
योनि में खुजली, जलन या दही जैसा सफेद डिस्चार्ज होने पर कई महिलाएं घबरा जाती हैं या शर्म के कारण बात टाल देती हैं। इसका एक आम कारण योनि में यीस्ट संक्रमण (यीस्ट इंफेक्शन) हो सकता है। यह एक फंगल संक्रमण है, जो कैंडिडा नाम के फंगस के बढ़ जाने से होता है। यह गंभीर बीमारी नहीं माना जाता है और सही इलाज से आमतौर पर ठीक हो जाता है। फिर भी हर खुजली या डिस्चार्ज यीस्ट इंफेक्शन नहीं होता, इसलिए लक्षणों को पहचानना और जरूरत पड़ने पर जांच कराना जरूरी है।
अगर आपको ऐसे लक्षण दिख रहे हैं या रिपोर्ट को लेकर कोई चिंता है, तो विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लेना सही कदम हो सकता है। सीके बिरला अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ टीम ऐसे मामलों में जांच और इलाज में मदद करती है।
योनि में कई तरह के बैक्टीरिया और थोड़ी मात्रा में कैंडिडा फंगस स्वाभाविक रूप से रहते हैं। जब तक संतुलन बना रहता है, कोई परेशानी नहीं होती। संतुलन बिगड़ने पर फंगस तेजी से बढ़ते हैं, जिसके कारण संक्रमण बन जाता है। डॉक्टर इसे वल्वोवैजाइनल कैंडिडिआसिस (vulvovaginal candidiasis) कहते हैं। लगभग 85 से 90 प्रतिशत मामलों में कारण कैंडिडा एल्बिकन्स (Candida albicans) होता है।
कितना आम है? CDC के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत महिलाओं को जीवन में कम से कम एक बार यह संक्रमण होता है, और करीब आधी महिलाओं को एक से ज्यादा बार। यानी महिलाओं में यीस्ट संक्रमण बहुत सामान्य है और इसमें शर्मिंदगी जैसी कोई बात नहीं है।
लोग इसे यौन संचारित रोग (STI) समझ लेते हैं, लेकिन ऐसा कुछ नहीं है। हालांकि यौन संबंध के बाद कभी-कभी लक्षण शुरू हो सकते हैं। यह उन महिलाओं को भी हो सकता है जो यौन रूप से सक्रिय नहीं हैं।

