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गर्भपात के बाद गर्भधारण: समय, स्वास्थ्य और सलाह
Jul 2, 2025|Dr. Anjali Kumar

गर्भपात के बाद गर्भधारण: समय, स्वास्थ्य और सलाह

गर्भपात या मिसकैरेज (miscarriage) किसी भी महिला के जीवन का एक ऐसा समय होता है, जब उसे अपनों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, क्योंकि इस दौरान यह अनुभव अत्यंत दुखद और दर्दनाक अनुभव के साथ उत्पन्न होती है। कई महिलाएं गर्भपात के बाद इस सवाल से जूझती हैं कि क्या वह फिर से गर्भधारण कर पाएंगी या नहीं। यदि हां, तो इसका सही समय क्या होगा। 

ऐसे में सही जानकारी और मार्गदर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि आपने भी गर्भपात का अनुभव किया है और पुनः गर्भधारण करने का विचार कर रही हैं, तो यह लेख आपके लिए है। इस ब्लॉग में हम आपको गर्भपात के बाद गर्भधारण के संबंध में सभी महत्वपूर्ण जानकारी, सावधानियां और डॉक्टरी सलाह के बारे में बताएंगे, जिससे आप मानसिक रूप से खुद को तैयार कर पाएंगे और हैप्पी फैमिली बना पाएंगे। गर्भपात के बाद फिर से गर्भधारण करने का विचार कर रहे हैं? हम आपके इस प्रश्न का उत्तर जानते हैं। हमारे अनुभवी डॉक्टर से मिलें और इलाज लें।

गर्भपात क्यों होता है?

गर्भपात (मिसकैरेज) (miscarriage – why does a miscarriage happen?), गर्भधारण के पहले 20 हफ्तों में होने वाला एक प्राकृतिक बच्चेदानी का नुकसान है। इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे कि – 

गर्भपात के बाद आपके शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है

गर्भपात के बाद शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।

  • ब्लीडिंग (bleeding): यदि गर्भपात पहले तिमाही में हुआ है, तो रक्तस्राव आमतौर पर एक सप्ताह के भीतर रुक जाता है। लेकिन यदि गर्भपात दूसरी तिमाही में हुआ है, तो रक्तस्राव अधिक समय तक जारी रह सकता है।
  • हार्मोनल बदलाव (hormonal change): रक्तस्राव के बाद, आपके हार्मोन सामान्य स्थिति में लौट आते हैं और पीरियड्स साइकिल (period cycle – period jaldi laane ke upay) फिर से शुरू हो जाते हैं। पहले कुछ महीनों में पीरियड्स साइकिल अनियमित (irregular periods) हो सकते हैं।
  • ओवुलेशन (ovulation): गर्भपात के बाद, ओवुलेशन दो हफ्तों में भी वापस आ सकते हैं और अधिकतर महिलाएं तीन महीने में सामान्य पीरियड्स साइकिल में लौट आती हैं।

गर्भपात के बाद ठीक होने में कितना समय लगता है?

मिसकैरेज के बाद शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह से ठीक होने में समय लगता है। शारीरिक रूप से, यदि गर्भपात के बाद कोई मेडिकल प्रक्रिया जैसे गर्भपात के बाद गर्भाशय की सफाई (D&C) की आवश्यकता नहीं पड़ती है, तो शरीर सामान्यतः कुछ हफ्तों में ही ठीक हो जाता है। औसतन, गर्भपात के बाद ठीक होने में कम से कम 1 से 3 महीने तक का समय लग सकता है, लेकिन यह समय हर महिला के लिए अलग हो सकता है।

आपके हार्मोनल स्तर को सामान्य होने में भी कुछ समय लगता है, और इसके बाद आपके पीरियड्स साइकिल को फिर से नियमित होने में कुछ समय और लग सकता है।

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गर्भपात के बाद खुद का ख्याल कैसे रखें?

गर्भपात के बाद सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आप खुद का ख्याल कैसे रख सकते हैं? इसके लिए कुछ महत्वपूर्ण उपाय इस प्रकार है –

  • आराम और विश्राम: शारीरिक और मानसिक रूप से पूरी तरह से ठीक होने के लिए पर्याप्त आराम करें।
  • स्वस्थ आहार (healthy diet): अच्छा और संतुलित आहार (balanced diet in hindi) लें, जिसमें फल, सब्जियां, प्रोटीन और आयरन युक्त आहार शामिल हो।
  • मनोबल बनाए रखें: यह किसी भी महिला के लिए एक भावनात्मक समय हो सकता है, इसलिए अपने परिवार और दोस्तों से सहायता प्राप्त करें।
  • वजन और शारीरिक स्वास्थ्य: यदि आपको वजन घटाने या शारीरिक स्वास्थ्य की कोई समस्या है, तो डॉक्टर से परामर्श लें और उनसे पूछें कि आप इसे कैसे मैनेज कर सकते हैं।
  • डॉक्टर से नियमित परामर्श: डॉक्टर से समय-समय पर संपर्क में रहें और अपनी सेहत की स्थिति की खास तौर पर निगरानी करें।

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गर्भपात के कितने दिन बाद संबंध बनाना चाहिए?

गर्भपात के बाद संबंध बनाने का समय महिलाओं की स्थिति और उनके स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। यदि गर्भपात के बाद आपको कोई शरीर में जटिलता नहीं होती है, तो डॉक्टर सामान्यतः 2 से 4 सप्ताह के बाद यौन संबंध बनाने की अनुमति दे सकते हैं। इसके साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य भी बहुत महत्वपूर्ण होता है। यदि आपके परिवार में किसी को भी इस स्थिति से गुजरना पड़ा है, तो उनका साथ ज़रूर दें। यह समय इसलिए भी जरूरी है ताकि संक्रमण से बचा जा सके और शरीर को ठीक से आराम मिल सके। यहां डॉक्टरी सलाह बहुत ज़रूरी है। 

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गर्भपात के कितने दिन बाद गर्भधारण की संभावना होती है?

गर्भपात के बाद गर्भधारण की संभावना तुरंत हो सकती है, क्योंकि ओव्यूलेशन (ovulation) गर्भपात के कुछ ही दिनों के बाद हो सकता है। यदि आपका चक्र नियमित है और कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या नहीं है, तो आप आसानी से गर्भधारण कर सकती हैं।
हालांकि, डॉक्टर सामान्य: गर्भपात के बाद कम से कम 1 से 3 महीने का समय देने की सलाह देते हैं, ताकि शरीर को ठीक से तैयार किया जा सके और हार्मोनल असंतुलन को ठीक किया जा सके।

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गर्भपात के बाद गर्भधारण के समय बरती जाने वाली सावधानियां

जब गर्भपात के बाद प्रेगनेंसी टेस्ट पॉजिटिव आ जाए, तो आपको कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए जैसे कि – 

  • मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान दें (mental health): मानसिक रूप से पूरी तरह से तैयार होना जरूरी है। यदि आप मानसिक रूप से दुरुस्त रहेंगे, तो आपका बच्चा भी स्वस्थ रहेगा।
  • स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं (healthy lifestyle): ताजे फल, सब्जियां, पर्याप्त पानी और नियमित हल्का व्यायाम करें। इससे आप खुद को और अपने बच्चे को भी स्वस्थ रखते हैं। 
  • डॉक्टर से परामर्श: गर्भधारण से पहले डॉक्टर से पूरी जांच करवाएं और समझें कि पिछले असफल गर्भधारण में कहां समस्या आई थी। 
  • जन्म नियंत्रण उपायों का उपयोग करें: यदि आप तुरंत गर्भधारण नहीं करना चाहतीं, तो गर्भनिरोधक उपायों (contraceptions) का पालन करें। प्रयास करें कि इस दौरान आप हार्मोनल दवाओं से बचें और डॉक्टर से बात करते रहें।

गर्भपात से बचने के उपाय

गर्भधारण करने के बाद मिसकैरेज से बचना बहुत जरूरी होता है। इस दौरान कुछ बातों का पालन कड़ाई से करना पड़ता है जैसे कि – 

  • स्वस्थ जीवनशैली: एक स्वस्थ आहार और नियमित व्यायाम से आपका शरीर मजबूत रहेगा और मिसकैरेज की संभावना कम से कम होगी। 
  • स्मोकिंग और शराब से बचें: इनका गर्भधारण पर नकारात्मक असर पड़ता है। जो महिलाएं धूम्रपान और शराब का सेवन करती हैं, उनके बच्चों का स्वास्थ्य गंभीर रूप से प्रभावित होता है। 
  • गर्भपात से पहले चिकित्सकीय जांच करवाएं: किसी भी स्वास्थ्य समस्या को समय रहते पहचान कर उसका इलाज करवाएं।

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गर्भपात के बाद ओवुलेशन के संकेत

जब आप गर्भपात के बाद गर्भधारण के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार हो जाएं, तो अपने शरीर के हार्मोनल परिवर्तन और ओवुलेशन के दिन को समझना महत्वपूर्ण है। इससे आपको और आपके साथी को गर्भवती होने की सबसे अच्छी संभावना वाले समय में संबंध बनाने में मदद मिलती है।

