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सिर और गर्दन के कैंसर का निदान: लक्षण, जांच और इलाज

The Oncology Centre | by Dr Harish Verma on Sep 29, 2026 | Last Updated : Sep 29, 2026

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Summary

  • गर्दन में गांठ, न भरने वाले घाव, आवाज़ में भारीपन या निगलने की तकलीफ 3 हफ्तों से अधिक बनी रहे, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें।
  • शारीरिक परीक्षा व नेसोएंडोस्कोपी के बाद CT, MRI, PET या अल्ट्रासाउंड से इमेजिंग जांच की जाती है।
  • लोकल एनेस्थीसिया देकर की जाने वाली बायोप्सी (FNAC, कोर या एंडोस्कोपिक) से ही सही निदान होता है।
  • पैथोलॉजी रिपोर्ट 3-7 दिनों में कैंसर के प्रकार की पुष्टि करती है।
  • TNM सिस्टम द्वारा स्टेजिंग और ग्रेडिंग से इलाज की दिशा तय होती है।
  • एडवांस मामलों में HPV, EGFR और PD-L1 परीक्षणों से व्यक्तिगत इलाज योजना बनती है।
  • समय पर निदान से इलाज की सफलता दर बढ़ती है, इसलिए लक्षण दिखते ही विशेषज्ञ से परामर्श लें।

क्या आप गले में लगातार खराश, आवाज़ में भारीपन या गर्दन में हल्की गांठ महसूस कर रहे हैं? ऐसे संकेतों को इन्फेक्शन मानकर टाल देना भारी पड़ सकता है। समय पर सिर और गर्दन के कैंसर का निदान होने से इलाज की सफलता दर काफी बढ़ जाती है। यदि आप जानना चाहते हैं कि सिर और गर्दन के कैंसर का निदान कैसे किया जाता है, तो यह जानकारी आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, खुद अनुमान लगाने से बेहतर विकल्प डॉक्टर से परामर्श और सही कैंसर स्क्रीनिंग कराना है, जिसके बारे में हम इस ब्लॉग में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

गर्दन और सिर के कैंसर के लक्षण

Symptoms of Head and Neck Cancer

भारत में सिर और गर्दन का कैंसर पुरुषों में होने वाले सभी कैंसर का करीब 26 प्रतिशत हिस्सा है, और यह आंकड़ा दुनिया के कई विकसित देशों से भी ज़्यादा है। ज्यादातर मामलों में शुरुआती संकेत बेहद मामूली दिखते हैं, इसलिए लोग इन्हें सामान्य सर्दी-खांसी या दांत की समस्या समझकर टाल देते हैं।

नीचे दिए गए गर्दन और सिर के लक्षणों पर विशेष ध्यान दें, खासकर अगर ये तीन हफ्तों से ज़्यादा समय तक बने रहें:

  • गर्दन या जबड़े के नीचे बिना दर्द वाली गांठ, जो धीरे-धीरे बढ़ रही है।
  • मुंह के अल्सर या घाव, जो दो-तीन हफ्तों तक ठीक न हों।
  • आवाज़ में लगातार भारीपन या बदलाव आना।
  • निगलने में तकलीफ या गले में कुछ अटका हुआ महसूस होना।
  • लगातार बना रहने वाला गले में दर्द या खराश।
  • कान में बिना किसी संक्रमण के दर्द होना।
  • बिना किसी कारण के वजन कम होना।
  • मुंह से खून आना या दांतों का अचानक ढीला होना।
  • नाक से लगातार खून आना या एक तरफ की नाक बंद रहना।

यह ज़रूरी नहीं कि ये सभी लक्षण कैंसर का ही संकेत हों, इनमें से कई सामान्य इन्फेक्शन या एलर्जी की वजह से भी हो सकते हैं। लेकिन अगर लक्षण तीन हफ्तों से ज़्यादा बने रहें या धीरे-धीरे बढ़ रहे हों, तो बिना देरी किए डॉक्टर से मिलना ही समझदारी है। तंबाकू और गुटखा का सेवन 80 से 90 प्रतिशत मुंह के कैंसर मामलों से जुड़ा पाया गया है, इसलिए धूम्रपान या तंबाकू का सेवन करने वालों को इन लक्षणों के प्रति और भी सतर्क रहना चाहिए।

