
डेंगू एक आम संचारी रोग है जिससे पीड़ित होने पर आप खुद में अनेक लक्षणों को अनुभव कर सकते हैं जैसे कि, तेज बुखार, शरीर और सिर में तेज दर्द आदि। यह एडीज मच्छर के काटने से होता है। डेंगू माइल्ड या गंभीर हो सकता है।
डेंगू का सटीक उपचार संभव नहीं है। हालांकि, उपचार की मदद से इसके लक्षणों में सुधार किया जा सकता है। गंभीर डेंगू होने पर मरीज को हॉस्पिटल में भर्ती होने की आवश्यकता पड़ती है। भारत में डेंगू बरसात और उसके तुरंत बाद के महीने में सबसे अधिक फैलता है।
डेंगू एक आम संचारी रोग है जिससे पीड़ित होने पर आप खुद में अनेक लक्षणों को अनुभव कर सकते हैं जैसे कि, तेज बुखार, शरीर और सिर में तेज दर्द आदि। डेंगू फैलाने वाला एडीज मच्छर मुख्यतः दिन के समय, खासकर सुबह और शाम ज्यादा सक्रिय रहता है और साफ, ठहरे हुए पानी में पनपता है, इसलिए दिन में भी मच्छरों से बचाव जरूरी है। डेंगू माइल्ड या गंभीर हो सकता है। जोड़ों और मांसपेशियों में इतना तेज दर्द होता है कि इसे “ब्रेक बोन फीवर” तक कहा जाता है, यानी हड्डियां टूटने जैसा दर्द। डेंगू वायरस के चार अलग-अलग प्रकार होते हैं (DEN-1 से DEN-4 तक), और यहीं पर एक बात समझनी ज़रूरी है। अगर किसी को पहले डेंगू हो चुका है और दोबारा किसी दूसरे प्रकार से संक्रमण हो जाए, तो गंभीर डेंगू का खतरा काफी बढ़ जाता है।
फिलहाल डेंगू का कोई सीधा एंटी-वायरल इलाज मौजूद नहीं है। डॉक्टर लक्षणों को मैनेज करके शरीर को खुद ठीक होने का मौका देते हैं। ज्यादातर मामले घर पर आराम से संभल जाते हैं, लेकिन गंभीर डेंगू में अस्पताल में भर्ती होना जरूरी हो जाता है। एक उम्मीद की खबर यह है कि हाल ही में भारत में QDENGA नाम की डेंगू वैक्सीन को मंजूरी मिली है, जो 4 से 60 साल तक के लोगों को लगाई जा सकती है। ट्रायल में यह अस्पताल में भर्ती होने का खतरा करीब 90% तक कम करने में असरदार पाई गई। हालांकि यह इलाज का विकल्प नहीं, बचाव का एक अतिरिक्त कदम है।
डेंगू के लक्षण इसकी गंभीरता के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं। बच्चों और किशोरों में माइल्ड डेंगू होने पर लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। संक्रमित होने के बाद आमतौर पर 4-7 दिनों के अंदर डेंगू के लक्षण नजर आने लगते हैं।
डेंगू के मुख्य लक्षणों में तेज बुखार (104° F) शामिल है। अन्य लक्षणों में निम्न शामिल हो सकते हैं:
गंभीर डेंगू होने पर रक्तस्रावी बुखार या डीएचएफ होने का खतरा बढ़ जाता है। इस स्थिति में रक्त वाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और खून में प्लेटलेट की संख्या कम हो जाती है। इस दौरान कुछ लक्षण दिखाई दे सकते हैं, जैसे कि:
डेंगू में सबसे खतरनाक हिस्सा वह नहीं होता जब बुखार सबसे तेज़ हो, बल्कि वह होता है जब बुखार उतरने लगता है। बुखार उतरने के 24 से 48 घंटों के बीच का समय सबसे नाज़ुक माना जाता है, क्योंकि यहीं पर मरीज़ की हालत अचानक बिगड़ सकती है। WHO की गाइडलाइंस के मुताबिक, अगर इस दौरान नीचे दिए गए किसी भी संकेत का सामना हो, तो देर बिल्कुल न करें और सीधे डॉक्टर के पास जाएं –