गर्भपात के बाद ओवुलेशन का पता लगाने के लिए कुछ संकेत निम्नलिखित हैं – 

  • ल्यूटिनाइजिंग हार्मोन (LH) में वृद्धि: LH का स्तर ओवुलेशन से 10-12 घंटे पहले चरम पर पहुंचता है। यह सबसे उर्वर्य दिन होता है, जब LH का स्तर उच्चतम होता है।
  • बेसल बॉडी तापमान (BBT) में परिवर्तन: ओवुलेशन से पहले शरीर का तापमान थोड़ा गिरता है और फिर ओवुलेशन के बाद बढ़ता है। इसे नियमित रूप से ट्रैक कर के ओवुलेशन की पहचान की जा सकती है।
  • दर्द या ऐंठन (cramps): ओवुलेशन के दौरान कुछ महिलाओं को निचले पेट में हल्का दर्द या ऐंठन महसूस हो सकती है।
  • अन्य लक्षण: गर्भाशय ग्रीवा के बलगम में परिवर्तन, सेक्स ड्राइव में वृद्धि और हल्की स्पॉटिंग भी ओवुलेशन के सामान्य लक्षण हैं।

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निष्कर्ष

इस ब्लॉग की मदद से हम यह समझ चुके हैं कि गर्भपात के कितने दिन बाद प्रेगनेंसी होती है? गर्भपात के बाद गर्भधारण करना संभव है, लेकिन इसके लिए मानसिक, शारीरिक और चिकित्सा तैयारी की आवश्यकता होती है। यदि आप गर्भधारण करने का विचार कर रही हैं, तो खुद का ख्याल रखना और डॉक्टर से परामर्श करना बेहद महत्वपूर्ण है। सही जानकारी और मार्गदर्शन से आप एक स्वस्थ गर्भावस्था की दिशा में कदम बढ़ा सकती हैं। आज ही अपने डॉक्टर से संपर्क करें और गर्भधारण की प्रक्रिया को सुरक्षित और स्वस्थ बनाने के लिए विशेषज्ञ की सलाह प्राप्त करें।

इसके अतिरिक्त आपके मन में प्रेगनेंसी या फिर मिसकैरेज के संबंध में कोई सवाल या फिर चिंता है, तो आप हमारे अनुभवी एवं सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर से मिलें (Best Obstetrician & Gynaecologist) और इलाज लें। 

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न

गर्भपात के बाद मानसिक स्वास्थ्य का ख्याल कैसे रखें?

गर्भपात के बाद मानसिक स्वास्थ्य के लिए आराम करें, खुद को समय दें, परिवार और दोस्तों से समर्थन प्राप्त करें, और जरूरत महसूस होने पर पेशेवर काउंसलिंग लें।

क्या गर्भपात के बाद गर्भधारण करने में कोई जोखिम है?

यदि आपने पहले गर्भपात किया है, तो सामान्यतः जोखिम अधिक नहीं होता है। लेकिन कई मिसकैरेज के बाद डॉक्टर से जांच करवाना महत्वपूर्ण है, ताकि स्वास्थ्य की स्थिति सही हो।

गर्भपात के बाद शरीर को फिर से सामान्य बनाने के लिए क्या उपाय करें?

स्वस्थ आहार, पर्याप्त आराम, पानी की अधिक मात्रा, हल्का व्यायाम और मानसिक शांति को प्राथमिकता देकर शरीर को फिर से स्वस्थ किया जा सकता है। इन उपायों के बाद ही आप फिर से गर्भधारण करने के लिए तैयार हो सकते हैं।

क्या गर्भपात के बाद सभी महिलाएं जल्दी गर्भवती हो सकती हैं?

हर महिला का शरीर अलग होता है, इसलिए गर्भपात के बाद गर्भधारण का समय भी अलग-अलग होता है। किसी को जल्दी हो सकती है, जबकि कुछ महिलाओं को अधिक समय लग सकता है।

गर्भपात के बाद स्वस्थ गर्भधारण के लिए कौन सी जांच करवानी चाहिए?

यदि दो या दो से अधिक मिसकैरेज हुए हैं, तो डॉक्टर से क्रोमोसोम टेस्ट (Chromosomal tests), हार्मोन टेस्ट (hormone levels) और गर्भाशय से संबंधित टेस्ट {uterus-related tests (like ultrasound)} करवाना चाहिए, ताकि सही कारण का पता चल सके।

Challenges of Young Women with Breast Cancer (Breast Cancer in women under 40)

Challenges of Young Women with Breast Cancer (Breast Cancer in women under 40)

Key Takeaways:

  • Breast cancer is the most commonly diagnosed cancer in women.
  • The global trend shows that there is an increase in cases related to younger women getting affected by breast cancer.
  • Lifestyle factors, delayed motherhood, genetic & family history are the known causes leading to an increase in breast cancer in young women.
  • Younger women often get diagnosed with more aggressive forms of breast cancer. 

Introduction

Breast cancer is the most common cancer affecting women worldwide. Breast cancer is the most common cancer in India, accounting for 28.2% of all female cancers (according to a publication in the Times of India). Additionally, the risk of breast cancer is rising in India; 1 in 28 women is likely to develop breast cancer during their lifetime. Breast cancer also affects men; according to the WHO, approximately 0.5 – 1% of breast cancers occur in men.

The condition results when breast cells mutate, become cancerous, and multiply to form a tumour. Breast cancer usually affects women aged over 50; however, it can affect women younger than 50. Breast cancers are of different types and are characterized basis where they start, i.e. invasive ductal carcinoma (starts in the milk ducts), lobular breast cancer (starts in the milk producing glands), ductal carcinoma (starts in the milk ducts), inflammatory breast cancer, triple negative breast cancer, and Paget’s disease of the breast. 

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Statistics and Rising Incidence Rates

Breast cancer has long been thought to affect older women, but recent statistics tell a different story. The rate of breast cancer in women under 50 has been climbing at a quicker pace – around 1.4 per cent each year from 2012 to 2022 – compared to a 1 per cent annual increase in women over 50.

Did you know? Studies suggest that breast cancer in young women is more likely to be the aggressive type. 

According to breast surgeons at the CK Birla Hospital, the increasing number of breast cancer cases can be associated with several factors, including an inactive lifestyle, obesity (effect of obesity on health), alcohol consumption, a family history of cancer, radiation exposure, tobacco use, and postmenopausal hormone therapy. This early onset of breast cancer has been increasing for some years now. A study conducted by AIIMS Delhi revealed that 30% of breast cancer cases detected in women were under 40. Some of the top contributors to this rising number include:

  • Lifestyle Changes: Several lifestyle factors, including a sedentary lifestyle, poor diet, high body fat, and alcohol consumption, are all known factors that increase the risk of breast cancer. 
  • Delayed Motherhood: Delayed pregnancy or no pregnancy also increases the risk of breast cancer in younger women. Women who have their first child after 30 or who do not have children at all have a higher risk. Additionally, the absence of breastfeeding raises the risk. 
  • Genetic & Family History: Genetic mutations, including BRCA1/BRCA2 mutations, significantly increase breast cancer risk at a young age. Also, a family history of ovarian cancer increases the risk by 2-3 times. 

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Challenges Faced by Young Women with Breast Cancer

The primary challenge faced by young women diagnosed with breast cancer is linked to the type of breast cancer, i.e., the aggressive nature of breast cancer that can be challenging to treat.

The types of breast cancer that often affect young women are HER2-positive, triple-negative breast cancer, and invasive ductal carcinoma. The treatment of these aggressive forms of breast cancer may require a greater level of chemotherapy (how chemotherapy works against cancer) and targeted therapy. Some of the major challenges faced by young women with breast cancer include:

  • Fertility & Family Planning Challenge: Getting diagnosed with breast cancer at a young age may increase the risk of infertility due to treatment, which involves chemotherapy and targeted therapy, which may damage reproductive ability. 
  • Emotional or Psychological Challenge: Breast cancer in young women can be mentally devastating, given the impact of treatments, i.e. hair loss (hair loss treatment), mastectomy, and other bodily changes, which can take an emotional toll. 
  • Breast Reconstruction Challenge: Breast cancer at a young age can also be a major challenge, emotionally, medically, and financially. Emotional readiness also plays a big role – not every woman feels comfortable with implants or another surgery right after cancer. Also, most patients aren’t informed about reconstruction choices.

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Lifestyle and Self-Care Tips During Treatment

The treatment plan is designed based on the conversation between you and your healthcare provider. The treatment plan is designed based on the type of breast cancer, its stage, and the desire to build a family. There are several factors to consider during treatment, including:

  • Check About Breast Conservation Surgery: Not all breast cancer treatment require a full mastectomy. Ask your doctor about breast conservation surgery, which helps preserve the surrounding breast tissues and the natural shape of the breast
  • Discuss the Condition with a Fertility Expert: Some cancer treatments can affect fertility; therefore, talk to a fertility specialist before starting chemotherapy or radiation. Also, explore and check your eligibility for egg/embryo freezing or other preservation methods.
  • Focus of Nutrition: Eat a well-balanced diet to manage nausea and weakness, and the impact of treatment on the body. Consider consulting a clinical dietitian for a personalised plan during treatment. 
  • Support Your Mental Health: Use meditation, journaling, or talk therapy to manage emotional ups and downs. Join a support group or speak to a psycho-oncologist if needed.

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For any concerns related to breast cancer, you can consult our experienced Breast Cancer Specialists.

FAQs

Why is breast cancer affecting young women?

The increasing cases of breast cancer in younger women are associated with a sedentary lifestyle, obesity, increased alcohol consumption, hormonal factors, lack of awareness, and more. 

At what age is breast cancer most commonly diagnosed?

Breast cancer most commonly affects women aged over 50; however, the cases of breast cancer are increasing in younger women. 

महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन के कारण, प्रभाव और इलाज
Jul 2, 2025|Dr. Anjali Kumar

महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन के कारण, प्रभाव और इलाज

महिलाओं के शरीर में कई प्रकार के हार्मोन होते हैं, जो उनके शरीर के विभिन्न कार्यों को नियंत्रित करते हैं। ये हॉर्मोन पीरियड्स, प्रजनन, नींद, भूख, और त्वचा के स्वास्थ्य तक को प्रभावित करते हैं। जब इन हॉर्मोनों का संतुलन बिगड़ता है, तो इसे हॉर्मोनल असंतुलन कहा जाता है। यह समस्या बहुत आम है, लेकिन समय पर पहचान और इलाज से इसे ठीक किया जा सकता है।

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महिलाओं में हार्मोनल असंतुलन के कारण

हॉर्मोनल असंतुलन के पीछे कई कारण हो सकते हैं। ये कारण शारीरिक, मानसिक या जीवनशैली से जुड़े हो सकते हैं:

  1. तनाव (मानसिक तनाव को कैसे कम करें?): अधिक तनाव से शरीर में कॉर्टिसोल (cortisol) नामक हॉर्मोन बढ़ता है, जो अन्य हॉर्मोनों को प्रभावित करता है।
  2. अनियमित दिनचर्या: देर रात तक जागना, नींद की कमी और भोजन का सही समय पर न होना हॉर्मोनल गड़बड़ी की वजह बन सकता है।
  3. थायराइड की समस्या(symptoms, causes & home remedies for thyroid in hindi): हाइपोथायरॉइडिज़्म (hypothyroidism) या हाइपरथायरॉइडिज़्म (hyperthyroidism) दोनों ही हॉर्मोनल असंतुलन का कारण हो सकते हैं।
  4. पीसीओडी/पीसीओएस (PCOD/PCOS treatment in hindi): यह एक आम समस्या है, जिसमें महिलाओं के अंडाशय में छोटे-छोटे सिस्ट बन जाते हैं और हॉर्मोन असंतुलित हो जाते हैं।
  5. बर्थ कंट्रोल पिल्स या अन्य दवाइयाँ (birth control pills): कुछ दवाइयों के लंबे समय तक सेवन से हॉर्मोन प्रभावित हो सकते हैं।
  6. मेनोपॉज (menopause): यह उम्र का एक ऐसा दौर होता है जब महिला के शरीर में एस्ट्रोजन (estrogen – How to increase estrogen hormone in hindi) और प्रोजेस्ट्रोन (progestrone) जैसे हॉर्मोन कम हो जाते हैं।

हार्मोनल असंतुलन के प्रभाव

जब हार्मोन संतुलन में नहीं रहते, तो इसका असर शरीर और मन दोनों पर पड़ता है:

हार्मोनल असंतुलन का इलाज

हार्मोनल असंतुलन का इलाज उसकी वजह पर निर्भर करता है। यहां कुछ सामान्य उपचार बताए गए हैं:

  1. ब्लड टेस्ट से डायग्नोसिस: सबसे पहले डॉक्टर ब्लड टेस्ट के जरिए यह पता लगाते हैं कि कौन से हॉर्मोन असंतुलित हैं।
  2. दवाइयों द्वारा इलाज: थायराइड की दवाइयाँ, हार्मोन रिप्लेसमेंट थैरेपी (HRT) या बर्थ कंट्रोल पिल्स जैसी दवाइयाँ दी जा सकती हैं।
  3. लाइफस्टाइल में बदलाव: योग, ध्यान और समय पर सोना बहुत असरदार हो सकता है।
  4. पीसीओडी का इलाज (pcod ke karan lakshan aur upchar): वजन नियंत्रित करना, डाइट सुधारना और नियमित व्यायाम से पीसीओडी को कंट्रोल किया जा सकता है।
  5. डायट पर ध्यान देना (balanced diet in hindi): ऐसे भोजन लें जो हॉर्मोन को संतुलित करने में मदद करें जैसे कि हरी सब्जियां, फल, साबुत अनाज और ओमेगा-3 फैटी एसिड (omega-3 fatty acid) वाले फूड्स।

हार्मोनल असंतुलन को रोकने के उपाय

1. संतुलित आहार लें

आपका खानपान सीधे आपके हार्मोनल स्वास्थ्य को प्रभावित करता है।

कैसे?

  • प्रोसेस्ड फूड्स (जैसे पैकेट वाले चिप्स, कुकीज, और फास्ट फूड) में ट्रांस फैट, अतिरिक्त नमक और चीनी होती है, जो हार्मोनल बैलेंस को बिगाड़ सकते हैं।
  • ज्यादा मीठी चीज़ें खाने से इंसुलिन हार्मोन (insulin hormone) प्रभावित होता है, जिससे वजन बढ़ता है और PCOD (pcod treatment) जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

क्या खाएं?

  • हरी सब्ज़ियां (पालक, मेथी, ब्रोकली)
  • मौसमी फल (जैसे सेब, केला, पपीता)
  • साबुत अनाज (जैसे दालिया, ओट्स, ब्राउन राइस)
  • प्रोटीन युक्त चीजें (जैसे दाल, चना, अंडा, पनीर, दही)
  • नट्स और सीड्स (जैसे बादाम, अखरोट, अलसी)

2. नियमित व्यायाम करें

शारीरिक गतिविधि आपके शरीर को एक्टिव रखती है और हॉर्मोन्स को संतुलित करने में मदद करती है।

कैसे?

  • व्यायाम करने से शरीर में एंडोर्फिन (endorphin) नामक “फील गुड” हॉर्मोन (feel good hormone) बनता है, जो तनाव (stress) को कम करता है।
  • यह इंसुलिन (insulin) और थायराइड (thyroid) जैसे हॉर्मोन्स को भी नियंत्रित करता है।
  • पीसीओडी (pcod) जैसी स्थितियों में व्यायाम से वजन घटता है और ओवुलेशन (ovulation) में सुधार होता है।

क्या करें?

  • रोजाना 30 मिनट की सैर
  • योगासन (जैसे ताड़ासन, भुजंगासन, प्राणायाम)
  • हल्का जिम वर्कआउट या घर पर कार्डियो
  • डांस या साइकलिंग जैसे मज़ेदार विकल्प भी अच्छे हैं

3. तनाव से बचें

मानसिक तनाव का असर सबसे पहले आपके हॉर्मोन्स पर पड़ता है।

कैसे?

  • तनाव में शरीर कॉर्टिसोल नामक हार्मोन ज्यादा बनाने लगता है, जो बाकी हॉर्मोन्स को असंतुलित करता है।
  • लंबे समय तक तनाव रहने से पीरियड्स अनियमित (irregular periods in hindi) हो सकते हैं और गर्भधारण में दिक्कत आ सकती है।

क्या करें?

  • मेडिटेशन: रोज सुबह या रात को 10 मिनट ध्यान लगाएं।
  • डीप ब्रीदिंग: 5-5 बार गहरी सांस लें और धीरे छोड़ें – यह दिमाग को शांत करता है।
  • पसंदीदा शौक अपनाएं: म्यूजिक सुनें, किताब पढ़ें, या पेंटिंग करें – जो आपके मन को शांति दे।

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4. नींद पूरी करें

नींद की कमी भी हार्मोनल असंतुलन का बड़ा कारण है।

कैसे?

  • नींद के दौरान शरीर मेलाटोनिन और ग्रोथ हार्मोन (growth hormone) बनाता है, जो हॉर्मोनल संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।
  • नींद कम होने से इंसुलिन, थायराइड और प्रोजेस्ट्रोन जैसे हॉर्मोन्स गड़बड़ा सकते हैं।

क्या करें?

  • रोजाना एक ही समय पर सोने और उठने की आदत डालें।
  • सोने से पहले मोबाइल या टीवी से दूरी बनाएं।
  • हल्का खाना खाएं और दिमाग को शांत रखें।

5. कैफीन और अल्कोहल का सेवन कम करें

चाय, कॉफी और शराब का अत्यधिक सेवन भी आपके हार्मोन को प्रभावित कर सकता है।

कैसे?

  • ज्यादा कैफीन (जैसे कॉफी, एनर्जी ड्रिंक्स) कोर्टिसोल लेवल को बढ़ाता है, जिससे तनाव बढ़ता है और नींद प्रभावित होती है।
  • शराब लीवर पर असर डालती है, जिससे एस्ट्रोजन हॉर्मोन की प्रक्रिया में बाधा आती है।

क्या करें?

  • दिन में 1-2 कप से ज्यादा चाय-कॉफी न लें।
  • कैफीन वाले सॉफ्ट ड्रिंक्स से बचें।
  • अल्कोहल की आदत हो तो धीरे-धीरे इसे कम करें और पूरी तरह छोड़ने की कोशिश करें।

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FAQs

क्या हार्मोनल असंतुलन केवल उम्र बढ़ने के कारण होता है?

नहीं, हॉर्मोनल असंतुलन किसी भी उम्र में हो सकता है। यह जीवनशैली, तनाव, पीसीओडी, थायराइड और दवाइयों के कारण भी हो सकता है। मेनोपॉज के समय हॉर्मोन में बदलाव आम होता है, लेकिन यह एकमात्र कारण नहीं है।

हॉर्मोनल असंतुलन के कारण मासिक धर्म अनियमित हो जाता है, तो क्या यह गर्भधारण में समस्या पैदा कर सकता है?