शारीरिक परीक्षा और नैदानिक मूल्यांकन प्रक्रिया

निदान की शुरुआत मरीज की मेडिकल हिस्ट्री (तंबाकू/शराब/पान-गुटखे का सेवन, फैमिली कैंसर हिस्ट्री, लक्षणों के उत्पन्न होने का समय) और मुंह, गला, नाक, गर्दन व कान की जांच से होती है। इसके अतिरिक्त कुछ और भी जांचें हैं, जिनका सुझाव डॉक्टर देते हैं –

मुख्य कैंसर स्क्रीनिंग:

  • प्रत्यक्ष निरीक्षण: मुंह, जीभ और गले के असामान्य घाव या सूजन का पता लगाना।
  • पैल्पेशन (स्पर्श जांच): गर्दन को छूकर लिम्फ नोड्स में गांठ या सूजन की जांच करना।
  • नैज़ोएंडोस्कोपी: लचीली ट्यूब के माध्यम से नाक और गले के अंदरूनी हिस्से को देखना।
  • स्वर परीक्षण: आवाज़ की गुणवत्ता और वोकल कॉर्ड की कार्यक्षमता का आकलन।

यह त्वरित प्रक्रिया सुरक्षित होती है और आगे की बायोप्सी या इमेजिंग जांचों का आधार तय करती है।

इमेजिंग तकनीकें: CT, MRI, PET, अल्ट्रासाउंड और एंडोस्कोपी

कैंसर के आकार, स्थान और फैलाव (स्टेजिंग) का सटीक पता लगाने के लिए ये टेस्ट किए जाते हैं –

  • CT स्कैन: हड्डियों व ऊतकों की स्पष्ट तस्वीर; ट्यूमर के आकार और गर्दन के कैंसर की स्टेजिंग के लिए यह प्राथमिक विकल्प है।
  • MRI स्कैन: नरम ऊतकों, नसों और गहराई तक फैले ट्यूमर की CT से अधिक स्पष्ट जांच के लिए MRI सबसे सटीक है।
  • PET स्कैन: पूरे शरीर में कैंसर कोशिकाओं की सक्रियता और अन्य अंगों/लिम्फ नोड्स में फैलाव का पता लगाना इस स्कैन से मुमकिन है।
  • अल्ट्रासाउंड: गर्दन की गांठ की त्वरित, दर्द-रहित जांच और बायोप्सी की गाइडेंस के लिए अल्ट्रासाउंड का उपयोग होता है।
  • एंडोस्कोपी: कैमरे वाली ट्यूब से गले और स्वरयंत्र (लैरिंक्स) के छिपे हिस्सों का निरीक्षण किया जाता है।

सटीक इलाज की योजना बनाने के लिए एक से अधिक इमेजिंग जांचों का उपयोग सामान्य है।

बायोप्सी के प्रकार और प्रक्रिया

इमेजिंग के बाद कैंसर स्क्रीनिंग का आखिरी स्टेज बायोप्सी से ही होता है, जिसमें संदिग्ध ऊतक की माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है। बायोप्सी के लिए निम्न प्रक्रियाएं की जाती हैं –

  • FNAC: पतली सुई द्वारा कोशिकाएं निकाली (त्वरित व कम दर्दनाक) जाती हैं।
  • कोर नीडल बायोप्सी: इसमें मोटी सुई से बड़ा ऊतक सैंपल लिया जाता है, जो अधिक सटीक होता है।
  • इंसिज़नल/एक्सिज़नल बायोप्सी: छोटी सर्जरी द्वारा ऊतक का टुकड़ा या पूरी गांठ को निकाला जाता है।
  • एंडोस्कोपिक बायोप्सी: एंडोस्कोप की मदद से गले या स्वरयंत्र से सैंपल लिया जाता है।

अधिकांश बायोप्सी लोकल एनेस्थीसिया में की जाती हैं, जिससे दर्द नहीं होता और बाद की हल्की सूजन दवाओं से नियंत्रित हो जाती है।

पैथोलॉजिकल परीक्षण और ऊतक विश्लेषण

पैथोलॉजिकल परीक्षण कैंसर का प्रकार और उसकी कोशिकीय प्रकृति तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाता है। इस चरण में कुछ मुख्य बिंदु हैं जैसे कि –

