
लिवर हमारे शरीर का एक ऐसा योद्धा है, जो बिना रुके हमारे शरीर में मौजूद टॉक्सिन्स को बाहर निकालता है और हमें ऊर्जा देता है। लेकिन क्या हो जब इस योद्धा पर एक साथ दो दुश्मन हमला कर दें? हेपेटाइटिस डी (Hepatitis D) एक ऐसी ही गंभीर स्थिति है।
यदि आप या आपका कोई अपना लिवर से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहा है, तो इस ब्लॉग से आपको बहुत मदद मिलने वाली है। यहां हम केवल बीमारी की बात नहीं करेंगे, बल्कि उस समाधान की बात करेंगे जो आपकी सेहत को फिर से पटरी पर ला सकता है। हमारे विशेषज्ञ हर कदम पर आपके साथ हैं, ताकि आप एक स्वस्थ और सुरक्षित जीवन जी सकें। इसलिए यदि आप भी लिवर की किसी गंभीर समस्या का सामना कर रहे हैं, तो बिना देरी किए हमारे अनुभवी विशेषज्ञों से मिलें और इलाज लें।
हेपेटाइटिस डी, जिसे हेपेटाइटिस डी वायरस (HDV) के रूप में जाना जाता है, लिवर की एक गंभीर सूजन है। इसे ‘अधूरा वायरस’ (Incomplete Virus) भी कहा जाता है, क्योंकि यह अकेले जीवित नहीं रह सकता। इसे फैलने और जीवित रहने के लिए हेपेटाइटिस बी (HBV) की उपस्थिति की आवश्यकता होती है।
सरल शब्दों में कहें तो, यदि किसी व्यक्ति को हेपेटाइटिस बी नहीं है, तो उसे हेपेटाइटिस डी संक्रमण भी नहीं हो सकता। लेकिन जब ये दोनों संक्रमण एक साथ मिलते हैं या एक के बाद एक होते हैं, तो स्थिति बेहद गंभीर हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में लगभग 5% हेपेटाइटिस बी संक्रमित लोग हेपेटाइटिस डी से भी पीड़ित हैं। वहीं हालिया रिसर्च के अनुसार, हेपेटाइटिस बी से पीड़ित रोगियों में हेपेटाइटिस डी के जुड़ने से लिवर कैंसर का खतरा 3 गुना बढ़ जाता है। भारत में, लिवर क्लीनिकों में आने वाले गंभीर रोगियों में लगभग 10-15% में एचडीवी की सह-संक्रमण (Co-infection) देखा गया है।
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एचडीवी संक्रमण मुख्य रूप से संक्रमित रक्त या शरीर के अन्य तरल पदार्थों के संपर्क में आने से फैलता है। इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं –
यह वायरस साधारण छूने, चूमने, साथ खाना खाने या खांसने-छींकने से नहीं फैलता है। इसलिए यदि समाज में ऐसी भ्रांतियां हों, तो सही जानकारी साझा करें।
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अक्सर लोग इंटरनेट पर Hepatitis D symptoms in Hindi खोजते हैं क्योंकि इसके लक्षण काफी हद तक हेपेटाइटिस बी से मिलते-जुलते हैं, लेकिन कहीं अधिक तीव्र होते हैं। हेपेटाइटिस डी के लक्षण अचानक उभर सकते हैं जैसे कि –
यदि ये लक्षण दिखें, तो इसे सामान्य कमजोरी समझने की गलती न करें। यह हेपेटाइटिस बी और डी संक्रमण का संकेत हो सकता है, जो लिवर फेलियर की ओर ले जा सकता है।
समय पर निदान ही सबसे प्रभावी हेपेटाइटिस डी का इलाज है। चूंकि इसके लक्षण अन्य लिवर बीमारियों जैसे होते हैं, इसलिए रक्त परीक्षण (Blood Test) अनिवार्य है।
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जब बात आती है हेपेटाइटिस डी के उपचार की, तो चिकित्सा जगत में इसे एक चुनौतीपूर्ण स्थिति माना जाता है। वर्तमान में, इसका कोई निश्चित इलाज नहीं है, जो वायरस को पूरी तरह खत्म कर दे, लेकिन इसे आसानी से मैनेज किया जा सकता है –
सीके बिरला अस्पताल में हमारा अनुभव कहता है कि सही समय पर शुरू किया गया हेपेटाइटिस डी का इलाज जीवन की गुणवत्ता में बड़ा सुधार ला सकता है।
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एक बात लंबे समय से चली आ रही है कि बचाव हमेशा उपचार से बेहतर होता है। यहां कुछ महत्वपूर्ण कदम दिए गए हैं जैसे कि –
हेपेटाइटिस डी निस्संदेह एक कठिन चुनौती है, लेकिन यह लाइलाज नहीं है। सही जानकारी, समय पर जांच और सीके बिरला अस्पताल जैसे विशेषज्ञों की देखरेख में आप इस बीमारी को मात दे सकते हैं। अपनी सेहत के साथ समझौता न करें। यदि आपको ऊपर बताए गए कोई भी लक्षण महसूस होते हैं, तो तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें। याद रखें, आपका लिवर आपकी मुस्कान का आधार है। इसकी रक्षा करें।
हेपेटाइटिस डी में क्या नहीं करना चाहिए?
हेपेटाइटिस डी में शराब का सेवन पूरी तरह बंद कर देना चाहिए क्योंकि यह लिवर की क्षति को दस गुना बढ़ा देती है। बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी सप्लीमेंट या पेनकिलर न लें। तला-भुना और अत्यधिक मसालेदार भोजन लिवर पर अतिरिक्त दबाव डालता है, इसलिए इनसे बचें।
क्या हेपेटाइटिस डी लिवर कैंसर का कारण बन सकता है?
हां, हेपेटाइटिस डी को लिवर कैंसर का सबसे आक्रामक रूप माना जाता है। यह हेपेटाइटिस बी के साथ मिलकर लिवर सिरोसिस (लिवर का सिकुड़ना) और बाद में ‘हेपैटोसेलुलर कार्सिनोमा’ (लिवर कैंसर) के खतरे को अत्यधिक बढ़ा देता है, वह भी बहुत कम समय में।
क्या हेपेटाइटिस डी पूरी तरह से ठीक हो सकता है?
वर्तमान में हेपेटाइटिस डी का कोई 100% ‘क्यूरेटिव’ इलाज नहीं है जो शरीर से वायरस को पूरी तरह निकाल दे। हालांकि, दवाओं के माध्यम से वायरल लोड को इतना कम किया जा सकता है कि लिवर को नुकसान न पहुंचे और व्यक्ति सामान्य जीवन जी सके।
क्या हेपेटाइटिस डी फिर से संक्रमित हो सकता है?
यदि एक बार व्यक्ति संक्रमण से उबर जाता है और उसके शरीर में एंटीबॉडी बन जाती हैं, तो पुनः संक्रमण दुर्लभ है। हालांकि, जो लोग पुराने (Chronic) मरीज हैं, उनमें वायरस फिर से सक्रिय हो सकता है यदि उपचार को बीच में छोड़ दिया जाए या स्वास्थ्य की अनदेखी की जाए।
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