हां, यदि मासिक धर्म अनियमित हो रहा है, तो इसका मतलब यह हो सकता है कि ओवुलेशन नियमित नहीं हो रहा। इससे गर्भधारण में दिक्कत आ सकती है। ऐसे में उचित जांच और इलाज जरूरी है।

निष्कर्ष

हार्मोनल असंतुलन एक आम लेकिन गंभीर समस्या है, जिसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि समय रहते इसका पता लगाया जाए और सही इलाज व जीवनशैली अपनाई जाए, तो यह पूरी तरह से नियंत्रित किया जा सकता है। शरीर के छोटे-छोटे संकेतों को समझना और उनकी अनदेखी न करना ही सबसे बड़ा समाधान है। अगर आप भी ऊपर बताए गए लक्षणों से जूझ रही हैं, तो जल्द से जल्द किसी स्त्री रोग विशेषज्ञ से संपर्क करें। 

संतुलित आहार (7-दिन का संतुलित आहार चार्ट) (Balanced Diet in Hindi)
Jul 2, 2025|Ms. Deepali Sharma

संतुलित आहार (7-दिन का संतुलित आहार चार्ट) (Balanced Diet in Hindi)

आजकल भागदौड़ भरी ज़िंदगी में हममें से ज़्यादातर लोग या तो खाने के लिए समय नहीं निकाल पाते या फिर जो कुछ भी जल्दी मिल जाए, वही खा लेते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारा शरीर हर दिन जो मेहनत करता है, उसके लिए सही पोषण कितना ज़रूरी है?

सही खान-पान सिर्फ भूख मिटाने के लिए नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और संतुलित जीवन जीने की नींव होता है। संतुलित आहार यानी ऐसा भोजन जिसमें आपके शरीर को रोज़ जिन पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है – जैसे प्रोटीन (protein), कार्बोहाइड्रेट (carbohydrate), वसा (fat), विटामिन (vitamin), मिनरल्स (minerals), फाइबर (fibre) और पानी (water)– वे सभी सही मात्रा में मौजूद हों।

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संतुलित आहार क्यों ज़रूरी है? 

अगर शरीर को वो पोषण न मिले जिसकी उसे ज़रूरत है, तो धीरे-धीरे उसकी क्षमता घटने लगती है – न सिर्फ शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी। अगर आप हमेशा थका हुआ महसूस करते हैं, मूड स्विंग्स (mood swings) रहते हैं या अक्सर बीमार पड़ते हैं, तो हो सकता है इसका कारण आपकी थाली में छिपा हो।

एक संतुलित आहार हमारे शरीर को न सिर्फ ऊर्जा देता है, बल्कि बीमारियों से बचाता है, वजन को नियंत्रित रखता है (weight management), त्वचा और बालों को हेल्दी बनाता है (home remedies for hairfall in hindi) और दिमागी संतुलन को भी बेहतर करता है।

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बच्चों के लिए संतुलित आहार की अहमियत (importance of balanced

बच्चों का शरीर हर दिन बढ़ रहा होता है – उनका मस्तिष्क, हड्डियाँ, मांसपेशियाँ और इम्यून सिस्टम (immune system)(immune boosting foods in hindi) सभी विकास की प्रक्रिया में होते हैं। अगर शुरुआत से उन्हें सही पोषण न मिले तो उनका शारीरिक और मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है।

ओमेगा-3 फैटी एसिड (omega-3 fatty acid), विटामिन (vitamin), मिनरल्स (minerals), प्रोटीन (protein) और कैल्शियम (calcium)– ये सब पोषक तत्व बच्चों के विकास में मदद करते हैं। सही आहार उन्हें एक्टिव, सतर्क और स्वस्थ रखता है। एक अच्छे आहार की आदत अगर बचपन से पड़ जाए तो आगे चलकर बड़ी बीमारियों से भी बचा जा सकता है।

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संतुलित आहार में क्या-क्या शामिल होना चाहिए? (what is included in balanced diet in hindi)

जब बात अच्छी सेहत की होती है, तो केवल खाना खा लेना ही काफी नहीं होता—जरूरी है सही चीज़ें और सही मात्रा में खाना। संतुलित आहार का मतलब है ऐसा भोजन जिसमें सभी जरूरी पोषक तत्व सही अनुपात में मौजूद हों। चाहे बच्चे हों या बुजुर्ग, पुरुष हों या महिलाएं—हर किसी के लिए संतुलित आहार एक मजबूत आधारशिला की तरह है जो शरीर को स्वस्थ, ऊर्जा से भरपूर और बीमारियों से दूर रखता है। लेकिन अक्सर सवाल उठता है—आख़िर संतुलित आहार में क्या-क्या शामिल होना चाहिए? आइए जानते हैं।

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कार्बोहाइड्रेट्स

ये शरीर को ऊर्जा देने का मुख्य स्रोत हैं। लंबे समय तक शरीर को काम करने की ताकत देने के लिए जरूरी हैं।

स्रोत: रोटी, चावल, ओट्स, दलिया, ब्राउन ब्रेड

प्रोटीन (protein rich diet list in hindi)

शरीर की मरम्मत और नई कोशिकाओं के निर्माण में मदद करता है।

स्रोत: दालें, दूध, अंडा, पनीर, मांस, सोया, मूंगफली

वसा (तेजी से वजन कम करने के घरेलू उपाय और उपचार)

ज़रूरी मात्रा में ली गई वसा शरीर की कोशिकाओं को सुरक्षा देती है और कुछ विटामिन्स को अवशोषित करने में मदद करती है।

स्रोत: घी, तेल, नट्स, बीज

विटामिन और मिनरल्स (विटामिन बी12 की कमी के कारण, लक्षण और उपचार)

ये शरीर के हर छोटे-बड़े फंक्शन जैसे इम्युनिटी, हड्डियों की मजबूती, स्किन हेल्थ और हार्मोन बैलेंस में अहम भूमिका निभाते हैं।

स्रोत: फल, सब्जियाँ, दूध, अंकुरित अनाज

फाइबर

फाइबर पाचन को दुरुस्त रखता है और कब्ज से बचाता है।

स्रोत: साबुत अनाज, फल, सब्जियाँ

पानी

बिना पानी के जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। ये शरीर को हाइड्रेटेड रखने के साथ-साथ विषैले तत्वों को बाहर निकालने में भी मदद करता है।

जरूरी मात्रा: रोजाना 8–10 गिलास पानी

संतुलित आहार अपनाना किसी बड़े बदलाव की मांग नहीं करता, बस रोज़मर्रा की प्लेट में थोड़ा ध्यान और समझदारी जोड़नी होती है। रोटी, दाल, सब्ज़ी, फल, दही, पानी—ये सभी मिलकर हमारी सेहत का ख्याल रखते हैं। अगर आप हर दिन अपने भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स (carbohydrate), प्रोटीन (protein), वसा (fat), विटामिन्स (vitamins), मिनरल्स (minerals), फाइबर (fibre) और पानी को शामिल करते हैं, तो यकीन मानिए, बीमारियां आपसे दूर रहेंगी और शरीर हर मोर्चे पर आपका साथ देगा। याद रखिए, अच्छी सेहत कोई विकल्प नहीं—ये एक ज़रूरत है।

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किन चीज़ों से दूरी बनाना बेहतर है?

  • अत्यधिक तला-भुना खाना
  • ज्यादा चीनी और मीठे पदार्थ
  • प्रोसेस्ड और पैकेज्ड फूड्स जैसे चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स
  • ज्यादा नमक वाला खाना
  • शराब और तंबाकू – इन्हें पूरी तरह से टालना ही बेहतर

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अब जानिए – 7-दिन का आसान संतुलित आहार चार्ट

हर दिन कुछ नया खाने की प्लानिंग करना मुश्किल हो सकता है। इसी वजह से नीचे एक ऐसा साप्ताहिक प्लान दिया गया है जो पोषक, स्वादिष्ट और आसानी से घर पर बन सकने वाला है:

दिन नाश्ता दोपहर का खाना रात का खाना
सोमवार उपमा + फल + दूध दाल, रोटी, सब्जी, सलाद खिचड़ी + दही
मंगलवार पोहा + नट्स + नींबू पानी राजमा-चावल + सलाद रोटी + लौकी की सब्जी + छाछ
बुधवार दलिया + केला + दूध पनीर की सब्जी + रोटी + ककड़ी मूंग दाल चीला + हरी चटनी
गुरुवार अंडा-सैंडविच + नारियल पानी चना दाल + भिंडी + रोटी खिचड़ी + दही
शुक्रवार इडली-सांभर + फल मिक्स वेज पुलाव + रायता रोटी + आलू-टमाटर की सब्जी
शनिवार पराठा + दही मछली/सोया चंक्स + ब्राउन राइस दलिया + सलाद
रविवार आलू पराठा + बटर + लस्सी चिकन/पनीर करी + रोटी + हरी सब्जी वेज सूप + टोस्ट

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अंत में…

संतुलित आहार कोई डाइट प्लान नहीं, बल्कि जीवनशैली है। यह एक ऐसी आदत है, जो आपकी ज़िंदगी को कई मायनों में बदल सकती है। शुरुआत छोटे कदमों से करें – अपनी थाली में रंग-बिरंगी सब्जियाँ रखें, ताजे फल खाएँ, पर्याप्त पानी पिएँ और बाहर के खाने से परहेज़ करें। याद रखें, आपकी सेहत आपकी प्लेट से शुरू होती है। तो क्यों न आज से ही बेहतर जीवन की तरफ पहला कदम उठाया जाए?

