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हाइपोथायरायडिज्म का कारण, लक्षण और इलाज

ENT | by Dr Deepti Sinha on Jul 10, 2026 | Last Updated : Jul 10, 2026

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Summary

हाइपोथायरायडिज्म एक सामान्य लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली थायरॉइड समस्या है, जिसमें शरीर पर्याप्त मात्रा में थायरॉइड हार्मोन नहीं बना पाता। इस लेख में हाइपोथायरायडिज्म के कारण, प्रकार, शुरुआती लक्षण, महिलाओं में विशेष प्रभाव, जांच की प्रक्रिया, लेवोथायरोक्सिन आधारित उपचार, खानपान संबंधी सुझाव और जीवनशैली में बदलावों की विस्तृत जानकारी दी गई है। साथ ही यह बताया गया है कि समय पर निदान और सही इलाज से इस स्थिति को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है और व्यक्ति सामान्य एवं स्वस्थ जीवन जी सकता है। यह लेख उन लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है जो लगातार थकान, वजन बढ़ने, बाल झड़ने, कब्ज, अनियमित माहवारी या गर्भधारण संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

क्या आपका वजन अचानक से बढ़ रहा है? खाना ज्यादा न खाने से भी वजन बढ़ता जा रहा है? बाल झड़ रहे हैं, त्वचा रूखी  हो गई है, और मन में अजीब सी उदासी है। परिवार वाले कहते हैं “बस ज्यादा सोचते हो” – लेकिन अंदर से आप जानते हैं कि कुछ तो गड़बड़ है।

अगर यह सब आपकी कहानी है, तो शायद आपका शरीर एक जरूरी संकेत दे रहा है। यह हाइपोथायरायडिज्म (Hypothyroidism) यानी थायरॉइड हो सकता है। यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें गले में मौजूद थायरॉइड ग्लैंड उतने हार्मोन नहीं बना पाती जितनी शरीर को जरूरत होती है।

भारत में यह समस्या बेहद आम है। एक अध्ययन के अनुसार देश में करीब 4.2 करोड़ लोग थायरॉइड से जुड़ी किसी न किसी बीमारी से पीड़ित हैं – और इनमें से बड़ी संख्या महिलाओं की है। खास बात यह है कि बहुत से लोग बरसों तक इस बीमारी से अनजान रहते हैं। सीके बिरला अस्पताल में हमारे अनुभवी थायरॉइड विशेषज्ञ आपकी पूरी जांच और उपचार के लिए तैयार हैं। आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें।

थायरॉइड की बीमारी क्यों होती है?

गले के सामने की तरफ तितली के आकार की एक छोटी-सी ग्लैंड होती है और यही थायरॉइड ग्लैंड है। यह T3 (Triiodothyronine) और T4 (Thyroxine) नाम के दो अहम हार्मोन बनाती है। ये हार्मोन शरीर की लगभग हर बड़ी प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं, जैसे मेटाबॉलिज्म (metabolism), हृदय की गति, शरीर का तापमान, ऊर्जा स्तर, और यहाँ तक कि मूड भी।

जब यह ग्लैंड ठीक से काम नहीं करती और हार्मोन कम बनाती है, तो शरीर की पूरी मशीनरी धीमी पड़ जाती है। इसी स्थिति को हाइपोथायरायडिज्म कहते हैं। इस बीमारी की जड़ में कई कारण हो सकते हैं – आयोडीन की कमी, ऑटोइम्यून (autoimmune) बीमारी, हार्मोनल बदलाव, या पिट्यूटरी ग्लैंड (pituitary gland) की समस्या। जब इनमें से कोई भी बात थायरॉइड और दिमाग के बीच की संचार प्रक्रिया को बिगाड़ती है, तो हाइपोथायरायडिज्म शुरू हो जाता है।

हाइपोथायरायडिज्म के प्रकार कितने हैं?

