी के मामले में इस तकनीक का सबसे सफल कार्यान्वयन देखा गया है। आइए समझें कि टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी में सर्वोत्तम परिणामों का चयन करते समय पारंपरिक, नेविगेटेड और रोबोटिक टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी की तुलना कैसे की जाती है।

रोबोटिक टोटल नी रिप्लेसमेंट (आर्थ्रोप्लास्टी) सबसे प्रभावी तरीका है

पारंपरिक टोटल नी रिप्लेसमेंट या आर्थ्रोप्लास्टी की तुलना में रोबोटिक या रोबोट असिस्टेड सर्जिकल प्रक्रिया अधिक बेहतर परिणाम देते हैं। आइए इसे एक साधारण तुलना से समझने की कोशिश करते हैं।

पारंपरिक टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी

कम रोगी संतुष्टि: टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी के बाद 20% तक रोगी असंतुष्ट रहते हैं। इसका प्राथमिक कारण मानव नियंत्रित चरों (human controlled variables) से जुड़ा है। समझौता करने पर, ये टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी में सकारात्मक परिणामों को बहुत प्रभावित करते हैं, जैसे कि:

  • इम्प्लांट पोजीशनिंग गलत होना
  • असंतुलित फ्लेक्सन-विस्तार में गैप होना
  • लिगमेंट में अनुचित तनाव होना

पारंपरिक जिग-आधारित टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी हड्डी के उच्छेदन यानी विभाजन और प्रत्यारोपण स्थिति को निर्देशित करने के लिए मैन्युअल रूप से स्थित संरेखण जिग्स का उपयोग करता है। इसका मतलब संरेखण-गाइड पोजीशनिंग की खराब प्रजनन क्षमता और पेरिआर्टिकुलर सॉफ्ट-टिश्यू लिफाफे में अनजाने में ब्लेड की चोट के प्रति एक खतरनाक प्रवृत्ति है।

गैप माप या लिगामेंटस टेंशनिंग पर इसका सीमित इंट्रा-ऑपरेटिव डेटा इम्प्लांट पोजिशनिंग के फाइन ट्यूनिंग को प्रतिबंधित करता है। उप-इष्टतम इम्प्लांट पोजिशनिंग के कारण आगे काफी समस्याएं विकसित हो सकती हैं, जैसे कि:

  • कार्यात्मक रिकवरी धीमी होना
  • सकारात्मक नैदानिक परिणामों में कमी आना
  • स्थिरता में कमी आना
  • प्रत्यारोपण का जीवनकाल कम होना

स्पष्ट रूप से इस दृष्टिकोण में और भी समस्याएं हैं जो रोगियों द्वारा बताई गई हैं और समय के साथ विशेषज्ञों द्वारा देखी गई हैं। इस पर काबू पाने के लिए डॉक्टर ने एक नेविगेटेड टीकेए सर्जिकल दृष्टिकोण को अपना लिया है।

नेविगेटेड टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी

नेविगेटेड टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी पारंपरिक दृष्टिकोण की तुलना में बहुत बेहतर है, क्योंकि यह त्रुटियों को खत्म करने के लिए एक नियोजित प्रोटोटाइप दृष्टिकोण को फॉलो करता है।

  • कंप्यूटर सॉफ्टवेयर इंट्रा-ऑपरेटिव ऑसियस मैपिंग से शारीरिक जानकारी को रोगी-विशिष्ट वर्चुअल 3डी मॉडल में परिवर्तित करता है।
  • यह वर्चुअल मॉडल रोगी की शारीरिक रचना के आधार पर श्रेष्ठ हड्डी विभाजन, प्रत्यारोपण की स्थिति, हड्डी कवरेज और संरेखण की योजना बनाने में मदद करता है।
  • इसके अलावा, इसका सुझाव रोगी की शारीरिक संरचना के आधार पर हड्डी के विभाजन और सटीक घटक की स्थिति के लिए भी दिया जाता है।

