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पोस्टपार्टम ब्लीडिंग – अवधि, कारण व देखभाल

Gynaecology | by Dr Alka Gupta on Jul 23, 2026

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Summary

पोस्टपार्टम ब्लीडिंग (लोचिया) डिलीवरी के बाद होने वाली एक सामान्य रिकवरी प्रक्रिया है, लेकिन इसकी अवधि, रंग और मात्रा को समझना जरूरी है। इस लेख में जानें लोचिया के चरण, सामान्य और असामान्य लक्षण, कारण, सही देखभाल, खतरे के संकेत और कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए, ताकि प्रसव के बाद रिकवरी सुरक्षित और स्वस्थ बनी रहे।

नौ महीने के इंतजार के बाद जब बच्चा आपकी गोद में आता है, वह पल जिंदगी का सबसे खूबसूरत अनुभव होता है। लेकिन इसी के साथ शरीर के अंदर एक नई यात्रा भी शुरू होती है, जिसके बारे में अक्सर कम बात होती है, वह है पोस्टपार्टम रिकवरी। डिलीवरी के बाद होने वाली ब्लीडिंग को लेकर नई मांओं के मन में अक्सर ढेरों सवाल होते हैं, “यह कब तक चलेगी,” “कितनी ब्लीडिंग सामान्य है,” और “कहीं यह कोई खतरे का संकेत तो नहीं?” ये सवाल बिल्कुल वाजिब है, क्योंकि सही जानकारी न होने पर एक नई मां के लिए यह समय भ्रम और चिंता से भरा हो सकता है।

इस ब्लॉग में हम आपको पोस्टपार्टम ब्लीडिंग यानी लोचिया से जुड़ी हर जरूरी जानकारी बेहद स्पष्ट और मेडिकली सटीक तरीके से देंगे, ताकि आप जान सकें कि क्या सामान्य है और कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है। अगर आपको या आपके किसी परिचित को डिलीवरी के बाद ब्लीडिंग को लेकर कोई भी असमंजस या चिंता महसूस हो रही है, तो देर न करें, हमारी अनुभवी गायनेकोलॉजी टीम से आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और पूरी तरह निश्चिंत होकर अपनी रिकवरी पर ध्यान दें।

पोस्टपार्टम ब्लीडिंग (लोचिया) क्या है?

लोचिया वह प्राकृतिक डिस्चार्ज है, जो डिलीवरी के बाद होता है, जिसमें खून, गर्भाशय के भीतरी ऊतक और म्यूकस शामिल होते हैं। गर्भावस्था के दौरान गर्भाशय की भीतरी परत बच्चे को पोषण देने के लिए मोटी हो जाती है, और डिलीवरी के बाद शरीर इसी अतिरिक्त परत को धीरे-धीरे बाहर निकालता है। यह प्रक्रिया चाहे नॉर्मल डिलीवरी हो या सी-सेक्शन, दोनों ही स्थितियों में होती है, क्योंकि प्लेसेंटा जुड़ा होने की जगह को ठीक होने में समय लगता है।

यह समझना जरूरी है कि लोचिया कोई बीमारी नहीं, बल्कि शरीर के प्राकृतिक रूप से ठीक होने और गर्भाशय के अपने सामान्य आकार में वापस आने (यूटेराइन इनवोल्यूशन) की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

ब्लीडिंग की सामान्य अवधि और चरण

लोचिया आमतौर पर तीन चरणों में गुजरता है, और हर चरण की अपनी खासियत होती है –

  • लोचिया रूब्रा (पहले 3-4 दिन): यह सबसे भारी चरण है, गहरे लाल रंग की ब्लीडिंग है जिसमें छोटे थक्के भी आ सकते हैं। यह भारी पीरियड्स जैसा महसूस हो सकता है।
  • लोचिया सेरोसा (चौथे से लगभग 10वें दिन तक): ब्लीडिंग हल्की होने लगती है और रंग गुलाबी या भूरे रंग का हो जाता है।
  • लोचिया अल्बा (10वें दिन से लेकर 4-6 हफ्तों तक): इस चरण में डिस्चार्ज हल्का पीला या सफेद हो जाता है, और यह कुछ हफ्तों तक रुक-रुक कर जारी रह सकता है।