  • कैंसर का प्रकार: टेस्ट की रिपोर्ट से यह पुष्टि हो सकती है कि कैंसर का प्रकार क्या है। जैसे सिर-गर्दन में सबसे आम स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा होता है।
  • संरचना व मार्जिन: फिर देखा जाता है कि कैंसर बना कहाँ है और उसकी वर्तमान स्थिति क्या है जैसे कि – कोशिकाओं का रूप और ट्यूमर के किनारों की स्थिति।
  • फैलाव: लिम्फ नोड्स या आसपास की रक्त वाहिकाओं में मौजूदगी से ये पता चलता है कि ये कितना फैला है।

रिपोर्ट आपको कुछ ही दिनों में मिल जाती है।

कैंसर की स्टेजिंग और ग्रेडिंग

कैंसर की पुष्टि के बाद स्टेजिंग से पता लगाया जाता है कि कैंसर कितना फैला है। इसके लिए TNM सिस्टम का इस्तेमाल होता है:

  • T (Tumor): ट्यूमर का आकार
  • N (Nodes): लिम्फ नोड्स में फैलाव
  • M (Metastasis): शरीर के अन्य हिस्सों में फैलाव

इन आधारों पर कैंसर को स्टेज 1 से 4 में बांटा जाता है। ग्रेडिंग यह दर्शाती है कि कोशिकाएं माइक्रोस्कोप में कितनी असामान्य दिखती हैं और कितनी तेज़ी से बढ़ सकती हैं –

  • कम ग्रेड: कोशिकाएं सामान्य ऊतक जैसी दिखती हैं और धीमी गति से बढ़ती हैं।
  • उच्च ग्रेड: कोशिकाएं अधिक आक्रामक होती हैं और तेज़ी से बढ़ती हैं।

महत्व: स्टेज और ग्रेड ही तय करते हैं कि इलाज में सर्जरी, रेडिएशन,कीमोथेरेपी या इनका संयोजन इस्तेमाल होगा। शुरुआती स्टेज (1 और 2) में निदान होने पर सफलता दर काफी अधिक होती है। सटीक स्टेजिंग के लिए इमेजिंग रिपोर्ट, पैथोलॉजी परिणाम और शारीरिक परीक्षा तीनों को मिलाकर निर्णय लिया जाता है।

जेनेटिक और जीन जाँच – Genetic and Gene testing

ये टेस्ट कैंसर के आनुवंशिक बदलावों की पहचान कर व्यक्तिगत इलाज (Personalized Treatment) की राह खोलते हैं। इसके लिए मुख्य रूप से नीचे बताए गए टेस्ट का सुझाव दिया जाता है –

  • HPV टेस्टिंग: ऑरोफैरिंजियल कैंसर में यह टेस्ट कराया जाता है। HPV पॉज़िटिव मामलों में उपचार परिणाम बेहतर होते हैं।
  • EGFR म्यूटेशन: टार्गेटेड थेरेपी की अनुकूलता जांचने के लिए इस प्रकार के म्यूटेशन की जांच होती है।
  • PD-L1 टेस्टिंग: इम्यूनोथेरेपी के लाभ का आकलन करने के लिए ये टेस्ट अनिवार्य होता है।

निदान के बाद अगले कदम और उपचार योजना

निदान के बाद ऑन्कोसर्जन, रेडिएशन व मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम मिलकर उपचार योजना तैयार करती है जैसे कि –

  • रिपोर्ट्स के साथ ऑन्कोलॉजिस्ट से परामर्श करें।
  • इलाज के विकल्पों, संभावित साइड इफेक्ट्स और सफलता दर के बारे में खुलकर बात करें।
  • जरूरत पड़ने पर सेकंड ओपिनियन लेने में संकोच न करें।
  • पोषण विशेषज्ञ और काउंसलर की मदद से शारीरिक व मानसिक तैयारी शुरू करें।

सीके बिरला अस्पताल के डॉक्टर मानते हैं कि सही इलाज से पहले प्रक्रिया की पूरी जानकारी होना, मरीजों की चिंताओं को 50-60% तक कम कर सकता है। इसलिए परामर्श के दौरान अपने सभी प्रश्न पूछें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

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MBBS, MS FALS (Oncology), FARIS (Robotic Surgery) Dr Harish Verma is an acclaimed and renowned surgical oncologist. He has successfully performed over a thousand complex cancer surgeries. Dr Verma has special interest in minimal access surgeries including Laparoscopic, Thoracoscopic and Robotic surgeries.   He has rich experience in cancer research and has published numerous papers and research articles in national...

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