शुक्राणु बढ़ाने के उपाय (shukranu badhane ke upay)
Jun 27, 2025|Dr. Rishi Raj Vohra

शुक्राणु बढ़ाने के उपाय (shukranu badhane ke upay)

वर्तमान में हमारी जीवनशैली ऐसी हो गई है कि लोगों को अब अपने प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर भी चिंताएं उत्पन्न होने लगी हैं। यदि कोई भी शुक्राणु की कमी की समस्या का सामना करता है, तो यह उनके संतान सुख को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। शुक्राणु की संख्या में कमी या उनका स्वास्थ्य ठीक न होने की स्थिति में गर्भधारण में कठिनाई हो सकती है। शुक्राणु बढ़ाने के उपायों से न केवल आपके प्रजनन स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है, बल्कि यह आपको एक स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के अवसर भी प्रदान करता है।

शुक्राणु की संख्या बढ़ाने के लिए कुछ प्राकृतिक और प्रभावी उपाय हैं, जिनके द्वारा आप अपनी प्रजनन क्षमता को बेहतर बना सकते हैं। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि कैसे आप अपनी जीवन शैली, आहार और कुछ अन्य उपायों के द्वारा शुक्राणु की संख्या बढ़ा सकते हैं, ताकि आप और आपके साथी का सपना सच हो सके।

शुक्राणु बढ़ाने का महत्व (increase sperm count in hindi) 

शुक्राणु की संख्या और गुणवत्ता, दोनों ही प्रजनन क्षमता के महत्वपूर्ण पहलू हैं। शुक्राणु की संख्या कितनी होनी चाहिए? (sperm count kitna hona chahiye) यह प्रश्न कई लोगों के मन में आता होता है। इस संदर्भ में, एक सामान्य स्तर पर, 39 मिलियन शुक्राणु प्रति इजैकुलेट ( 39 million per ejaculate) माना जाता है, जो एक स्वस्थ शुक्राणु संख्या (c) का संकेत है। यदि शुक्राणु की संख्या इससे कम हो, तो महिलाओं को प्रेगनेंसी में समस्या आ सकती है। 

यदि आपको शुक्राणु कम होने के लक्षण जैसे कि इरेक्टाइल डिसफंक्शन (erectile dysfunction) (erectile dysfunction & it’s treatment in hindi), कम सेक्स ड्राइव (low sex drive), या यौन सक्रियता में कमी दिखने को मिले, तो यह आपकी शुक्राणु संख्या की समस्या का संकेत हो सकता है। लेकिन यहां आपको चिंता नहीं करनी है, क्योंकि सही आहार, जीवनशैली में सुधार, और कुछ प्राकृतिक उपायों से शुक्राणु की संख्या को बढ़ाया जा सकता है।

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शुक्राणु की संख्या बढ़ाने के प्राकृतिक उपाय (natural remedies to increase sperm count in hindi) (virya kaise badhaye)

शुक्राणु की संख्या बढ़ाने के लिए निम्न प्राकृतिक उपाय आपके लिए कारगर साबित हो सकते हैं – 

  • संतुलित आहार और सही पोषण (balanced diet):

    हमेशा से ही स्वस्थ आहार और सही पोषण की मदद से शुक्राणु की संख्या और गुणवत्ता में सुधार देखने को मिलता है। अपने आहार में विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा को बढ़ाएं, जिससे आपके शुक्राणु के स्वास्थ्य को बहुत फायदा होगा। मुख्य रूप से अपने आहार में विटामिन C और E, जिंक और फोलिक एसिड को अपने आहार में शामिल करें। इसके अतिरिक्त फल, सब्जी, होल ग्रेन्स, और प्रोटीन का सेवन शुक्राणु की संख्या को बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं। 

  • नियमित व्यायाम (exercise):

    व्यायाम आपके जीवन में बहुत महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। यदि आप नियमित व्यायाम करते हैं, तो यह आपके शरीर में टेस्टोस्टेरोन के लेवल को बढ़ाते हैं (increase testosterone level)। रिसर्च के अनुसार यह स्थापित हो चुका है कि जो लोग रोजाना व्यायाम करते हैं, उनके शरीर में शुक्राणु संख्या और उनकी गुणवत्ता बेहतर होती है। प्रयास करें कि आप अपने जीवनशैली में तैराकी, साइकिलिंग, या हल्की दौड़ को शामिल करें क्योंकि यह शुक्राणु की संख्या को बढ़ा सकते हैं।

  • तनाव कम करें (reduce stress):

    हम सभी जानते हैं कि मानसिक तनाव (मानसिक तनाव को कैसे कम करें)(tips to reduce mental stress in hindi) शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह आपकी प्रजनन क्षमता पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है? अत्यधिक तनाव, तनाव हार्मोन (Cortisol) के स्तर को बढ़ाता है, जो पुरुषों के टैस्ट्रोस्ट्रान (testosterone ) और शुक्राणु निर्माण (sperm growth) को प्रभावित करता है। इसलिए, मानसिक शांति (mental peace) बनाए रखना जरूरी है। योग (yoga), ध्यान, और ब्रीथिंग तकनीक (breathing technique) तनाव को कम करने के बेहतरीन तरीके हैं। इससे न केवल मानसिक शांति मिलती है, बल्कि शुक्राणु की संख्या और गुणवत्ता भी बेहतर होती है। अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना आपकी प्रजनन क्षमता में सुधार लाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।

  • अच्छी नींद लें (sleep):

    नींद आपके शरीर के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितना सही आहार और व्यायाम। जब आप पर्याप्त नींद लेते हैं, तो आपके शरीर में टेस्ट्रोस्ट्रोन का उत्पादन सही तरीके से होता है, जो शुक्राणु निर्माण के लिए आवश्यक है। प्रयास करें कि आप रोजाना कम से कम 7-8 घंटे की नींद लें। 

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खाद्य पदार्थ जो शुक्राणु को बढ़ाते हैं (foods that increase sperm count in hindi) (kya khane se virya badhta hai)

निम्न खाद्य पदार्थ आपके शरीर में शुक्राणु की संख्या को अच्छी खासी मात्रा में बढ़ा सकते हैं – 

  • कद्दू के बीज (Pumpkin Seeds): इनमें जिंक (zinc) और ओमेगा-3 फैटी एसिड (omega-3 fatty acid) होते हैं, जो शुक्राणु निर्माण में मदद करते हैं।
  • अखरोट (Walnuts): इसमें अल्फा-लिनोलेनिक एसिड (ALA) और ओमेगा-3 होते हैं, जो शुक्राणु के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं।
  • मेथी (Fenugreek): यह एक आयुर्वेदिक उपाय है, जो शुक्राणु निर्माण को बढ़ाता है।
  • हरी पत्तेदार सब्जियां (Green Leafy Vegetables): इनमें फोलिक एसिड (folic acid) (role of folic acid in pregnancy) और विटामिन C (vitamin c) होते हैं, जो शुक्राणु की गुणवत्ता को बढ़ाते हैं।
  • तरबूज (watermelon): तरबूज का सेवन रोजाना एक अच्छी मात्रा में करने से आपके शुक्राणुओं की संख्या में बढ़ोतरी होती है। इसमें लाइकोपीन  नामक एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट होता है, जो इसमें आपकी मदद कर सकते हैं।

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डॉक्टर से कब संपर्क करें?

यदि आपने बीते कुछ दिनों में जीवनशैली में बदलाव किए हैं, फिर भी गर्भधारण में कठिनाई आ रही है, तो यह समय है कि आप एक डॉक्टर से संपर्क करें और उनसे इलाज लें। एक सीमेन एनालिसिस/सीमेन जांच (Semen Analysis) के द्वारा शुक्राणु की संख्या और गुणवत्ता का सही मूल्यांकन किया जा सकता है। यदि आपको कम शुक्राणु के लक्षण जैसे इरेक्टाइल डिसफंक्शन, यौन इच्छा की कमी, या कम शुक्राणु की संख्या महसूस हो रही है, तो एक विशेषज्ञ से सलाह लें। वह आपकी स्थिति का सही से मूल्यांकन करके उचित उपचार की सलाह देंगे।

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निष्कर्ष

शुक्राणु बढ़ाने के उपायों को अपनाकर आप अपनी प्रजनन क्षमता में सुधार ला सकते हैं। संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, मानसिक शांति, और अच्छी नींद से शुक्राणु की संख्या बढ़ सकती है। यदि फिर भी समस्या बनी रहती है, तो हमारे अनुभवी एवं सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञ से मिलें और इलाज लें।

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs around increasing sperm count in hindi)

क्या आहार से शुक्राणु बढ़ाए जा सकते हैं?

हां, सही आहार जैसे कि विटामिन C, E, जिंक, और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन शुक्राणु की संख्या और गुणवत्ता को बढ़ा सकता है।

शुक्राणु कब तक बनता है?

शुक्राणु का निर्माण लगभग 64 से 72 दिनों में पूरा होता है, इस दौरान आहार और जीवनशैली के प्रभाव से शुक्राणु की गुणवत्ता पर असर पड़ सकता है।

शुक्राणु का खोज किसने किया था?

शुक्राणु की खोज एंटोनी वैन लीउवेनहॉक (Antonie van Leeuwenhoek) ने 1677 में किया था, जब उन्होंने पहले बार माइक्रोस्कोप के जरिए शुक्राणु को देखा था और इसको नाम भी दिया था।

शुक्राणु कितना परसेंट होना चाहिए?