हाइपोथायरायडिज्म एक ही किस्म का नहीं होता। इसके कारण और असर के हिसाब से इसे कई श्रेणियों में बांटा जाता है –

  • प्राइमरी हाइपोथायरायडिज्म (Primary Hypothyroidism): यह सबसे आम प्रकार है। इसमें थायरॉइड ग्लैंड खुद ही कमजोर पड़ जाती है और हार्मोन कम बनाती है। भारत में ज्यादातर मरीज इसी श्रेणी में आते हैं।
  • सेकंडरी हाइपोथायरायडिज्म (Secondary Hypothyroidism): इसमें थायरॉइड नहीं, बल्कि पिट्यूटरी ग्लैंड कमजोर होता है। वह थायरॉइड को सक्रिय करने वाला TSH हार्मोन पर्याप्त मात्रा में नहीं भेजती।
  • जन्मजात हाइपोथायरायडिज्म (Congenital Hypothyroidism): यह बच्चे के जन्म से ही मौजूद होता है। भारत में इसकी दर 1:1000 है, जो विश्व औसत से अधिक है, इसलिए नवजात शिशुओं की थायरॉइड स्क्रीनिंग बहुत ज़रूरी है।
  • सबक्लिनिकल हाइपोथायरायडिज्म (Subclinical Hypothyroidism): यह शुरुआती और हल्की अवस्था है जिसमें TSH थोड़ा बढ़ा हुआ होता है लेकिन T3-T4 सामान्य रहते हैं और लक्षण स्पष्ट नहीं होते। इस स्तर पर पकड़ में आए तो इलाज बेहद आसान हो जाता है।

हाइपोथायरायडिज्म के कारण क्या है?

इस बीमारी की कोई एक वजह नहीं होती। कई कारण मिलकर थायरॉइड को प्रभावित करते हैं जैसे कि –

  • हाशिमोटो थायरॉयडिटिस (Hashimoto’s Thyroiditis): यह सबसे बड़ा कारण है। इसमें शरीर का अपना इम्यून सिस्टम (immune system) गलती से थायरॉइड ग्लैंड पर हमला कर देता है। महिलाओं में यह ज्यादा होता है।
  • आयोडीन की कमी: थायरॉइड हार्मोन बनाने के लिए आयोडीन जरूरी है। जो लोग आयोडीन नमक का इस्तेमाल नहीं करते या पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ खाने में आयोडीन कम है, उनमें यह खतरा बढ़ जाता है।
  • थायरॉइड सर्जरी या रेडिएशन (Radiation Therapy): अगर पहले किसी कारण से थायरॉइड का ऑपरेशन हुआ हो या उस क्षेत्र में रेडिएशन मिली हो, तो हार्मोन उत्पादन कम हो सकता है।
  • कुछ दवाओं का असर: लिथियम (Lithium) जैसी दवाएं थायरॉइड की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती हैं।
  • गर्भावस्था के बाद (Postpartum Thyroiditis): बच्चे के जन्म के बाद थायरॉइड में अस्थायी सूजन आ सकती है, जो बाद में हाइपोथायरायडिज्म का रूप ले सकती है। PubMed पर प्रकाशित एक भारतीय शोध के अनुसार गर्भवती महिलाओं में हाइपोथायरायडिज्म की दर करीब 11 प्रतिशत पाई गई।
  • उम्र और आनुवंशिकता (Genetics): 35 साल की उम्र के बाद और परिवार में थायरॉइड का इतिहास होने पर खतरा बढ़ जाता है।

हाइपोथायरायडिज्म के लक्षण जो अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं?