राहत की बात यह है कि सही समय पर पहचान और इलाज मिलने पर मृत्यु दर काफी कम है। भारत में डेंगू से मृत्यु दर 2008 से लगातार 1% से नीचे बनी हुई है, और 2024 में यह घटकर सिर्फ 0.13% रह गई। यानी समय पर अस्पताल पहुंचना ही सबसे बड़ा फैसला साबित होता है।
बुखार आते ही डेंगू टेस्ट करवाने की जल्दबाजी न करें। शुरुआती एक-दो दिनों में रिपोर्ट गलत भी आ सकती है। आमतौर पर डॉक्टर तीन तरह के टेस्ट की सलाह देते हैं:
सही समय पर सही टेस्ट करवाने से इलाज जल्दी शुरू हो पाता है और जटिलताएं काफी हद तक टाली जा सकती हैं।
डेंगू का सटीक उपचार उपलब्ध नहीं है, लेकिन उपचार के कुछ खास माध्यमों की मदद से इसके लक्षणों को कम किया जा सकता है। डेंगू के कारण उत्पन्न बुखार और दर्द को नियंत्रित करने के लिए डॉक्टर दर्दनिवारक दवाओं का इस्तेमाल करते हैं।
डेंगू को नियंत्रित रखने के लिए शरीर को हाइड्रेट रखना एक महत्वपूर्ण तरीका है। शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए डॉक्टर मरीज को पर्याप्त मात्रा में स्वच्छ पानी पीने की सलाह देते हैं। साथ ही, मामला गंभीर होने पर मरीज की नसों के जरिए इंट्रावेनस फ्लूइड या इलेक्ट्रोलाइट सप्लीमेंट दी जाती है।
कुछ मामलों में मरीज की उम्र और समग्र स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए ब्लड प्रेशर मॉनिटरिंग और खून चढ़ाकर (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) इलाज किया जाता है। डेंगू होने पर आपको बिना डॉक्टर की सलाह के किसी भी दवा का सेवन करने से बचना चाहिए।
बुखार और दर्द के लिए कौन-सी दवा लें: डॉक्टर आमतौर पर पेरासिटामोल (Paracetamol/Acetaminophen) लिखते हैं, वह भी बताई गई मात्रा में ही। इस बात को गंभीरता से लें क्योंकि एस्पिरिन और इबुप्रोफेन जैसी NSAID दवाएं खून पतला करती हैं और डेंगू में इनसे रक्तस्राव का खतरा बढ़ सकता है। किसी भी हालत में डॉक्टर की सलाह के बिना कोई पेन किलर, यहां तक कि आम-सी लगने वाली दवा भी न लें।
प्लेटलेट काउंट पर नज़र रखना इलाज का सबसे अहम हिस्सा माना जाता है। सामान्य प्लेटलेट काउंट 150,000/mm³ से ऊपर होता है; इससे कम होने पर इसे थ्रोम्बोसाइटोपेनिया कहा जाता है, जो डेंगू में लगभग हर मरीज़ में देखने को मिलता है। यहां एक भ्रम साफ करना जरूरी है कि भारत सरकार के नेशनल वेक्टर बॉर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (NVBDCP) के मुताबिक, अगर मरीज स्थिर है और खून बहने का कोई लक्षण नहीं है, तो सिर्फ कम प्लेटलेट काउंट देखकर प्रिवेंटिव ट्रांसफ्यूजन देने की ज़रूरत नहीं होती। ट्रांसफ्यूजन आमतौर पर तभी दिया जाता है जब काउंट 10,000/µL से नीचे चला जाए या सक्रिय रक्तस्राव के लक्षण दिखें।
एक सामान्य दिशा-निर्देश के तौर पर, प्लेटलेट काउंट 50,000/µL से नीचे जाने पर या रक्तस्राव/डिहाइड्रेशन के लक्षण दिखने पर डॉक्टर भर्ती होने की सलाह दे सकते हैं। लेकिन ध्यान रखें कि सिर्फ आंकड़ा नहीं, मरीज़ की पूरी हालत इलाज का फैसला तय करती है। इसलिए बार-बार टेस्ट करवाना और डॉक्टर की निगरानी में रहना छोड़ें नहीं, चाहे तबीयत में सुधार ही क्यों न लग रहा हो।
