
सीपीआर यानी Cardiopulmonary Resuscitation, हृदय गति रुकने पर जान बचाने वाली इमरजेंसी तकनीक। सांस या धड़कन रुकने, डूबने या दम घुटने पर सीपीआर तुरंत शुरू करें। सही तरीका: पहले 112 पर कॉल करें, फिर 30:2 अनुपात (संपीड़न:सांस) में सीपीआर दें। Hands-Only CPR यानी बिना सांस दिए सिर्फ छाती दबाकर भी जान बचाई जा सकती है। भारत में बाईस्टैंडर सीपीआर दर बहुत कम है। यह स्किल हर किसी को सीखनी चाहिए।
एक पल के लिए सोचिए। आप अपने घर के किसी बड़े-बुजुर्ग के साथ बैठे हैं, बातें हो रही हैं, और अचानक वो बेहोश होकर गिर जाते हैं। सांस थम जाती है, दिल की धड़कन महसूस नहीं होती। ऐसे में अगले दो-तीन मिनट तय करते हैं कि सामने वाला व्यक्ति जिंदगी की तरफ लौटेगा या नहीं। यही वो पल है, जहां सीपीआर (CPR) किसी की जान बचाने वाला सबसे बड़ा हथियार बन जाता है। भारत में आज भी बहुत कम लोगों को यह बुनियादी तकनीक आती है, और यही अनजान होना कई बार किसी अपने को समय रहते खोने की वजह बन जाता है। इस ब्लॉग में हम आसान भाषा में समझेंगे कि सीपीआर क्या है, कब देनी चाहिए और सही तरीका क्या है, ताकि इमरजेंसी में आप घबराएं नहीं, बल्कि किसी की जान बचाने वाले हीरो बन सकें।
सीके बिरला अस्पताल की इमरजेंसी और कार्डियक टीम अक्सर ऐसे मामले देखती है, जहां परिवार के किसी सदस्य ने समय पर सीपीआर दे दी और मरीज को नई जिंदगी मिल गई। दिल्ली और गुरुग्राम, दोनों सेंटर पर हमारे अनुभवी कार्डियोलॉजिस्ट और इमरजेंसी स्पेशलिस्ट से मिलकर सही जानकारी लें। हृदय संबंधी जोखिम हो तो देर न करें, आज ही अपॉइंटमेंट बुक करें।
सीपीआर का पूरा नाम है Cardiopulmonary Resuscitation, यानी कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन। यह एक इमरजेंसी फर्स्ट-एड तकनीक है, जिसमें छाती को बार-बार दबाकर और जरूरत पड़ने पर मुंह से सांस देकर, दिल और फेफड़ों का काम अस्थायी रूप से खुद अपने हाथों से किया जाता है, ताकि मस्तिष्क और शरीर के अंगों तक ऑक्सीजन-युक्त रक्त पहुंचता रहे, जब तक दिल दोबारा खुद से धड़कना शुरू न कर दे या मेडिकल टीम मौके पर न पहुंच जाए।
सीपीआर हर बेहोशी में नहीं, बल्कि सिर्फ उन स्थितियों में देनी चाहिए जहां सांस या धड़कन रुक चुकी हो या रुकने की कगार पर हो।
जब दिल धड़कना बंद कर देता है, तो शरीर में रक्त का प्रवाह रुक जाता है और मस्तिष्क को ऑक्सीजन मिलनी बंद हो जाती है। सिर्फ चार से छह मिनट के भीतर मस्तिष्क की कोशिकाएं स्थायी रूप से क्षतिग्रस्त होना शुरू कर सकती हैं। सीपीआर के दौरान छाती को बार-बार दबाने से दिल पर दबाव पड़ता है, जिससे खून शरीर में थोड़ा-बहुत घूमता रहता है और मस्तिष्क तक ऑक्सीजन पहुंचती रहती है। यही वजह है कि सीपीआर को “टाइम-सेंसिटिव” इमरजेंसी माना जाता है, जहां हर एक मिनट की देरी सर्वाइवल चांस को करीब 7 से 10 प्रतिशत तक कम कर सकती है।