यह बीमारी “चुपचाप” आती है। लक्षण इतने धीरे-धीरे बढ़ते हैं कि अक्सर लोग उन्हें थकान, उम्र बढ़ना, या तनाव समझ लेते हैं। यही सबसे बड़ी समस्या है। भूल कर भी इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें –

  • थकान और सुस्ती: पर्याप्त नींद के बाद भी थका हुआ महसूस करना। यह हाइपोथायरायडिज्म का सबसे आम और पहला संकेत है।
  • वजन बढ़ना: बिना खाने की मात्रा बदले वजन बढ़ना, क्योंकि मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ जाता है।
  • ठंड बर्दाश्त न होना: ऐसे मौसम में भी ज़्यादा ठंड लगना जब बाकी सब सामान्य हों।
  • बाल झड़ना और त्वचा का रूखापन: बाल पतले होने लगते हैं, त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है।
  • कब्ज़ (Constipation): पाचन तंत्र धीमा पड़ने से कब्ज की शिकायत आम हो जाती है।
  • मूड में बदलाव और अवसाद (Depression): मन में उदासी, चिड़चिड़ापन, और ध्यान न लगा पाना। ये कई बार डिप्रेशन की तरह दिखता है।
  • याददाश्त कमजोर होना: काम में मन न लगना, भूलना, और सोचने की गति धीमी होना।
  • चेहरे और हाथ-पैरों में सूजन (Edema): शरीर में पानी जमा होने से सूजन आ सकती है।
  • मांसपेशियों में दर्द और जोड़ों की तकलीफ: बिना किसी ज़ोरदार काम के भी शरीर में दर्द रहना।

महिलाओं में हाइपोथायरायडिज्म के विशेष लक्षण

महिलाओं में कुछ अलग लक्षण भी होते हैं जिन पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है –

  • माहवारी (periods) में अनियमितता या बहुत ज्यादा ब्लीडिंग
  • गर्भधारण (conceive) करने में मुश्किल
  • बार-बार गर्भपात (miscarriage)
  • स्तनपान के दौरान दूध कम बनना

हाइपोथायरायडिज्म का निदान कैसे होता है?

TSH (Thyroid Stimulating Hormone) ब्लड टेस्ट सबसे पहला और सबसे जरूरी टेस्ट है। अगर TSH का स्तर 4.0 mIU/L से ऊपर है, तो डॉक्टर T3 और T4 टेस्ट भी करते हैं। कुछ मामलों में एंटी-TPO एंटीबॉडी टेस्ट से हाशिमोटो थायरॉयडिटिस की पुष्टि की जाती है।

यह टेस्ट करवाना बेहद आसान और सस्ता है। साल में एक बार थायरॉइड जांच करवाना, खासकर 35 साल की उम्र के बाद, सभी के लिए फायदेमंद है।

हाइपोथायरायडिज्म का इलाज कैसे किया जाता है? (Hypothyroidism Treatment)

अच्छी खबर यह है कि हाइपोथायरायडिज्म का इलाज न सिर्फ संभव है, बल्कि बेहद असरदार भी है।

  • लेवोथायरोक्सिन (Levothyroxine) दवा: यह सबसे मुख्य और सिद्ध इलाज है। यह दवा शरीर में T4 हार्मोन की कमी को पूरा करती है। इसे सुबह खाली पेट लेना सबसे ज़्यादा असरदार होता है। डॉक्टर की सलाह के बिना इसकी खुराक कभी न बदलें।
  • नियमित जांच: दवा शुरू करने के 6 से 8 हफ्ते बाद TSH टेस्ट दोहराया जाता है ताकि खुराक सही है या उसे बदलने की ज़रूरत है, यह पता चल सके। यह एक आजीवन प्रक्रिया है लेकिन इसके साथ सामान्य जीवन पूरी तरह संभव है।

क्या हाइपोथायरायडिज्म खतरनाक है? अगर इलाज न हो तो हां – यह दिल की बीमारी, बांझपन (infertility), और एक गंभीर स्थिति जिसे मिक्सेडेमा कोमा (myxedema coma) कहते हैं, उसका कारण बन सकता है। लेकिन समय पर इलाज से यह पूरी तरह नियंत्रण में रहता है।

हाइपोथायरायडिज्म में क्या खाएं और क्या नहीं?