यीस्ट संक्रमण के कई कारण हो सकते हैं जैसे कि –
यीस्ट संक्रमण के लक्षण हल्के भी हो सकते हैं और तेज भी। चलिए इसके सभी संभावित लक्षणों के बारे में जानते हैं –
लक्षण लगभग वही रहते हैं, लेकिन गर्भावस्था में ये अधिक आम और कभी-कभी ज्यादा तकलीफदेह हो सकते हैं, क्योंकि एस्ट्रोजन बढ़ने से योनि में फंगस के लिए अनुकूल माहौल बन जाता है। इस दौरान सफेद डिस्चार्ज बढ़ना सामान्य भी हो सकता है, इसलिए सिर्फ मात्रा देखकर नहीं, बल्कि खुजली, जलन, लालिमा और डिस्चार्ज के स्वरूप को देखकर समझें। गर्भावस्था में खुद से दवा शुरू करने के बजाय पहले डॉक्टर से पूछना जरूरी है।
यीस्ट के कारण योनि की परत में सूजन आ जाती है और फंगस व मृत कोशिकाएं मिलकर गाढ़ा, छेने जैसा सफेद स्राव बनाती हैं। हालांकि, हर सफेद डिस्चार्ज संक्रमण नहीं होता। पीरियड्स साइकिल के बीच और गर्भावस्था में पतला, बिना गंध वाला, बिना खुजली का सफेद स्राव होना पूरी तरह से सामान्य हो सकता है।
घर पर केवल लक्षणों से पक्का पता लगाना मुश्किल है, क्योंकि कई संक्रमणों के लक्षण आपस में मिलते-जुलते हैं। डॉक्टर आमतौर पर पहचान के लिए ये तरीके अपनाते हैं –
यीस्ट संक्रमण का इलाज एंटीफंगल दवाओं से होता है। ये योनि में लगाने वाली क्रीम, पेसरी या खाने वाली गोलियों के रूप में आती हैं। कौन सी दवा, कितने दिन और किस रूप में दी जाए, यह डॉक्टर लक्षणों, संक्रमण की गंभीरता और आपकी स्थिति देखकर तय करते हैं।
| स्थिति | इलाज का सामान्य तरीका |
| साधारण (पहली बार या कभी-कभार) | एंटीफंगल क्रीम/पेसरी या एक खुराक वाली खाने की दवा |
| गंभीर लक्षण | अधिक दिनों का कोर्स |
| बार-बार होने वाला संक्रमण | लंबा शुरुआती कोर्स, फिर कई महीनों तक मेंटेनेंस इलाज |
| प्रेग्नेंसी | आमतौर पर योनि में लगाने वाली दवाएं, कुछ दिनों के कोर्स में। खाने वाली एंटीफंगल दवाओं से बचा जाता है |
“कितने दिनों में ठीक होता है?” ये सवाल अक्सर पूछा जाता है। साधारण संक्रमण में दवा शुरू करने के कुछ दिनों के भीतर राहत मिलने लगती है और पूरा कोर्स आमतौर पर एक से सात दिन का होता है। राहत मिलने पर भी कोर्स पूरा करना चाहिए। गंभीर या बार-बार होने वाले संक्रमण में ज्यादा समय लग सकता है।
गर्भावस्था में इलाज योनि में लगाई जाने वाली एंटीफंगल दवाओं से किया जाता है, जो आमतौर पर सुरक्षित मानी जाती हैं और इन्हें अक्सर थोड़े लंबे कोर्स के लिए दिया जाता है। प्रसव के समय बहुत कम मामलों में शिशु के मुंह में फंगस (थ्रश) आ सकता है, जिसका इलाज आसान है। इसलिए गर्भावस्था में लक्षण दिखें तो डॉक्टर को बताएं और बिना सलाह के कोई दवा या क्रीम न लें।
घरेलू उपाय इलाज की जगह नहीं ले सकते, लेकिन कुछ आदतें राहत और बचाव में मदद करती हैं जैसे कि –
योनि के अंदर डूश (douching) करने, सिरका, लहसुन, टी-ट्री ऑयल या दही का इस्तेमाल करने से बचें। ये योनि के प्राकृतिक pH संतुलन को बिगाड़ सकते हैं और संक्रमण बढ़ा सकते हैं। दही या प्रोबायोटिक खाने से संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है, पर इसे इलाज का विकल्प न मानें।
दोनों में डिस्चार्ज और बेचैनी होती है, इसलिए लोग अक्सर इन्हें मिला देते हैं। पर इलाज अलग है, इसलिए फर्क समझना जरूरी है, जिसे आप नीचे बताए गए पहलुओं से आसानी से समझ सकते हैं –

अगर एक साल में चार या उससे ज्यादा बार संक्रमण हो, तो इसे रिकरेंट माना जाता है। इसके पीछे अनियंत्रित डायबिटीज, बार-बार एंटीबायोटिक का इस्तेमाल, हार्मोनल कारण, कमजोर इम्यूनिटी, या कभी-कभी कैंडिडा की ऐसी प्रजाति हो सकती है, जिस पर सामान्य दवा कम असर करती है। ऐसे में केवल दवा बदलने से काम नहीं चलता, कारण की जांच जरूरी है।
डायबिटीज से खतरा बढ़ सकता है, खासकर जब ब्लड शुगर लंबे समय तक ज्यादा रहे। शुगर बढ़ने पर योनि के स्राव में भी शर्करा बढ़ती है, जो फंगस को पनपने में मदद करती है। डायबिटीज की कुछ दवाएं (जैसे SGLT2 इनहिबिटर) भी जननांग के फंगल संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकती हैं। इसलिए बार-बार संक्रमण होने पर शुगर की जांच करवाना समझदारी है।
इनमें से कोई भी स्थिति हो तो तुरंत डॉक्टर से मिलें –
योनि में यीस्ट संक्रमण आम है और सही दवा से ठीक हो जाता है। असली जरूरत इस बात की है कि लक्षणों को नजरअंदाज न करें, खुद से अंदाजे पर इलाज न करें, और गर्भावस्था या बार-बार संक्रमण की स्थिति में विशेषज्ञ की राय लें। जांच और सही इलाज के लिए आप सीके बिरला अस्पताल के स्त्री रोग विभाग में अपॉइंटमेंट ले सकती हैं।
Written and Verified by:

Similar Gynaecology Blogs
Request a call back