
कभी-कभी हमारे मां कुछ चीजें एक जगह पर रख कर भूल जाती हैं। हो सकता है कि ये कोई सामान्य बात हो या फिर उम्र का पड़ाव हो, लेकिन ऐसी ही समस्या अब हर उम्र के लोगों में बहुत ज्यादा देखने को मिल रही है। शुरुआत में लगता है, “बड़े होने पर तो भूलना आम बात है।” लेकिन जब भूलना रोज़मर्रा की ज़िंदगी को उलझाने लगे, अपनों के चेहरे धुंधले पड़ने लगें, तो यह सिर्फ उम्र का असर नहीं, बल्कि एक गंभीर मस्तिष्क रोग का संकेत हो सकता है।
भारत में इस वक्त करीब 5.3 मिलियन (53 लाख) लोग डिमेंशिया के साथ जी रहे हैं, और यह संख्या 2050 तक लगभग तीन गुनी होने का अनुमान है। यही वजह है कि सही समय पर सही जानकारी होना बीमारी से लड़ने की पहली सीढ़ी बन जाता है। इस ब्लॉग में हम अल्जाइमर रोग को हर एंगल से समझेंगे, कारण से लेकर इलाज तक। अगर आपको या आपके किसी अपने में ऐसे लक्षण नज़र आ रहे हैं, तो देर मत कीजिए, हमारे अनुभवी स्पेशलिस्ट से अपॉइंटमेंट बुक करें और सही दिशा में पहला कदम उठाएं।
अल्जाइमर रोग (Alzheimer’s disease) एक धीरे-धीरे बढ़ने वाली न्यूरोडिजेनरेटिव बीमारी है, यानी वो बीमारी जिसमें मस्तिष्क की कोशिकाएं धीरे-धीरे कमज़ोर होकर नष्ट होने लगती हैं। यह मनोभ्रंश रोग या डिमेंशिया (dementia) का सबसे आम प्रकार है और दुनियाभर में डिमेंशिया के कुल मामलों में इसकी हिस्सेदारी लगभग 60 से 80 प्रतिशत तक है। सीधे शब्दों में कहें तो हर डिमेंशिया अल्जाइमर नहीं होता, पर ज़्यादातर अल्जाइमर के मरीज डिमेंशिया की श्रेणी में आते हैं।
यह बीमारी सबसे पहले याददाश्त को प्रभावित करती है, फिर धीरे-धीरे सोचने, बोलने, फैसले लेने और रोज़मर्रा के काम करने की क्षमता को भी छीनने लगती है। दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती दौर में मरीज पुरानी बातें बखूबी याद रख पाता है, लेकिन कल क्या खाया या किससे मिला, यह भूल जाता है। यही विरोधाभास इसे सामान्य भूलक्कड़पन से अलग बनाता है।

अल्जाइमर रोग एक दिन में नहीं आता, यह सालों में धीरे-धीरे तीन मुख्य चरणों से होकर गुज़रता है।
हर मरीज में यह सफर अलग गति से चलता है, इसलिए स्टेज के हिसाब से इलाज की योजना बनाना बेहद ज़रूरी है।
अल्जाइमर रोग के लक्षण अक्सर इतने मामूली होते हैं कि लोग उन्हें पहचान ही नहीं पाते। कुछ आम संकेत इस तरह हैं –
अगर आपके घर में किसी बुज़ुर्ग में ये लक्षण बार-बार दिख रहे हैं, तो इसे “उम्र होने पर ऐसा होता ही है” कहकर टालना खतरनाक साबित हो सकता है। समय पर पहचान से इलाज की दिशा बदल सकती है।
अभी तक अल्जाइमर रोग के होने का कोई एक निश्चित कारण साबित नहीं हुआ है, पर रिसर्च बताती है कि यह मस्तिष्क में एमिलॉयड प्लाक (amyloid plaques) और टाऊ टैंगल्स (tau tangles) नाम की असामान्य प्रोटीन संरचनाओं के जमा होने से जुड़ा है, जो धीरे-धीरे न्यूरॉन्स (तंत्रिका कोशिकाओं) को नुकसान पहुंचाती हैं।
कुछ जोखिम कारक इस बीमारी की आशंका बढ़ा देते हैं –
एक अहम बात यह है कि विशेषज्ञों के अनुसार करीब 40 प्रतिशत डिमेंशिया के मामलों को जीवनशैली में सुधार लाकर टाला या देर किया जा सकता है, यानी यह बीमारी पूरी तरह किस्मत के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
निदान की प्रक्रिया में कई चरण शामिल होते हैं, क्योंकि सिर्फ एक टेस्ट से यह बीमारी कन्फर्म नहीं होती। डॉक्टर आमतौर पर इन तरीकों को मिलाकर आकलन करते हैं –
एक बात साफ समझ लेनी चाहिए, अभी तक अल्जाइमर रोग का कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि कुछ किया नहीं जा सकता। सही उपचार लक्षणों को नियंत्रित करने और बीमारी की रफ्तार धीमी करने में काफी असरदार साबित होता है।
हर मरीज की दवा और थेरेपी उसकी स्टेज, उम्र और अन्य बीमारियों को ध्यान में रखकर तय की जाती है, इसलिए बिना विशेषज्ञ की सलाह के कोई भी दवा शुरू करना उचित नहीं।
अल्जाइमर की रोकथाम की गारंटी कोई नहीं दे सकता, पर जोखिम घटाने के रास्ते ज़रूर मौजूद हैं। रोज़मर्रा की आदतों में यह बदलाव मस्तिष्क को लंबे समय तक सक्रिय रख सकते हैं –
छोटी लगने वाली ये आदतें लंबे समय में मस्तिष्क की सेहत पर बड़ा फर्क डालती हैं।
अल्जाइमर सिर्फ मरीज की बीमारी नहीं होती, यह पूरे परिवार की परीक्षा बन जाती है। देखभाल करने वाले अक्सर थकान, चिड़चिड़ापन और भावनात्मक तनाव से गुज़रते हैं, और यह बिल्कुल सामान्य है।
अल्जाइमर को लेकर समाज में कई गलतफहमियां फैली हुई हैं, जो सही समय पर इलाज में देरी की बड़ी वजह बनती हैं। मिथक और तथ्यों को आप नीचे बताए गए टेबल से पढ़ सकते हैं –

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