कुल मिलाकर यह प्रक्रिया औसतन 4 से 6 हफ्तों तक चलती है, हालांकि कुछ महिलाओं में यह 8 हफ्तों तक भी जा सकती है, और यह पूरी तरह सामान्य है। स्तनपान कराने से शरीर में ऑक्सीटोसिन हार्मोन बढ़ता है, जो गर्भाशय को सिकोड़ने में मदद करता है, इसलिए स्तनपान के दौरान अस्थायी रूप से हल्की ऐंठन या ब्लीडिंग में मामूली बढ़ोतरी महसूस हो सकती है।

प्रसव के बाद रक्तस्राव के प्रमुख कारण

सामान्य लोचिया के अलावा, कुछ स्थितियां रक्तस्राव या रक्त हानी को बढ़ा सकती हैं या इसकी अवधि लंबी कर सकती हैं जैसे कि –

  • गर्भाशय का ठीक से सिकुड़ न पाना (यूटेराइन एटोनी): यह अत्यधिक रक्तस्राव का सबसे आम कारण है।
  • प्लेसेंटा का कुछ हिस्सा गर्भाशय में रह जाना: इससे रक्तस्राव लंबे समय तक जारी रह सकता है।
  • डिलीवरी के दौरान हुए टांके या टियर: यह भी शुरुआती दिनों में रक्तस्राव को प्रभावित कर सकते हैं।
  • संक्रमण (endometritis): गर्भाशय की भीतरी परत में संक्रमण होने पर ब्लीडिंग के साथ दुर्गंध और बुखार भी आ सकता है।
  • खून के थक्के जमने से जुड़ी समस्याएं: दुर्लभ मामलों में यह भी रक्तस्राव को बढ़ा सकती हैं।

रिकवरी के दौरान स्वच्छता और देखभाल

सही स्वच्छता न सिर्फ आराम देती है, बल्कि संक्रमण से भी बचाती है। आप निम्नलिखित बातों का ख्याल रखें और अभी जन्मे बच्चे के साथ मां का भी ध्यान रखें –

  • हमेशा सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करें, पहले कुछ हफ्तों तक टैम्पोन या मैंस्ट्रुअल कप बिल्कुल न लगाएं, क्योंकि इससे संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
  • पैड को हर 3-4 घंटे में या जरूरत पड़ने पर हर घंटे बदलें, खासकर शुरुआती दिनों में।
  • टांकों या पेरिनियल एरिया की सफाई डॉक्टर की सलाह अनुसार गुनगुने पानी से करें, कठोर साबुन या केमिकल वाले उत्पादों से बचें।
  • हाथ धोकर ही पैड बदलें और सफाई से जुड़ी सावधानियां बरतें।
  • पहले 6 हफ्तों तक बाथटब में भीगने या स्विमिंग से बचें, शॉवर लेना सुरक्षित है।

खानपान और जीवनशैली में बदलाव

डिलीवरी के बाद शरीर को ठीक होने के लिए सही पोषण की सख्त जरूरत होती है, इसलिए अपने आहार में निम्न बदलाव करें –

  • आयरन युक्त आहार: पालक, चुकंदर, अनार और गुड़ जैसी चीजें खून की भरपाई में मदद करती हैं, क्योंकि डिलीवरी में खून की कुछ मात्रा स्वाभाविक रूप से कम होती है।
  • प्रोटीन युक्त भोजन: दाल, अंडे, पनीर और दूध शरीर के ऊतकों की मरम्मत और घाव भरने में मदद करते हैं।
  • पर्याप्त पानी और तरल पदार्थ: हाइड्रेशन रिकवरी और स्तनपान दोनों के लिए जरूरी है।
  • भारी काम और एक्सरसाइज से दूरी: शुरुआती हफ्तों में वजन उठाने या तेज गतिविधि से बचें, क्योंकि इससे ब्लीडिंग अचानक बढ़ सकती है।
  • पर्याप्त नींद और आराम को प्राथमिकता दें, शरीर को ठीक होने के लिए समय चाहिए।