हालाँकि, इन दोनों प्रक्रियाओं की तुलना में, एकमात्र चिंता जो अभी भी अनसुलझी थी, वह है सटीकता। यही वह जगह है जहां रोबोटिक टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी बाकि प्रक्रियाओं को पीछे छोड़ देता है।

रोबोटिक टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी

यहां एक रोबोटिक डिवाइस उच्च स्तर की सटीकता के साथ प्री-ऑपरेटिव मरीज-विशिष्ट योजना को निष्पादित करने में मदद करता है।

  • ऑप्टिकल मोशन कैप्चर तकनीक इंट्रा-ऑपरे टिव अलाइनमेंट, कंपोनेंट पोजिशनिंग, रेंज ऑफ मूवमेंट, फ्लेक्सन-एक्सटेंशन गैप और सॉफ्ट टिश्यू बैलेंसिंग का आकलन करने में मदद करती है।
  • सर्जन के मोटर फ़ंक्शन पर सक्रिय नियंत्रण नियोजित हड्डी के विभाजन और प्रत्यारोपण स्थिति को प्राप्त करने की सटीकता में सुधार करने में मदद करता है।
  • रीयल-टाइम इंट्राऑपरेटिव डेटा का उपयोग वांछित घुटने कीनेमेटीक्स प्राप्त करने और अतिरिक्त नरम ऊतक रिलीज की आवश्यकता को सीमित करने के लिए हड्डी के विभाजन को ठीक करने और प्रत्यारोपण स्थिति को निर्देशित करने के लिए किया जाता है।
  • पारंपरिक जिग-आधारित टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी की तुलना में नियोजित ऊरु और टिबियल इम्प्लांट पोजिशनिंग, ज्वाइंट लाइन रिस्टोरेशन, लिम्ब अलाइनमेंट और पोस्टीरियर टिबियल स्लोप को प्राप्त करने की बेहतर सटीकता।
  • कम आउटलेयर के साथ तीनों प्लेन्स में इम्प्लांट पोजिशनिंग में सटीकता।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि रोबोटिक टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी सर्जरी रोगियों के लिए अधिकतम सफलता की संभावना रखती है, हम सीके बिरला अस्पताल में नवीनतम रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट सिस्टम का भी उपयोग करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि हर सर्जिकल परिणाम अधिक प्राकृतिक रिकवरी और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जा सके।

सर्जन रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट सिस्टम क्यों चुनते हैं?

रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट सिस्टम के फायदे मुख्य रूप से इसकी व्यापक प्रीऑपरेटिव योजना, इंट्राऑपरेटिव मॉनिटरिंग, रोगी विशिष्ट और सर्जनों द्वारा उचित हस्तक्षेप के लिए जिम्मेदार हैं। ये टोटल नी आर्थ्रोप्लास्टी की सफलता में मुख्य रूप से योगदान करते हैं:

  • अधिक सटीक इम्प्लांट प्लेसमेंट, रोगियों को सर्जरी के बाद प्राकृतिक गति में परिचित होने की भावना देता है
  • आसन्न ऊतकों (adjacent tissues) में चोट आने का खतरा कम होता है
  • बेहतर सुरक्षा होती है और संक्रमण का खतरा कम होता है
  • अस्पताल से जल्दी छुट्टी मिलती है, साथ ही शीघ्र रिहैबिलिटेशन
  • छोटा सा चीरा लगता है और हल्की सी ब्लीडिंग होती है
  • रिकवरी तेजी से होती है
  • जीवन की गुणवत्ता बढ़ती है
  • सर्जरी के जीवनकाल की संभावना अधिक होता है

