
क्या आप गले में लगातार खराश, आवाज़ में भारीपन या गर्दन में हल्की गांठ महसूस कर रहे हैं? ऐसे संकेतों को इन्फेक्शन मानकर टाल देना भारी पड़ सकता है। समय पर सिर और गर्दन के कैंसर का निदान होने से इलाज की सफलता दर काफी बढ़ जाती है। यदि आप जानना चाहते हैं कि सिर और गर्दन के कैंसर का निदान कैसे किया जाता है, तो यह जानकारी आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हालांकि, खुद अनुमान लगाने से बेहतर विकल्प डॉक्टर से परामर्श और सही कैंसर स्क्रीनिंग कराना है, जिसके बारे में हम इस ब्लॉग में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

भारत में सिर और गर्दन का कैंसर पुरुषों में होने वाले सभी कैंसर का करीब 26 प्रतिशत हिस्सा है, और यह आंकड़ा दुनिया के कई विकसित देशों से भी ज़्यादा है। ज्यादातर मामलों में शुरुआती संकेत बेहद मामूली दिखते हैं, इसलिए लोग इन्हें सामान्य सर्दी-खांसी या दांत की समस्या समझकर टाल देते हैं।
नीचे दिए गए गर्दन और सिर के लक्षणों पर विशेष ध्यान दें, खासकर अगर ये तीन हफ्तों से ज़्यादा समय तक बने रहें:
यह ज़रूरी नहीं कि ये सभी लक्षण कैंसर का ही संकेत हों, इनमें से कई सामान्य इन्फेक्शन या एलर्जी की वजह से भी हो सकते हैं। लेकिन अगर लक्षण तीन हफ्तों से ज़्यादा बने रहें या धीरे-धीरे बढ़ रहे हों, तो बिना देरी किए डॉक्टर से मिलना ही समझदारी है। तंबाकू और गुटखा का सेवन 80 से 90 प्रतिशत मुंह के कैंसर मामलों से जुड़ा पाया गया है, इसलिए धूम्रपान या तंबाकू का सेवन करने वालों को इन लक्षणों के प्रति और भी सतर्क रहना चाहिए।
निदान की शुरुआत मरीज की मेडिकल हिस्ट्री (तंबाकू/शराब/पान-गुटखे का सेवन, फैमिली कैंसर हिस्ट्री, लक्षणों के उत्पन्न होने का समय) और मुंह, गला, नाक, गर्दन व कान की जांच से होती है। इसके अतिरिक्त कुछ और भी जांचें हैं, जिनका सुझाव डॉक्टर देते हैं –
मुख्य कैंसर स्क्रीनिंग:
यह त्वरित प्रक्रिया सुरक्षित होती है और आगे की बायोप्सी या इमेजिंग जांचों का आधार तय करती है।
कैंसर के आकार, स्थान और फैलाव (स्टेजिंग) का सटीक पता लगाने के लिए ये टेस्ट किए जाते हैं –
सटीक इलाज की योजना बनाने के लिए एक से अधिक इमेजिंग जांचों का उपयोग सामान्य है।
इमेजिंग के बाद कैंसर स्क्रीनिंग का आखिरी स्टेज बायोप्सी से ही होता है, जिसमें संदिग्ध ऊतक की माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है। बायोप्सी के लिए निम्न प्रक्रियाएं की जाती हैं –
अधिकांश बायोप्सी लोकल एनेस्थीसिया में की जाती हैं, जिससे दर्द नहीं होता और बाद की हल्की सूजन दवाओं से नियंत्रित हो जाती है।
पैथोलॉजिकल परीक्षण कैंसर का प्रकार और उसकी कोशिकीय प्रकृति तय करने में सबसे अहम भूमिका निभाता है। इस चरण में कुछ मुख्य बिंदु हैं जैसे कि –
रिपोर्ट आपको कुछ ही दिनों में मिल जाती है।
कैंसर की पुष्टि के बाद स्टेजिंग से पता लगाया जाता है कि कैंसर कितना फैला है। इसके लिए TNM सिस्टम का इस्तेमाल होता है:
इन आधारों पर कैंसर को स्टेज 1 से 4 में बांटा जाता है। ग्रेडिंग यह दर्शाती है कि कोशिकाएं माइक्रोस्कोप में कितनी असामान्य दिखती हैं और कितनी तेज़ी से बढ़ सकती हैं –
महत्व: स्टेज और ग्रेड ही तय करते हैं कि इलाज में सर्जरी, रेडिएशन,कीमोथेरेपी या इनका संयोजन इस्तेमाल होगा। शुरुआती स्टेज (1 और 2) में निदान होने पर सफलता दर काफी अधिक होती है। सटीक स्टेजिंग के लिए इमेजिंग रिपोर्ट, पैथोलॉजी परिणाम और शारीरिक परीक्षा तीनों को मिलाकर निर्णय लिया जाता है।
ये टेस्ट कैंसर के आनुवंशिक बदलावों की पहचान कर व्यक्तिगत इलाज (Personalized Treatment) की राह खोलते हैं। इसके लिए मुख्य रूप से नीचे बताए गए टेस्ट का सुझाव दिया जाता है –
निदान के बाद ऑन्कोसर्जन, रेडिएशन व मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट की मल्टीडिसिप्लिनरी टीम मिलकर उपचार योजना तैयार करती है जैसे कि –
सीके बिरला अस्पताल के डॉक्टर मानते हैं कि सही इलाज से पहले प्रक्रिया की पूरी जानकारी होना, मरीजों की चिंताओं को 50-60% तक कम कर सकता है। इसलिए परामर्श के दौरान अपने सभी प्रश्न पूछें।
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