खतरे के संकेत: कब तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पोस्टपार्टम हेमरेज यानी अत्यधिक प्रसवोत्तर रक्तस्राव दुनिया भर में मातृ मृत्यु के प्रमुख कारणों में से एक है, इसलिए चेतावनी भरे लक्षणों को पहचानना बेहद जरूरी है। नीचे दिए गए किसी भी संकेत पर तुरंत मेडिकल मदद लें, इसमें देरी न करें –

  • लगातार दो घंटों तक हर घंटे एक या उससे अधिक पैड का पूरी तरह भीग जाना, या अचानक 15 मिनट में पैड का पूरी तरह भीग जाना।
  • अमेरिकन कॉलेज ऑफ ऑब्सटेट्रिशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट (ACOG) के अनुसार, गोल्फ की गेंद या नींबू के आकार जितने बड़े थक्के आना
  • अचानक तेज चक्कर आना, बेहोशी जैसा महसूस होना या धुंधला दिखना
  • दिल की धड़कन तेज होना या ठंडा, चिपचिपा पसीना आना
  • तेज बुखार, ठंड लगना या पेट में असहनीय दर्द
  • डिस्चार्ज से तेज या असामान्य दुर्गंध आना, जो संक्रमण का संकेत हो सकता है
  • ब्लीडिंग कम होने के बाद अचानक फिर से भारी हो जाना

इनमें से कोई भी लक्षण दिखने पर घर पर इंतजार न करें, सीधे अस्पताल की इमरजेंसी में संपर्क करें, क्योंकि पोस्टपार्टम हेमरेज की स्थिति में हर मिनट कीमती होता है।

डॉक्टर के पास जाने का सही समय (फॉलो-अप)

आपातकालीन लक्षणों के अलावा, नियमित फॉलोअप भी रिकवरी का एक जरूरी हिस्सा है। ज्यादातर डॉक्टर डिलीवरी के 1 से 2 हफ्तों के भीतर पहली फॉलो-अप विजिट और फिर 6 हफ्तों के आसपास एक विस्तृत जांच की सलाह देते हैं, जिसमें गर्भाशय के ठीक होने, टांकों की स्थिति और समग्र रिकवरी का आकलन किया जाता है। अगर इस बीच ब्लीडिंग सामान्य से अलग महसूस हो, रुकने के बाद दोबारा शुरू हो जाए, या कोई भी असहजता महसूस हो, तो तय समय का इंतजार किए बिना डॉक्टर से संपर्क करना सही रहेगा।

निष्कर्ष

पोस्टपार्टम ब्लीडिंग मां बनने के सफर का एक स्वाभाविक हिस्सा है, और सही जानकारी होने पर यह डरावना नहीं बल्कि समझने और संभालने लायक अनुभव बन जाता है। ज्यादातर मामलों में यह अपने आप ठीक हो जाती है, लेकिन चेतावनी भरे लक्षणों को पहचानना और समय पर मदद लेना मां की सुरक्षा के लिए सबसे जरूरी कदम है। खुद की देखभाल को उतनी ही प्राथमिकता दें जितनी नवजात शिशु की देखभाल को, क्योंकि एक स्वस्थ मां ही परिवार की सबसे मजबूत नींव होती है। अगर आपको डिलीवरी के बाद ब्लीडिंग से जुड़ी कोई भी चिंता है, तो सीके बिरला अस्पताल में हमारी अनुभवी गायनेकोलॉजी टीम से आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और भरोसे के साथ अपनी रिकवरी को आगे बढ़ाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

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Written and Verified by:

MBBS, MD (Obstetrics & Gynaecology) Diploma in General Nutrition (USA) Dr Alka Gupta is a leading in Obstetrician & Gynaecologist in Delhi- NCR region. She is an alumnus of the reputed Lady Hardinge Medical College and Maulana Azad Medical College, New Delhi.   Dr Alka has been the Vice President of Delhi Gynaecologists Forum (North) and has been awarded with...

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