निष्कर्ष

सर्जरी को हमें स्वस्थ नियमित जीवन जीने से नहीं रोकना चाहिए, उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम सभी को दर्द से उबरने का मौका मिले और असीमित खुशियों का अनुभव करें जो बेहतर जीवन प्रदान करता है। सीके बिरला अस्पताल में हम यह सुनिश्चित करते हैं कि हमारे मरीजों को बेहतर जीवन जीने के लिए सर्वश्रेष्ठ सर्जिकल परिणाम मिले।

सर्जिकल तकनीकों में नवीनतम नवाचारों को लागू करके हम न केवल अपने रोगियों के लिए अवसरों में सुधार करते हैं, बल्कि आर्थोपेडिक सर्जनों की हमारी पुरस्कार विजेता टीम को विश्व स्तरीय स्वास्थ्य सेवाओं के वादे को पूरा करने में भी सक्षम बनाता है।

यदि आप टोटल नी रिप्लेसमेंट कराने के बारे में सोच रहे हैं, तो अब यह सुनिश्चित करने का समय है कि आपको सबसे अच्छा सर्जिकल परिणाम मिले। इसके बारे में परामर्श करने और अधिक जानकारी पाने के लिए आप Dr Ashwani Maichand के साथ आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें

Robotic Systems: Latest Innovation in Orthopaedic Surgery
Jan 30, 2023|Dr Ashwani Maichand

Robotic Systems: Latest Innovation in Orthopaedic Surgery

Robots have been used in surgery since the late 1980s, and in orthopaedic surgery since 1992. Overtime, the technology has evolved and showed promising outcomes when compared with traditional orthopaedic procedures. Currently these are performed in two modes: haptic and autonomous.

  • Haptic or tactile systems: These allow the surgeon to use or ‘drive’ the robot to perform the operation. It demands constant input by the surgeon to perform the procedure.
  • Autonomous robotic systems: These require the surgeon to set up the machine, but once engaged, the robot completes the surgery without the surgeon’s help. The use of robotic technology has enabled a wider adoption of the minimally invasive surgery approach, which has gained immense popularity with patients.

Robotic or Robot-assisted surgery, is taking minimal access surgery to the next level with a plethora of advantages for the surgeon as well as the patient. Currently used in a majority of surgical procedures, it has enabled surgeons to perform common and complex procedures with greater safety and precision. Results of the above have proven to be beneficial from the patient’s as well as the surgeon’s perspective.

How is robotic surgery performed?

A robot assisted surgery is primarily a robotic system that is controlled by a surgeon. The surgeon operates from a console near the operating table, which controls the arms of the robotic system. The surgeon’s hand and wrist movements are exactly replicated by the tip of the wrist on the robotic arm. This arm has a wide array of movement and flexibility to overcome the limitations of a human wrist.

Due to this robot enabled dexterity, the surgeon can navigate into areas in the surgical space which were previously not accessible in conventional surgical approach. Moreover, the robotic system lends the surgeon a higher depth in perception due to a 3D surgical imaging technique. This vastly increases the accuracy and safety of the surgical procedure.

Advantages of Robotic Surgery

Some of the key advantages of robotic surgery are:

  • Greater accuracy due to precision based approach.
  • Higher safety with reduced chances of manual error.
  • Minimal pain and blood loss.
  • Shorter hospital stay with patients being discharged in a day, and
  • Excellent cosmetic results due to tiny incisions.

Robotic systems come with an in-built safety mechanism that is factored in with algorithms of artificial intelligence and machine learning. Most laparoscopic surgeons find the transition to robotic surgery seamless, and adapt easily with a short learning curve. The excellent patient outcomes, increased surgical control over the safety measures and the enhanced accuracy of the procedure are gradually making robotic surgeries the preferred option for healthcare providers far and wide.

The most successful implementation of this technology has been observed in the case of Total Knee Arthroplasty. Let us understand how conventional, navigated and robotic TKA’s compare when choosing the best outcomes in a TKA surgery.