खानपान दवा की जगह नहीं ले सकता, लेकिन यह इलाज को ज़्यादा असरदार बनाता है।

हाइपोथायरायडिज्म में क्या खाना चाहिए:

  • आयोडीनयुक्त नमक: थायरॉइड हार्मोन बनाने के लिए ज़रूरी।
  • समुद्री खाना (Seafood): झींगा, मछली जैसे खाने में आयोडीन और सेलेनियम (selenium) दोनों होते हैं।
  • अंडे और डेयरी उत्पाद: दूध, दही, पनीर प्रोटीन और आयोडीन के अच्छे स्रोत हैं।
  • ब्राज़ील नट्स (Brazil Nuts): सेलेनियम से भरपूर, जो थायरॉइड को सपोर्ट करता है।
  • हरी पत्तेदार सब्जियां: पके हुए पालक और मेथी फायदेमंद है।
  • साबुत अनाज: ओट्स, दलिया, और ब्राउन राइस धीरे-धीरे पचते हैं और ऊर्जा देते हैं।

हाइपोथायरायडिज्म में क्या नहीं खाना चाहिए:

  • कच्ची गोभी, ब्रोकली, पत्ता गोभी: इन्हें कच्चा खाने से थायरॉइड हार्मोन के निर्माण में रुकावट आ सकती है। पकाकर खाना ठीक है।
  • सोया उत्पाद: थायरॉइड दवा के साथ सोया दवा के असर को कम कर सकता है।
  • अत्यधिक कॉफी या चाय: लेवोथायरोक्सिन के साथ कॉफी न लें।
  • प्रसंस्कृत (Processed) खाना: चिप्स, बिस्किट, फास्ट फूड से दूर रहें।
  • पिंक साल्ट: इसमें आयोडीन की मात्रा बेहद कम और अनिश्चित होती है, इसलिए इसे आयोडीन नमक का विकल्प न मानें।

हाइपोथायरायडिज्म के लिए घरेलू उपाय

ये उपाय दवा की जगह नहीं लेते, लेकिन थायरॉइड की सेहत को बेहतर बनाने में मदद करते हैं –

  • योग और प्राणायाम: सर्वांगासन (Sarvangasana) और हलासन (Halasana) जैसे आसन गले की ग्रंथियों में रक्त प्रवाह बढ़ाते हैं। कपालभाति प्राणायाम मेटाबॉलिज्म को बढ़ाने में मददगार माना जाता है।
  • तनाव कम करें: लंबे समय का तनाव थायरॉइड की कार्यक्षमता को और बिगाड़ सकता है। ध्यान (meditation) और गहरी सांस लेने के अभ्यास इसमें मदद करते हैं।
  • नियमित हल्का व्यायाम: रोज़ 30 मिनट की सैर या हल्की एक्सरसाइज़ मेटाबॉलिज्म को सक्रिय रखती है।
  • पर्याप्त नींद: रात को 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद हार्मोन संतुलन के लिए बेहद जरूरी है।
  • अश्वगंधा (Ashwagandha): कुछ शुरुआती शोधों में देखा गया है कि यह थायरॉइड फंक्शन को सपोर्ट कर सकती है, लेकिन लेवोथायरोक्सिन दवा के साथ इसके सेवन से पहले अपने एंडोक्रिनोलॉजिस्ट से सलाह जरूर लें।

निष्कर्ष

हाइपोथायरायडिज्म एक आम बीमारी है, लेकिन इसे अनदेखा करना सही नहीं है। अगर आप महीनों से थका हुआ महसूस कर रहे हैं, वजन बेवजह बढ़ रहा है, या महिलाओं में माहवारी की समस्याएं हैं – तो एक बार थायरॉइड जांच जरूर करवाएं।

सही समय पर TSH टेस्ट, सही दवा और थोड़ा ध्यान खान-पान का – बस इतने से ही इस बीमारी को पूरी तरह कंट्रोल में लाया जा सकता है। लाखों लोग इस बीमारी के साथ पूरी तरह सामान्य और स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।

सीके बिरला अस्पताल में हमारी विशेषज्ञ टीम आपकी पूरी थायरॉइड जांच से लेकर दीर्घकालिक इलाज तक हर कदम पर आपके साथ हैं। आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें और अपनी सेहत को पहली प्राथमिकता दें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

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