सामान्य शुक्राणु गणना 39 मिलियन प्रति इजैकुलेट से ज्यादा होना चाहिए। यदि संख्या इससे कम हो, तो यह प्रजनन क्षमता पर असर डाल सकता है। यह संख्या सीमेन एनालिसिस से ही पता चल सकती है।

प्रेगनेंसी टेस्ट के घरेलू उपाय | Home Remedies For Pregnancy Test
Jun 26, 2025|Dr Keerti Khetan

प्रेगनेंसी टेस्ट के घरेलू उपाय | Home Remedies For Pregnancy Test

पीरियड्स के न आने के कारण कई लोगों के मन में संदेह उत्पन्न हो जाता है कि कहीं वह प्रेग्नेंट तो नहीं है। इसके लिए लिए प्रेगनेंसी टेस्ट एक प्रमुख उपाय है, जिससे आपका संदेह दूर हो जाएगा। टेस्ट के लिए आप डॉक्टर से मिल सकते हैं या फिर प्रेगनेंसी टेस्ट किट भी खरीद सकते हैं। ऐसे में घर पर प्रेगनेंसी टेस्ट करने के घरेलू उपाय एक अच्छा विकल्प हो सकते हैं।

चलिए इस ब्लॉग की मदद से समझते हैं कि घर पर प्रेगनेंसी टेस्ट कैसे करें? क्या यह उपाय सही है? यदि आपको प्रेगनेंसी के लक्षण दिखते हैं और आप इन्हें समझने में असमर्थ हैं, तो बिना देर किए डॉक्टर से मिलें और इलाज लें।

प्रेगनेंसी के शुरुआती लक्षण

प्रेगनेंसी के शुरुआती लक्षणों की पहचान बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी मदद से ही आप अपना पहला कदम प्रेगनेंसी टेस्ट की दिशा में बढ़ा सकते हैं। हालांकि प्रेगनेंसी की स्थिति में कुछ सामान्य लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं जैसे कि –

  • मासिक धर्म का रुकना – पीरियड्स का न आना (irregular periods causes & home remedies in hindi), गर्भधारण का सबसे सामान्य लक्षण है, जो इसका सबसे पहला लक्षण भी होता है।
  • चक्कर आना और उल्टी आना (nausea, vomiting & dizziness) – यदि सुबह के समय मतली, उल्टी या चक्कर (home remedies for vomiting during pregnancy in hindi) आना जैसे लक्षण दिखते हैं, तो हो सकता है कि आपने गर्भधारण कर लिया है। इसके बाद प्रेगनेंसी टेस्ट की तरफ अपना कदम बढ़ाएं।
  • थकान और कमजोरी (weakness)– प्रेगनेंसी के दौरान शरीर में हार्मोनल बदलावों के कारण थकान महसूस हो सकती है, इसलिए यह भी प्रेगनेंसी का एक मुख्य लक्षण है।
  • छाती में सूजन और दर्द (chest pain)– स्तन में सूजन और हल्का दर्द महसूस होना भी प्रेगनेंसी का एक मुख्य संकेत हो सकता है।
  • अधिक मूड स्विंग होना (mood swings during pregnancy)– हार्मोनल बदलाव के कारण मूड स्विंग्स भी बढ़ सकते हैं। डॉक्टर इसके लक्षणों को भी प्राथमिकता देते हैं।

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घर पर प्रेगनेंसी टेस्ट करने के घरेलू उपाय

प्रेगनेंसी के लक्षण दिखने पर आपको प्रेगनेंसी टेस्ट करने की आवश्यकता होती है, लेकिन तुरंत टेस्ट करना संभव नहीं होता है। ऐसे में कुछ घरेलू उपाय आपके लिए कारगर साबित हो सकते हैं। हालांकि, यह उपाय केवल अनुमान लगाने के लिए होते हैं और उनकी सटीकता वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं की जा सकती है। चलिए पहले उन उपायों के बारे में जानते हैं –

  • यूरिन टेस्ट (Pregnancy Test With Urine): सुबह का यूरिन प्रेगनेंसी टेस्ट के लिए एक सामान्य घरेलू उपाय है। इस उपाय में आप एक साफ ग्लास में सुबह का यूरिन डालकर उसे ढक्कन से ढक कर एक दिन के लिए रख दें। यूरिन पर पतली परत का जमना दर्शाता है कि आप प्रेग्नेंट हैं। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आप प्रेग्नेंट नहीं हैं।
  • साबुन के द्वारा जांच (Pregnancy Test With Soap): यह एक साधारण तरीका है, जिससे आपको एक ग्लास में यूरिन डालकर उसमें थोड़ी मात्रा में साबुन मिलाना होता है। यदि यूरिन में बुलबुले बनते हैं, तो यह प्रेगनेंसी को दर्शाता है।
  • चीनी के द्वारा जांच (Pregnancy Test With Sugar): पहले के समय में इस टेस्ट का खूब प्रयोग होता था। इसमें चीनी से प्रेगनेंसी टेस्ट करने के लिए यूरिन को एक ग्लास में डाला जाता है और उसमें दो चम्मच चीनी मिलाया जाता है। यदि चीनी यूरिन में पूरी तरह से घुलती नहीं है, तो यह संकेत हो सकता है कि आप प्रेग्नेंट है।
  • सिरका (Pregnancy Test With Vinegar): सिरके से प्रेगनेंसी टेस्ट करने के लिए आपको सुबह का यूरिन एक बर्तन में डालकर उसमें विनेगर मिलाना होता है। यदि घोल का रंग बदलता है या उसमें झाग (foam) बनते हैं, तो यह प्रेगनेंसी का संकेत हो सकता है।
  • टूथपेस्ट के द्वारा जांच (Pregnancy Test With Toothpaste): सफेद टूथपेस्ट का उपयोग करके भी प्रेगनेंसी टेस्ट किया जा सकता है। इसमें एक ग्लास में यूरिन डालें और उसमें थोड़ा सा सफेद टूथपेस्ट मिलाएं। यदि घोल में झाग का निर्माण हुआ और रंग में बदलाव आया, तो इसका मतलब है कि आप प्रेग्नेंट हैं।
  • साल्ट टेस्ट (Pregnancy Test With Salt): नमक से प्रेगनेंसी टेस्ट करने का तरीका बहुत ही सरल है। यूरिन के सैंपल में दो चुटकी नमक डालें और फिर कुछ मिनटों तक इंतजार करें। यदि यूरिन में सफेद झाग बने, तो यह प्रेगनेंसी का संकेत हो सकता है।
  • शैम्पू टेस्ट (Pregnancy Test With Shampoo): शैम्पू के जरिए भी प्रेगनेंसी टेस्ट किया जा सकता है। एक ग्लास में शैंपू की कुछ बूंदें डालकर उसमें पानी मिलाएं, फिर यूरिन की कुछ बूंदें डालें। अगर घोल में झाग बनते हैं, तो यह प्रेगनेंसी का संकेत हो सकता है।
  • पाइन सोल क्लीनर प्रेगनेंसी टेस्ट (Pregnancy Test With Pine-Sol Cleaner): इसमें आपको यूरिन को एक बर्तन में डालकर उसमें पाइन सोल क्लीनर मिलाना होता है। यदि यूरिन और क्लीनर का मिश्रण रंग बदलता है, तो यह प्रेगनेंसी का संकेत हो सकता है।

इन सारे उपायों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। प्रेगनेंसी टेस्ट के लिए हम आपको सलाह देंगे कि प्रोफेशनल टेस्ट करवाएं। घर पर प्रेगनेंसी टेस्ट करने से आपको सिर्फ अनुमान मिल सकता है, लेकिन डॉक्टर से कन्फर्मेशन लेना ही सबसे सही तरीका है।

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घरेलू टेस्ट के फायदे और सीमाएं

घरेलू टेस्ट के कुछ फायदे और नुकसान दोनों हैं। चलिए दोनों को एक-एक करके समझते हैं।

घरेलू टेस्ट के फायदे

घरेलू टेस्ट के निम्न फायदे हैं –

  • आसान और सस्ते: घर पर प्रेगनेंसी टेस्ट करने के घरेलू उपाय बहुत ही सरल और सस्ते होते हैं। इसके लिए आपको किसी महंगे प्रेगनेंसी टेस्ट किट को खरीदने की आवश्यकता नहीं होती है।
  • सुविधाजनक: घर पर टेस्ट करना समय की बचत करता है, और इसे आप बिना किसी को बताए भी कर सकते हैं।

घरेलू उपायों के कुछ सीमाएं भी होती हैं जैसे कि –

  • असत्य परिणाम: इन घरेलू उपायों के परिणामों का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इसलिए इनका केवल शुरुआती संकेत के रूप में इस्तेमाल करना बेहतर होता है।
  • गलत परिणाम का खतरा: कई बार इन टेस्टों के परिणाम गलत आते हैं, जो अधिक भ्रम पैदा कर सकते हैं।

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प्रेगनेंसी टेस्ट के लिए सही समय

प्रेगनेंसी टेस्ट के लिए सबसे अच्छा समय सुबह का होता है, खासकर सुबह उठते ही। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इस समय यूरिन में हार्मोन का स्तर सबसे अधिक होता है, जिससे टेस्ट के परिणाम अधिक सटीक हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि आप घरेलू उपाय से टेस्ट कर रहे हैं, तो यह ध्यान रखें कि प्रेगनेंसी टेस्ट करने का सही समय तब होता है, जब आपको अपने पीरियड्स (मासिक धर्म) में देरी का अनुभव कर रहे हैं।

घर पर प्रेगनेंसी टेस्ट के दौरान ध्यान रखने वाली बातें

जब आप घर पर प्रेगनेंसी टेस्ट करते हैं, तो कुछ बातें आपको याद रखनी चाहिए जैसे कि –

  • सफाई का ध्यान रखें: टेस्ट करने के लिए हमेशा साफ-सुथरी बोतल या कंटेनर का ही उपयोग करें।
  • उचित मात्रा में यूरिन का प्रयोग करें: टेस्ट करने के लिए बहुत कम यूरिन का उपयोग न करें, क्योंकि इससे सही परिणाम मिलने में दिक्कत हो सकती है।
  • पर्याप्त समय तक इंतजार करें: टेस्ट करने के बाद 5 से 10 मिनट तक इंतजार करें ताकि परिणाम स्पष्ट रूप से दिखे।
  • कई टेस्ट करें: एक से ज्यादा घरेलू टेस्ट करें, ताकि अधिक सटीक परिणाम मिल सके।

और पढ़ें: प्रेगनेंसी के पहले महीने में क्या क्या होता है?