Robotic Total Knee Replacement (Arthroplasty) is the most effective approach

Compared to conventional total knee replacement or arthroplasty, robotic or robot assisted surgical approaches give far better outcomes. Let us understand with a simple comparison.

Conventional TKA

  • Low patient satisfaction: Up to 20% of patients remain dissatisfied following TKA. The primary reason for this is linked to human controlled variables. When compromised, these greatly affect positive outcomes in TKA due to:
    • In-accurate implant positioning.
    • Imbalanced flexion-extension gaps.
    • Improper ligament tensioning.
    • Impacted periarticular soft-tissue envelope.
  • Conventional jig-based TKA uses manually positioned alignment jigs to guide bone resection and implant positioning. This also means poor reproducibility of alignment-guide positioning and an alarming tendency towards inadvertent saw blade injury to the periarticular soft-tissue envelope. Its limited intra-operative data on gap measurements or ligamentous tensioning restrict the fine tuning of implant positioning.
  • Sub-optimal implant positioning may further lead to developing
    • Poor functional recovery
    • Reduced positive clinical outcomes
    • Increased instability
    • Reduced implant survivorship

Clearly there are more problems to this approach which has been reported by patients and observed by specialists over time. To overcome this they moved to a navigated TKA surgical approach.

Navigated TKA

Navigated TKR fares much better than the conventional approach as it follows a planned prototype approach to eliminate errors.

  • Computer software converts anatomical information from intra-operative osseous mapping into a patient-specific virtual 3D model.
  • This virtual model helps plan optimal bone resection, implant positioning, bone coverage and alignment based on the patient’s anatomy.
  • Further it also provides recommendations for bone resection and optimal component positioning based on the patient’s anatomical profile.

However, in comparison to both these approaches, the only concern which was still unaddressed was accuracy. This is where Robotic TKA takes the edge above rest.

Robotic TKA

Here a robotic device helps execute the pre-operative patient-specific plan with a high level of accuracy.

  • Optical motion capture technology helps assess intra-operative alignment, component positioning, range of movement, flexion-extension gaps, and soft tissue balancing.
  • Active control over the surgeon’s motor function helps improve the accuracy of achieving the planned bone resection and implant positioning.
  • Real-time intraoperative data is then used to fine-tune bone resection and guide implant positioning, in order to achieve the desired knee kinematics and limit the need for additional soft tissue releases.
  • Improved accuracy of achieving the planned femoral and tibial implant positioning, joint line restoration, limb alignment, and posterior tibial slope compared to conventional jig-based TKA.
  • Accuracy in implant positioning in all three planes with reduced outliers.

To ensure that the robotic TKA surgery finds maximum success potential for the patients, we at the CK Birla Hospital, also use CUVIS Joint system to ensure that every surgical outcome leads to a more natural recovery and better quality of life.

Why CUVIS Joint?

The advantages of the CUVIS Joint system are mainly attributed to its comprehensive preoperative plan, intraoperative monitoring, patient specific and appropriate intervention by surgeons. These joints contribute majorly to the success of a TKR due to:

  • More accurate implant placement, giving patients a sense of familiarity in natural movement post surgery
  • Reduced risk of injury to adjacent tissues
  • Improved safety and reduced risk of infection
  • Early rehabilitation with early discharge from Hospital.
  • Lower blood loss and smaller incisions
  • Quicker recovery and rehabilitation with less pain
  • Improved quality of life
  • The potential for better long-term function.
  • Better implant survivorship and longevity.

Outlook

Surgeries must not prevent us from leading a healthy regular life, they must ensure that we all get a chance to overcome pain and experience the unlimited joys that life has to offer. At the CK Birla Hospital we ensure our patients get the best surgical outcomes to lead a better life.

By implementing the latest innovations in surgical techniques we not only improve the chances for our patients, but also enable our award winning team of orthopaedic surgeons to keep delivering on the promise of world class healthcare services.