भारत में यह चुनौती और भी गंभीर है। कई रिसर्च बताते हैं कि यहां बाईस्टैंडर सीपीआर (आम लोगों द्वारा दी गई सीपीआर) की दर बेहद कम है, कुछ अध्ययनों में यह 10 प्रतिशत से भी कम पाई गई है, जबकि अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में यह आंकड़ा कहीं ज़्यादा है। यही अंतर भारत में कार्डियक अरेस्ट के बाद जीवित बचने की दर को प्रभावित करता है।
सीपीआर शुरू करने से पहले कुछ जरूरी कदम उठाना बहुत मायने रखता है –
व्यक्ति को सख्त सतह पर पीठ के बल लिटाएं। एक हथेली छाती के बीचों-बीच, दूसरी उसके ऊपर रखकर उंगलियां जोड़ लें। सीधी बाहों से छाती को 5–6 सेंटीमीटर गहराई तक, 100–120 प्रति मिनट की रफ्तार से दबाएं। हर 30 संपीड़न के बाद, प्रशिक्षित हों तो 2 बचाव सांस दें। यही 30:2 अनुपात है, जिसे सामान्य सांस लौटने या मेडिकल टीम के आने तक दोहराएं।
1 से 8 साल के बच्चों में एक हाथ से हल्का दबाव, गहराई छाती की करीब एक तिहाई तक। अनुपात वही 30:2 रहता है।
एक साल से कम उम्र में सिर्फ दो उंगलियों से हल्का पर नियमित दबाव दिया जाता है। बचाव सांस देते समय मुंह और नाक दोनों एक साथ कवर करने होते हैं।
अगर आप प्रशिक्षित नहीं हैं, तो सिर्फ लगातार छाती संपीड़न देकर भी जान बचाई जा सकती है। यह Hands-Only CPR आम लोगों के लिए सीखना और लागू करना सबसे आसान तरीका माना जाता है।

सीपीआर को आप मुख्य रूप से 7 चरणों में बांटों और इमरजेंसी स्थिति में उन्हें एक-एक करके फॉलो करें –
सीपीआर एक जान बचाने वाली प्रक्रिया है, लेकिन इसके दौरान कुछ जटिलताएं भी हो सकती हैं, जैसे छाती पर ज्यादा दबाव पड़ने से पसली टूटना, या मुंह से सांस देते समय पेट में हवा भर जाना (गैस्ट्रिक इन्सफ्लेशन)। इन जोखिमों के बावजूद, विशेषज्ञ मानते हैं कि सीपीआर न देने का जोखिम, इन संभावित जटिलताओं से कहीं ज़्यादा गंभीर होता है। इसलिए घबराए बिना, सही तकनीक के साथ सीपीआर देना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।
सीपीआर सिर्फ एक मेडिकल शब्द नहीं, बल्कि किसी की जिंदगी और मौत के बीच का फासला मिटाने वाला हुनर है। भारत में आज भी बहुत कम लोग इसे सही तरीके से जानते हैं, और यही वजह है कि हृदयाघात के कई मामलों में समय रहते मदद नहीं मिल पाती। अगर आप, आपका परिवार या आपके ऑफिस के साथी सीपीआर सीख लें, तो आप किसी अनजान पल में किसी की जान बचाने वाले हीरो बन सकते हैं। दिल्ली और गुरुग्राम दोनों शहरों में हमारे अस्पताल है, जो आपके दिल का ख्याल अच्छे से रख सकते हैं। अपने दिल की सेहत को नजरअंदाज न करें, आज ही हमारे कार्डियोलॉजी और इमरजेंसी विशेषज्ञों से अपॉइंटमेंट बुक करें और अपने परिवार को सुरक्षित भविष्य दें।
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