घर पर प्रेगनेंसी टेस्ट किट का उपयोग

आप घर पर प्रेगनेंसी टेस्ट किट का उपयोग भी कर सकती हैं, जो कि मेडिकल स्टोर पर आसानी से उपलब्ध है। आप जब चाहे इस टेस्ट को घर लाकर सुबह उठकर अपने यूरिन से इसका टेस्ट कर सकते हैं। इस किट से भी आपको सही परिणाम मिल जाएंगे। हालांकि सिर्फ टेस्ट किट के भरोसे न रहें। जैसे ही आपको किट से प्रेगनेंसी के बारे में पता चलता है, तुरंत एक अच्छे डॉक्टर से मिलें और उनसे प्रेगनेंसी टेस्ट के बारे में बात करें। टेस्ट के दौरान आपको कुछ बातों का ध्यान रखना है, जैसे कि किट का उपयोग करते समय आपको पैकिंग पर दिए गए निर्देशों का पालन करना चाहिए। इससे परिणाम सटीक आते हैं।

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निष्कर्ष

प्रेगनेंसी टेस्ट के घरेलू उपाय आपके लिए शुरुआती संकेत दे सकते हैं, लेकिन यह केवल एक अनुमान है। सटीक और विश्वसनीय परिणाम के लिए डॉक्टर से टेस्ट करवाना ही सबसे अच्छा तरीका है। यदि आप घरेलू उपायों का उपयोग करते हैं, तो सुनिश्चित करें कि आप सही समय पर और सही तरीके से परीक्षण कर रहे हैं। किसी भी तरह के स्वास्थ्य संदेह पर विशेषज्ञ से मार्गदर्शन लेना हमेशा अच्छा माना जाता है।

आपकी प्रेगनेंसी का पता लगाना और उसकी देखभाल करना बहुत जरूरी है। अगर आपके मन में किसी भी प्रकार के सवाल या चिंता हो, तो हमें संपर्क करें। हमारे वर्षों के अनुभव वाले डॉक्टर आपकी सेवा के लिए हमेशा तैयार हैं।

अधिकतर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs around pregnancy test at home)

प्रेगनेंसी का पता लगाने में होम किट और घरेलू उपाय में क्या फर्क है?

होम किट एक वैज्ञानिक मान्यता प्राप्त टेस्टिंग किट है, जिसका उपयोग करने को डॉक्टर भी कहते हैं। इस किट में एक केमिकल का उपयोग होता है , जो यूरिन में प्रेगनेंसी हार्मोन का पता लगाता है। वहीं दूसरी तरफ घरेलू उपायों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इससे परिणाम सटीक आने की संभावना बदलती रहती है।

क्या यूरिन का रंग बदलना हमेशा प्रेगनेंसी का संकेत है?

नहीं, यूरिन का रंग बदलने से हमेशा प्रेगनेंसी का लक्षण नहीं होता है। इन घरेलू उपायों पर निर्भर करता है, और कभी-कभी यूरिन में रंग परिवर्तन अन्य कारणों से भी हो सकते हैं।

घरेलू टेस्ट कब फेल हो सकते हैं?

घरेलू टेस्ट तब फेल हो सकते हैं, जब यूरिन में हार्मोन का स्तर पर्याप्त न हो, या टेस्ट में इस्तेमाल की गई सामग्री में कोई गड़बड़ी हो।

घर पर प्रेगनेंसी टेस्ट करना कितना ठीक होता है?

यह एक अस्थायी उपाय हो सकता है, लेकिन इसके परिणाम हमेशा सही नहीं होते हैं। यदि टेस्ट सकारात्मक आता है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है।

क्या घरेलू तरीकों से प्रेगनेंसी टेस्ट सही रिजल्ट देते हैं?

चीनी, नमक या साबुन जैसे घरेलू सामानों से प्रेगनेंसी टेस्ट करने का कोई भी साइंटिफिक आधार नहीं है। पुराने समय में लोग इन तरीकों का इस्तेमाल करते थे, लेकिन डॉक्टर इन्हें बिल्कुल भी भरोसेमंद नहीं मानते। असल में, ये चीजें शरीर के ‘hCG’ हार्मोन (जो प्रेगनेंसी में बढ़ता है) के साथ कोई ठोस रिएक्शन नहीं करतीं। इसलिए, इन घरेलू नुस्खों के आधार पर कोई भी बड़ा फैसला लेना गलत हो सकता है, क्योंकि इनके रिजल्ट महज एक तुक्का या इत्तेफाक हो सकते हैं। इसलिए पहले किट से टेस्ट करें और फिर तुरंत डॉक्टर के पास जाएं।

क्या घरेलू टेस्ट मेडिकल प्रेगनेंसी टेस्ट जितने भरोसेमंद होते हैं?

नहीं, घरेलू नुस्खे कभी भी मेडिकल प्रेगनेंसी किट या डॉक्टर द्वारा किए गए ब्लड टेस्ट की जगह नहीं ले सकते। फार्मेसी पर मिलने वाली प्रेगनेंसी किट को खास तौर पर आपके यूरिन में प्रेगनेंसी हार्मोन का पता लगाने के लिए बनाया जाता है, जिसकी सटीकता बहुत अधिक होती है। यदि आपको लगता है कि आप प्रेग्नेंट हैं, तो किसी घरेलू प्रयोग में समय बर्बाद करने के बजाय एक अच्छी क्वालिटी की टेस्ट किट का उपयोग करना या डॉक्टर से संपर्क करना ही सबसे सुरक्षित और सही रास्ता है।

Preterm Labor: Causes, Symptoms, and Risks
Jun 26, 2025|Dr. Anjali Kumar

Preterm Labor: Causes, Symptoms, and Risks

  • Preterm labour and birth are common phenomenon
  • Preterm birth can increase the chances of health concerns in your newborn 
  • Preterm birth, however, can be prevented and managed for the best health outcomes

What is preterm labour?

A normal pregnancy usually lasts 40 weeks. When a pregnant woman experiences contractions before the estimated time (early than 37 weeks), it is considered preterm labour.

The early onset of labour result in the opening of your cervix after 20 weeks or before 37 weeks of pregnancy. Preterm labour can lead to premature birth which can increase the risk of certain health problems in your baby such as cerebral palsy.

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Preterm labour symptoms

Preterm labour leads to certain changes in your cervix including its thinning and dilation. These changes can lead to the following preterm labour symptoms:

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Causes of preterm labour

The exact causes of preterm labour are not known. Some common causes include:

Risk factors of preterm labour

Preterm labour can affect any pregnant woman, however, some women have a higher risk than others. Common risk factors leading to the causes of preterm labour include:

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Preterm labour management

Your healthcare provider will discuss your medical history and evaluate your risk of preterm labour. Common tests which are done to diagnose premature labour include:

  • Pelvic exam
  • Transvaginal ultrasound scans
  • Uterine monitoring
  • Lab tests

Once preterm labour has started, there are no clinical procedures to stop it. If you are at an increased risk for premature labour, your obstetrician will help manage or prevent preterm labour through the following protocols:

  • Medication to promote your baby’s health and mature organs faster
  • Surgical procedures (management of short cervix)
  • Preventive medicine to reduce complications

Read More: Back Pain during Pregnancy

FAQs

Can preterm labour stop on its own?

Preterm labour can stop on its own in some cases. While in others, it continues to make way for preterm birth. Your healthcare provider will evaluate your condition and try to prevent preterm birth to help manage the health of you and your fetus.

How can I prevent preterm labour?

You can prevent preterm labour by living a healthier lifestyle, avoiding tobacco consumption and eating a nutrient-dense diet with increased folic acid.

How early can a baby be born?

Premature birth happens before 37 weeks of pregnancy. Extremely preterm births happen between 23-28 weeks of pregnancy.

10 Places Where Hidden Sugars Sneak into Your Diet
Jun 25, 2025|Ms. Deepali Sharma

10 Places Where Hidden Sugars Sneak into Your Diet

Most of us are aware of the effects of excess sugar consumption and how it can significantly harm our health.  Eating excess sugar has been linked to increased risk of various diseases like type 2 diabetes, cancer, obesity, heart disease, and more. Still, it is easy to underestimate the amount of sugar we actually consume on a daily basis. 

The Indian Council of Medical Research (ICMR) recommends consuming sugar not more than 25 grams per day. Anything over this limit adds no nutritional value and can be harmful. 