If you are thinking of getting a total knee replacement, now is the time to ensure that you get the best surgical results. For a consultation and more information about this approach, Book an appointment with Dr Ashwani Maichand today.

Types of Sleep Disorders Explained By Leading Pulmonologist
Jan 23, 2023|Dr Manish Kumar

Types of Sleep Disorders Explained By Leading Pulmonologist

Having sleepless nights can be a choice for some and a liability for many. To quote the famous words of author F. Scott Fitzgerald, “The worst thing in the world is to try to sleep and not to.” While the whole world regales in the romanticism of sleepless nights, it is a big deal for a person with sleep disorders. Sleep disorder is a broad umbrella term that includes many different medical conditions. It is often the starting point of most mental health issues which gradually surface over time. 

So if you can’t get any “shut-eye” despite multiple efforts or are not able to sleep despite everything being “normal”, read on…

What is a Sleep Disorder?

As mentioned earlier, sleep disorder refers to various medical conditions that affect sleep quality & duration, and directly affect the person’s ability to properly function during the day when they are awake. To date, there are 100+ sleep disorders broadly based on the cause, symptoms and physical and psychological effects. But most disorders can be classified under the following:

  • Trouble falling or staying asleep.
  • Difficulty in staying awake during the day.
  • Imbalances in circadian rhythm.
  • The tendency of retorting to unusual behaviours instead.

These are all signs of a disorder that are either physical or psychological and need medical intervention.

What Causes Sleep Disorders?

Those who get at least a good uninterrupted 8 hours of sleep are normal and do not fall under the category of sleep disorders. But those who might be suffering from sleep disorders get bogged down by:

  • Stress and anxiety
  • Allergies and respiratory problems.
  • Nocturia, or frequent urination
  • Erratic and hectic schedules
  • Underlying psychological problems
  • Physiological pain, and/or
  • Other causes like arthritis, chronic fatigue syndrome, fibromyalgia, inflammatory bowel disease, etc.

Once this condition starts, it does not seem to stop and eventually becomes a big roadblock in leading normal day-to-day life. Each of these triggers leaves a negative impact on our energy, mood, concentration, and overall health. The best way out is medical treatment and lifestyle changes.

Experts suggest that prompt diagnosis helps resolve the condition faster as prolonged sleep disorders become deep-rooted with further health complications. Since the conditions are linked to mental health issues they can directly affect

  • Performance at work
  • Personal relationships
  • Daily activities.

What are the different types of sleep disorders?

  1. Insomnia: It is the inability to fall asleep or stay asleep. Insomnia can be linked to jet lag, stress, hormonal imbalance, digestive problems, or some other underlying health concern. It disrupts your overall health and quality of life. It can also be the cause of depression, weight gain, irritability, and lack of concentration at work or school to name a few.
  2. Sleep Apnea: This is a sleep disorder characterised by erratic breathing patterns. The condition is very serious as the body ends up taking less oxygen and patients can suddenly sleep and suddenly wake up throughout the day and night.
  3. Parasomnias: This is another subset of sleep disorder that is caused due to abnormal movements and behaviours during sleep. The person who gets this unconsciously gets involved in these behaviours and has no recollection of it later.
  4. Restless Leg Syndrome: RLS is the overwhelming urge to keep moving your legs. This urge, often accompanied by a tingling sensation, can occur during the day, but mostly at night. This is an allied condition to more severe medical conditions like ADHD and Parkinson’s disease, however the exact trigger for this behaviour is not alway clear.
  5. Narcolepsy: This is an extremely tricky condition and as the name suggests, it comes in fits. The person tends to get “sleep attacks” while they are awake, which leads to suddenly feeling extremely tired and instantly falling asleep. Over time this leads to sleep paralysis where the person finds it impossible to move after they wake up. This might be your body’s way of indicating possible neurological disorders, like multiple sclerosis.

What are the Symptoms of Sleep Disorders?