कुछ खास घरेलू उपायों की मदद से डेंगू के लक्षणों में सुधार किया जा सकते हैं जैसे कि:
इन सबके अलावा, आप दिन में कितनी बार पेशाब करते हैं इसकी संख्या और पेशाब के रंग को नोट करें और डॉक्टर से बताएं।
इन्हें डाइट में शामिल करें:
इनसे दूरी बनाए रखें:
एक बात यहां साफ कर देना ज़रूरी है कि पपीते के पत्तों का रस या गिलोय जैसे घरेलू नुस्खे परंपरागत रूप से काफी इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन इन पर वैज्ञानिक शोध अभी सीमित और शुरुआती स्तर का है। इन्हें डॉक्टर की सलाह और निगरानी में ही आज़माएं, दवा का विकल्प समझकर बिल्कुल न लें।
अनेक ऐसे कारक हैं जो डेंगू के जोखिम यानी खतरे को बढ़ाते हैं। इसमें मुख्य रूप से निम्न शामिल हो सकते हैं:
गंभीर डेंगू होने पर यह लिवर, फेफड़ों और दिल को प्रभावित कर सकता है जिसके कारण ब्लड प्रेशर काफी कम हो सकता है। डेंगू संबंधित जटिलताओं में निम्न शामिल हो सकते हैं:
अमेरिकी खाद्य और औषधि प्रशासन (US Food and Drug Administration) ने 2019 में 9-16 वर्ष की उम्र वाले बच्चों में डेंगवैक्सिया नामक एक डेंगू के टीके का उपयोग करने की मंजूरी दी थी। हालांकि, भारत में इस टीके को इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी गई है।
डेंगू एक संचारी बीमारी है जो मच्छरों द्वारा एक से दूसरे इंसान में फैलती है। इसका टीका नहीं होने के कारण, इससे बचने का एकमात्र उपाय है मच्छरों से खुद को बचाकर रखना। इसके लिए आप मॉस्किटो रेप्लेंट्स या मच्छरदानी का इस्तेमाल कर सकते हैं।
इसके अलावा, शाम होने से पहले अपने घर की खिड़कियों को बंद कर दें, शरीर को पूरी तरह ढककर रखें, अपने घर में या उसके आसपास पानी जमा न होने दें, पानी को ढककर रखें, अगर कोई पानी का स्रोत है तो उसे हटा दें या ढक दें या उपयुक्त कीटनाशक का इस्तेमाल करें।
शुरुआती लक्षण दिखते ही इंटरनल मेडिसिन स्पेशलिस्ट को दिखाना सही कदम है। अगर मामला गंभीर मोड़ ले ले, तो इन्फेक्शियस डिजीज स्पेशलिस्ट या क्रिटिकल केयर/ICU टीम की ज़रूरत पड़ सकती है। सीके बिरला अस्पताल में Dr. Ravindra Gupta (MBBS, MD – इंटरनल मेडिसिन, 38+ वर्षों का अनुभव) डेंगू सहित गंभीर संक्रामक बीमारियों के इलाज में विशेषज्ञ माने जाते हैं। लक्षण दिखते ही अपॉइंटमेंट बुक करने में देर न करें।
डेंगू डरावना ज़रूर लगता है, लेकिन समय पर पहचान और सही देखभाल से यह पूरी तरह ठीक हो जाने वाली बीमारी है। तेज बुखार, बदन दर्द या ऊपर बताए गए किसी भी चेतावनी संकेत को हल्के में न लें। जल्द टेस्ट करवाएं, हाइड्रेटेड रहें, और डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा न लें। और सबसे ज़रूरी, मच्छरों को पनपने का मौका ही न दें, क्योंकि बचाव हमेशा इलाज से आसान होता है।
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