According to a report by Statista, India is one of the leading consumers of sugar with a whopping consumption of 31 million tonnes/year. Given the wide array of traditional sweets and desserts available, it’s no surprise that this figure is so high. But is this rising number solely due to the popularity of sugary treats? Not quite! In reality, the majority of foods we purchase are supplemented by sugar. Even the foods marked as healthy are unfortunately high in sugar. 

Why Identifying Hidden Sugars Matters for Your Health

Identifying hidden sugars matters! But what exactly are hidden sugars? Hidden sugars are sugars that are not easily identifiable in the food and drinks we consume. These are often disguised with different names. These hidden sugars are commonly found in soft drinks, cereals, yoghurts, breads, granola bars, and more. Identifying hidden sugars is important because:

  • Increases Calorie Count Excessively: One of the main reasons to watch out for hidden sugars in food is that they can spike up the calorie intake. This excess sugar can lead to weight gain (diet chart for weight gain), obesity, and other health issues.
  • Increases the Risk of Chronic Diseases: One key reason to spot hidden sugars is that they can significantly raise the risk of chronic diseases. Even food products that seem healthy might be loaded with sugar, which can contribute to issues like type 2 diabetes (how to manage type 2 diabetes), heart disease (Heart Attack in Youngsters: Rising Risks, Cause, Symptoms, Preventions), and other serious health concerns.
  • Affects Oral Health: Consuming excess sugar especially hidden sugars can fuel the bacteria in the mouth that cause tooth decay & gum disease. 

Read More: Diabetes Myths & Facts

Top 10 Unexpected Sources of Hidden Sugars

There are various food products marketed as healthy but are surprisingly high in hidden sugars. From breakfast cereals to salad dressings all are high in sugar. Some of the unexpected foods that are high in hidden sugars include:

  • Breakfast Cereals:

    Yes, our go-to everyday breakfast that we consider healthy is high in hidden sugars. Even the healthy ones like granola. Plus, the cereals made specifically for children (healthy diet chart for kids in hindi) contain a significant amount of sugar. Ideally when choosing a cereal look for the ones high in fiber and low on added sugar. Also, check for other names that sugar comes in including sucrose, fructose, glucose, corn syrup, and more.

  • Flavoured Yogurt:

    Yogurt is nutritious, though not all of them get created equally. Flavoured yoghurt usually contains high sugar to enhance their flavour. Did you know? Low-fat yoghurts are surprisingly high in sugar. A single cup of flavoured yoghurt contains approximately 45 grams of sugar. The solution? When buying yoghurt choose the ones low in added sugar and select ones with no flavour and added fruits, add your own as it helps control the sugar content.  

  • Granola:

    Granola is packed with fiber, protein (high protein foods), and essential micronutrients, but it can also be sneaky with hidden sugars. It’s often marketed as a healthy breakfast choice, but when you look closer, you’ll find it’s mixed with nuts, honey, and extra sweeteners that bump up the sugar and calorie count. When you’re picking out granola, aim for options with less added sugar, or consider using it as a topping for fruit or yoghurt instead of having a whole bowl.

  • Ketchup & Salad Dressings:

    Ketchup & salad dressings are the most common condiments worldwide. Though these much-loved taste enhancers are high in sugar content. The key lies in controlling the portion size. According to a study, 1 tablespoon of ketchup contains around 1 teaspoon of sugar.

  • Breads & Baked Goods:

    Commercially produced breads & baked goods also contain high amounts of sugars. Also, the ones that don’t taste overly sweet are packed with hidden sugars. It is often used to enhance the taste, texture, and browning of the crust. It is important to read labels carefully, even the ones labelled as healthy, whole grain can also be high in sugar. 

  • Canned Soups & Sauces:

    Soups are something we don’t usually associate with sugar. However, canned soups & sauces are made using a lot of added ingredients including sugar. Sugar in soups and sauces is usually named sucrose, barley malt, maltose, and more. Soups and sauces that are high in sugar include tomato soup, salad dressing, ready-to-eat soup, pasta sauces, and more.

  • Processed Snacks:

    Our favourite munching snacks including flavoured popcorn, flavoured chips, crackers, flavoured ice cakes, and more are often packed with sugar. Even the ones mentioning natural, light or fit still hide added sugar with different names. Therefore it is often recommended to read labels and not just tags. Also, choose whole food over packaged foods, and try replacing packed snacks with roasted nuts, boiled eggs, etc.

  • Packaged Fruit Products:

    Packaged food products like dried fruit, snacks, fruit jams, etc naturally contain sugar, though these products are packed with additional sugar to enhance their taste, increase shelf life, enhance texture, and more. The best alternative here is to eat fresh whole fruit, choose unsweetened dried fruits, and look for labels that mention 100% natural – no added sugar. 

  • Energy & Sports Drink:

    Energy & sports drinks are often associated with healthy alternatives even after being marketed as fitness-friendly or performance-enhancing.  However, these contain high amounts of added sugars which may increase the risk of obesity (effects of obesity on health), diabetes (causes, symptoms & treatment), dental issues, and more. Sugar is generally added to these drinks to enhance the taste, improve texture, and increase shelf life. Hidden sugar in these drinks is often labelled as high-fructose corn syrup, glucose, fruit juice concentrate, etc.

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Decoding Food Labels: How to Spot Hidden Sugar Names

Hidden sugars are usually not named as ‘sugar’, rather they go by various other names in unexpected foods. Some of the common aliases to look for hidden sugars include:

  • Fructose: This is naturally found in fruits.
  • Sucrose: Regular table sugar.
  • Glucose: Sugar that gets easily absorbed by the body. 
  • Dextrose: A form of glucose derived from corn.
  • Lactose: Naturally occurs in milk & milk products. 
  • Maltose: Usually found in malted products. 
  • High-Fructose Corn Syrup: Sweetener used in snacks & soft drinks.
  • Agave nectar, Fruit Juice Concentrate: Less known names of sugar. 

When choosing a food product look beyond the buzzwords like light, fat-free, no added sugars, etc. Rather start with decoding the ingredient list first. Check for the section mentioning total sugars and added sugars. Start decoding the list in descending order, because the first 3-4 ingredients make the most of the product and if sugar is in t   he top three, the product might be high in sugars. Additionally, check for various other names it goes by and calculate the volume per serving.

Also Read: Diet Chart for Diabetic Patient

Practical Tips for Reducing Hidden Sugars in Your Daily Diet

There are various ways through which you can reduce the consumption of hidden sugars in your daily diet including:

Habit/Action What to Do
Choose whole food over processed foods Eat fresh fruits, vegetables, and unprocessed grains. 
Pick unsweetened versions  Always go for unsweetened versions of products like yoghurt, milk, cereals, etc. 
Limit packed drinks/beverages Avoid packaged juices, energy drinks, flavoured water, etc. 
Use natural flavour enhancers Add cinnamon, fruit puree, etc instead of sugar to foods. 
Keep note of portion sizes Watch for portion sizes, even healthier options can add up quickly. 
Be cautious of labels  Look for other names in the labels as sugar goes by various names. 

Read More: Easy ways to manage type 1 and 2 diabetes 

Cutting hidden sugar in the everyday diet does not have to equate to sacrificing taste – it’s about making wiser, better-informed decisions. Reading labels smartly, opting for whole and not ultra-processed foods, and taking notice of what goes into packaged food allows for sharply reduced unnecessary sugar consumption. Gradually, the taste buds will change, cravings will minimize, and you’ll like the natural flavours of food more than ever – all while promoting healthier long-term well-being.

 

Ovulation: Symptoms, Calendar & Tips
Jun 23, 2025|Dr Alka Gupta

Ovulation: Symptoms, Calendar & Tips

Things you need to know

  • Ovulation is a natural process in which your ovary releases a mature egg 
  • It is a phase in a woman’s menstrual cycle
  • Keeping a track of your ovulation cycle can help you identify your most fertile days

What is ovulation?

Ovulation occurs when your ovary releases a mature egg that travels down to the fallopian tube where it can be fertilized with a sperm. If fertilisation happens, the egg can travel to the uterus and implant itself to develop into a pregnancy. The day of ovulation and 5 days beforehand are considered your fertile window.

The egg can be fertilized within 12-24 hours after being released while a sperm can live in the reproductive tract for nearly 5 days.

In an average menstrual cycle of nearly 28 days, ovulation occurs around 14 days before the next cycle. However, most women experience ovulation nearly 4 days before or after the midpoint of their menstrual cycle.

Also Read: How to prepare your body for pregnancy

Ovulation Symptoms

Every woman has a distinct menstrual cycle. Hence, the ovulation period also varies. Nonetheless, you can identify your ovulation based on the following signs and ovulation symptoms.

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Tracking Ovulation

Here are some ways to keep a track of your ovulation cycle.

  • Check your basal body temperature (normal body temperature) – It is your lowest body temperature attained right after resting. It is usually charted in the early morning. You may be ovulating if your basal body temperature falls slightly and elevates again.
  • Ovulation calendar Ovulation calendars or ovulation calculators are online tools that help you fill in your details manually and record your cycle.
  • Check your symptoms – Notice the changes in your body and symptoms to know if you are ovulating.

Also Read: Food cravings during pregnancy

Pregnancy tips

Keep the following things in mind while you are trying to conceive.

FAQs

How often should you have intercourse while trying to conceive?

You should have intercourse every day or every second day during ovulation while trying to conceive.

What if you are not ovulating regularly?

If you are ovulating regularly, you may be undergoing an ovulatory disorder. You should consult an expert obstetrician-gynaecologist for a health checkup.

Can you get pregnant after ovulation?

It is possible to get pregnant after ovulation. However, your chances are higher during your fertile window.