Symptoms of each type of sleep disorder depend on the severity and type of disorder. It will also depend on the severity of any underlying condition. Generally, the notable symptoms are:

  • difficulty in falling or staying asleep at night.
  • immense daytime fatigue due to lack of REM sleep.
  • tendency to take naps in the day to compensate for lack of sleep.
  • unusual urges, movements and breathing patterns during sleep.
  • anxiety and lack of concentration.
  • depression and stress eating.

How are Sleep Disorders Diagnosed?

Your physician will assess your concerns and suggest one or more of the following tests as per the underlying symptoms.

  • Polysomnography (PSG): This is a sleep study which will evaluate your body’s oxygen levels, movements, and brain responsiveness to determine your sleep pattern. This is a proven test to diagnose sleep apnea.
  • Electroencephalogram (EEG): This test will assess the neuro-electrical activities in your brain to identify any potential problems.
  • Multiple sleep latency tests (MSLT): This is a daytime napping study, which is used alongside a PSG test at night to help diagnose narcolepsy.

The results from these tests are vital inputs in determining the proper course of treatment for the patient. Based on the findings lifestyle changes will be suggested to help revive the circadian rhythm of the body. Such as:

  • A vitamin and nutrient-rich balanced diet
  • Reducing sugar and increasing fish intake
  • Drinking less water before bed
  • Limiting intake of caffeine, tobacco and alcohol.
  • Proper exercise to reduce stress and increase the oxygen flow in the body.
  • Switching to low-carb dinner options
  • Timely sleep cycle

Apart from this, the doctor might prescribe medicines like sleeping pills, melatonin supplements, allergy & cold medication, dental guard (teeth grinding), breathing device(sleep apnea), and any other medication as the specialists deem fit. Please note: never opt for medication unless expressly advised by the doctors for any sleep disorder.

Conclusion

The impact of sleep disorders can be disruptive. There will be a point where you will seek immediate relief. But that will only be possible for short-term cases, as old persisting cases take time to heal. But whenever sleeplessness starts interfering in your everyday life it is imperative to seek medical intervention. In case you are facing a similar concern do not hesitate to walk in or call us at (number) to book an appointment with a sleep specialist. You might just be solving a much bigger problem by opting for prompt diagnosis at the CK Birla Hospital. Book an appointment with leading Pulmonologist Now.
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FAQ:

What Causes Sleep Disorders?

Sometimes the cause cannot be determined properly. However, most sleep disorders are caused by:

  • Stress and anxiety-related concerns due to our erratic lifestyle schedule.
  • Allergies and respiratory problems that prevent proper sleep.
  • Nocturia, or frequent urination, especially in cases of diabetes or UTIs.
  • Underlying psychological problems which have been so far suppressed.
  • Physiological pain, and/or
  • Other causes like arthritis, chronic fatigue syndrome, fibromyalgia, inflammatory bowel disease, etc.

What are the 3 Most Common Sleep Disorders?

The three most popularly found sleep disorders are:

  • Insomnia (currently about 50% of the world’s adult population is affected by it).
  • Sleep apnea (the most critical sleep disorder linked to life-threatening diseases like Parkinson’s disease).
  • Parasomnia (sleepwalking and sleeptalking are more common than you think).

Can Sleep Disorders Be Cured?

There can be different treatment approaches, but ultimately these conditions are curable with a little discipline.

  • Counselling: Cognitive behaviour therapy (CBT Doctor) helps you recognise the problem that leads to overthinking and sleeplessness.
  • Medications and/or supplements help rewire our circadian rhythm.
  • Proper exercise, and sleep hygiene such as minimal noise and light in a conducive temperature, etc.

What are Some Tips for Getting a Good Night’s Sleep?

Make your oasis to rest and recuperate.

  • A comfortable room at the optimum temperature and proper bed.
  • Dim the lights and use “white noise” to help induce a lull.
  • Think positive and leave out your problems for tomorrow.
  • Avoid screen time with television, work, or use computers in your bedroom.